रविवार, 18 जनवरी 2009

हत्या नहीं होती तो राष्ट्रपति बन सकते थे मार्टिन लूथर किंग


चार अप्रैल 1968 की शाम पांच बजे जाॅन बिलार्ड अपने कमरे के बाहर आया। कुछ देर बाद नीले रंग के कैन्वस के थैले के साथ वापस लौटा।इस थैले के अलावा उसके पास टेलीस्कोपिक लेंस लगी रेमिंगटन पम्प एक्शन राइफल भी थी। वह बाथ रूम में गया जो उसके कमरे के 15 फीट नीचे था। बाथ रूम में आकर उसने उसका का दरवाजा बंद कर लिया।बाथ रूम की खिड़की से डा.मार्टिन लूथर किंग का कमरा एकदम सामने पड़ता था।वह कमरा कुल 105 फीट की दूरी पर था। खिड़की के पीछे बैठ कर वह डा.किंग के अपने कमरे की बाल्कनी में आने की प्रतीक्षा करने लगा। जब छह बजने में तीन मिनट शेष थे तब डा.किंग अपने कमरे की बाल्कनी पर आए।बिलार्ड उर्फ जेम्स रे ने अपनी राइफल संभाली। ठीक छह बज कर एक मिनट पर उसने डा.किंग को निशाना बना कर गोली चला दी।डा.किंग गोली लगते ही घायल होकर जमीन पर गिर पड़े।एक दिन पहले ही उन्होंने अपने साथियों से कहा था कि वे इन अफवाहों से भयभीत नहीं हैं कि मेक्फिस में उनकी हत्या के प्रयत्न किए जाएंगे।उन्होंने कहा था,‘मैं भले ही मर जाउं , पर मेरा अहिंसापूर्ण आंदोलन अमर है।’ इस कांड को अंजाम देने के बाद जेम्स फरार हो गया।उसे पकड़ने के लिए अमेरिकी खुफिया पुलिस के 6600 जासूस लगा दिए गए थे। इस काम में ब्रिटेन,पुत्र्तगाल,कनाडा और मैक्सिको के जासूस भी अमेरिकी खुफिया दल को मदद कर रहे थे।इस खोज पर दो महीनों में 15 लाख डालर खर्च हुए। पर, वह हत्यारा 8 जून 1968 को पकड़ा गया एक हवाई अड्डे पर।एक पासपोर्ट अधिकारी की सतर्कता से। जार्ज स्नेड उर्फ जेम्स रे उर्फ बिलार्ड और न जाने और क्या -क्या नाम था उसका ! हालांकि उस हत्यारे के पिता ने कहा था कि ‘किंग का हत्यारा कोई और था।असली हत्यारे की मृत्यु हो चुकी है । शायद किसी ने उसे पैसे देकर हत्या कराई होगी और बाद में उसकी भी हत्या कर दी गई होगी।इसी तरह जाॅन एफ. कैनेडी की हत्या ओसवाल्ड ने नहीं की थी।इधर कुछ दिनों से यह डर बढ़ता जा रहा था कि मार्टिन लूथर किंग कहीं अमेरिका के राष्ट्रपति न हो जाएं।इस लिए उनके किसी राजनीतिक विरोधी ने संभव है कि पैसे देकर उनकी हत्या करवा दी हो।पर उनके राष्ट्रपति बन जाने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था।’ हालांकि जेम्स रे के इस जघन्य कारनामे के पीछे एक तर्क यह भी दिया गया कि रे के पुराने घर को एक नीग्रो परिवार ने खरीद लिया था।रे इस बात से काफी नाराज था।उसे इस खरीदारी के बाद सारी नीग्रो जाति से घृणा हो गई।उसके एक दोस्त राइफ ने बाद में बताया था कि इस के बाद वह अक्सर नीग्रो लोगों की बुराई करते हुए कहता था कि ‘ अमेरिका में रहने वाले सब काले लेागों को अफ्रीका भेज देना चाहिए।इन काले लोगों को तो हमारे देश में सांस लेने का भी अधिकार नहीं है। ’ दरअसल जेम्स रे अपने जीवन के आरंभिक दिनों से ही अपराधिक प्रवृत्ति का था।वह जन्मजात अपराधी था।गरीब परिवार में जन्मे जेम्स ने यह तय कर लिया था कि चोरी करके एक ही बार में इतना धन कमाया जा सकता है उतना वर्षों नौकरी करके या व्यापार धंधे में मगज खपाने से भी नहीं मिल सकता है। किंग की हत्या के बाद अमेरिका के कई शहरों में दंगे हुए।पर दंगे में अधिक अश्वेत ही मारे गए क्योंकि उनके पास हथियार अपेक्षाकृत कम थे।पर जहां तहां शांति मार्च भी निकले जिनमें दोनों समुदायों के लोग शामिल हुए।शांति जुलूसों और प्रार्थना सभाओं में कहीं झगड़े नहीं हुए। न्यूयार्क में 25 हजार लोगों ने ‘ सद्भावना के लिए जुलूस ’ निकाला।अमेरिकी राष्ट्रपति जानसन ने अपने संदेश में कहा था कि ‘इस दुःखद हत्या से सभी अमेरिकी शायद यह सीख सकें कि केवल मिलजुल कर काम करके ही हम समानता हासिल कर सकते हैं तथा जातीय पक्षपात से उत्पन्न समस्याओं पर भी एकता कायम रख कर ही विजय पाई जा सकती है।’आज जब ओबामा अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति हैं तो इससे यह बात भी साबित हुई है कि एकता से न सिर्फ समस्याओं पर विजय पाया जा सकता है किंतु कभी अश्वेत के लिए असंभव दिखने वाले राष्ट्रपति पद पर भी असीन हुआ जा सकता है। यह बात भारत सहित पूरी दुनिया पर भी लागू होती है।याद रहे कि मार्टिन लूथर किंग की हत्या के तत्काल बाद ही अमेरिकी सरकार ने न सिर्फ नीग्रो जाति के पक्ष में आवास संबंधी विधेयक जल्दी ही पारित करा दिया बल्कि सफाई कर्मचारियों की अधिकतर मांगंे भी पूरी कर दी गईं।किंग इन मंागों को लेकर अभियान चला रहे थे। प्रभात खबर (19-12-2008)

याद आते हैं हरे कृष्ण कोनार


पश्चिम बंगाल यदि आज भूमि सुधार के मामले में आदर्श राज्य माना जाता है तो उसका अधिक श्रेय हरे कृष्ण कोनार को मिलना चाहिए। वे अब नहीं रहे। पर, जब भी भूमि सुधार की समस्या पर कहीं चर्चा होती है तो हरे कृष्ण कोनार का भी नाम लिया जाता है। सी.पी.एम.नेता हरे कृष्ण कोनार सन् 1967 में बंगाल में गठित पहली गैर कांग्रेसी सरकार में राजस्व मंत्री थे। तब अजय मुखर्जी मुख्य मंत्री थे और तब तक बंगाल विधान सभा में सी.पी.एम.को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। अजय मुखर्जी कांग्रेस से निकले थे और उन्होंने अपना क्षेत्रीय दल बनाया था। यानी,अजय मुखर्जी एक परंपरागत नेता थे और भूमि सुधार के प्रति उनकी वैसी क्रांतिकारी राय नहीं थी जैसी माकपा की थी। इसके बावजूद तत्कालीन भूमि सुधार मंत्री कोनार की इच्छा के अनुसार बंगाल के किसाानों ने बेनामी और गैर मजरूआ जमीनों पर कब्जा करने का आंदोलन चलाया और वह आंदोलन काफी हद तक सफल रहा।मार्च 1969 से पहले ही बंगाल के दो लाख 38 हजार गरीब किसानों के बीच दो लाख 32 हजार एकड़ अतिरिक्त जमीन बांटी जा चुकी थी। प. बंगाल की वाम सरकार ने तो 1977 में भूमि सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाया जो देश भर में चर्चित हुआ। करीब 16 लाख बटाइदारों को उनका कानूनी हक दिलाने के लिए जो कानून बना,उसने वाम मोर्चा को एक बड़ा वोट बैंक प्रदान कर दिया।क्योंकि वाम मोर्चा ने हर चुनाव के पहले उन बटाइदारों को इस बात की याद दिलाई की कि कांग्रेस यदि दुबारा सत्ता में आ गई तो उन्हंे जमीन से बेदखल होना पड़ेगा।ंपर ,उसकी नींव कोनार ने डाल दी थी।वाम मोर्चा की सरकार के स्थायित्व का यह एक बड़ा कारण बताया जाता है। बटाईदार वाम मोर्चा के ठोस वोट बैंक हैं।पर उससे पहले ही कोनार का 1974 में निधन हो चुका था। हरे कृष्ण कोनार का जन्म 5 अगस्त 1915 को बंगाल के बर्दवान जिले के रायना थाने के कामारगडि़या गांव में हुआ था।उन्होंने 1930 में असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और वे 6 महीने तक जेल में रहे।बाद में वे विनय चैधरी और सरोज मुखर्जी के साथ ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जारी क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल हो गए। सितंबर 1932 में उन्हें बेगुट डकैती केस में 6 साल की सजा हुई।वे सन् 1933 में अंडमान निर्वासित कर दिए गए। जेल में उन्होंने माक्र्सवाद-लेनिनवाद का अध्ययन किया।वे 1938 में जेल से रिहा हुए और सी.पी.आई.में शामिल हो गए।उन्होंने किसान आंदोलन में काम किया।इस क्षेत्र में उनका अध्ययन इतना अधिक था कि आजादी के बाद सत्तर के दशक में भारत सरकार ने हरे कृष्ण कोनार को अफसरों को संबोधित करने के लिए देहरादून भेजा था।वहां उन्हें भूमि समस्या पर आयोजित सेमिनार में बोलना था।उससे पहले 26 मार्च 1948 को जब सी.पी.इ.को भारत सरकार ने गैर कानूनी घोषित किया तो देश के अन्य कम्युनिस्ट नेताओं के साथ- साथ कोनार को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। कोनार 1957 में मेमारी कालना चुनाव क्षेत्र से बंगाल विधान सभा के सदस्य चुने गए।1962 में वे कालना क्षेत्र से विजयी हुए।सन् सरसठ में वे उसी क्षेत्र से जीते। वे 1969 के मध्यावधि चुनाव में भी विजयरी हुए और फिर मंत्री बने।बाद के चुनाव में भी वे जीते, पर वे कैंसर से ग्रस्त हो गए और 23 जुलाई 1974 को उनका निधन हो गया।पर इतनी ही कम उम्र में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी।उन्होंने 9 सितंबर 1969 को तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को लिखे अपने पत्र में कहा था कि ‘कारगर भूमि सुधार में असफलता ने हमारे देश में एक शोचनीय स्थिति पैदा कर दी है।नतीजतन ग्रामीण अर्थ व्यवस्था बुरी तरह टूट गई है।’ उन्होंने लिखा था कि ‘हदबंदी कानून में निर्मम होकर संशोधन करना होगा।छूट खत्म करनी होगी। प्रति परिवार हदबंदी लागू करनी होगी।भूमि के हस्तानांतरण पर कठोरता से रोक लगाई जाए।पुरानी बंदोबस्ती में गैर कानूनी बंदोबस्तियों को रद्द करने का अधिकार सरकार को दिया जाना चाहिए।जमींदार और जोतदार हदबंदी को अंगूठा दिखा रहे हैं।उन्होंने अतिरिक्त जमीन को गैर कानूनी तरीके से अपने पास ही रख लिया है। इस पर कार्रवाई होनी चाहिए।’इस तरह उन्होंने केंद्र सरकार को कई और सुझाव दिए।जब उन्होंने प्रधान मंत्री को पत्र लिखा था,तब वे बंगाल में मंत्री थे। कोनार की बातें बिहार पर काफी हद तक अब भी लागू है।इस राज्य के पिछड़ापन बड़ा कारण यह है कि यहां भूमि सुधार नहीं हुए। बिहार में भूमि सुधार को लेकर सुझाव देने के लिए नीतीश सरकार ने बंगाल के ही एक भूमि सुधार विशेषज्ञ डी.बंदोपाध्याय की अध्यक्षता में आयोग बनाया था।उसने अपने सुझाव बिहार सरकार को दे दिए हंै। देखना है कि उसे बिहार में लागू किया जाता है या नहीं। प्रभात खबर (17-10-2008)

ऐसे विफल हुई थी नेहरू-जेपी सहयोग की कोशिश

कांग्रेस-सोशलिस्ट सहयोग की कोशिश पचास के दशक में सफल हो गई होती,यदि नेहरू ने बीमा,बैंक व खदान के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स की समाप्ति जैसी समाजवादियों की कुछ मांगें मान ली होतीं।समाजवादियों ने दोनों दलों के बीच आपसी सहयोग के लिए 14 सूत्री न्यूनत्तम कार्यक्रम का लिखित फार्मूला नेहरू को दिया था। पर, तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसे मानने से इनकार करते हुए कहा था कि ‘हमारा लक्ष्य क्या होना चाहिए,इसकी सूची बनाना काफी आसान है।लेकिन उचित प्राथमिकता के क्रम में उन्हें अमल में लाना ज्यादा कठिन है।’ तब जनसंघ और कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों व रणनीतियों से नेहरू नाराज रहते थे।इन दलों के बारे में नेहरू ने कहा था,‘कम्युनिस्ट पार्टी की दृष्टि में पार्टी और राज्य दोनों की संरचना एकात्मक होनी चाहिए।हिंसा के तरीकों के साथ उसका नजदीकी संबंध रहा है।अतः निश्चित तौर पर यह नीति, कांग्रेस के बुनियादी ढांचे एवं सिद्धांत और इसके शांतिमय तरीके एवं लोकतांत्रिक उद्देश्यों से काफी दूर रही है।दूसरी ओर सांप्रदायिक पार्टियां एक ऐसे नजरिए का प्रतिनिधित्व करती हैं,जो कांगेस के नजरिए के विपरीत है।वे विघटनकारी हैं और कभी -कभी कुछ हद तक पुनरूत्थानवादी एवं पूर्णतः प्रतिक्रियावादी हैं।’ ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक ही है कि नेहरू ऐसे लोगों के साथ एकजुटता के लिए सहमत हों जिनके साथ वे कभी काम कर चुके हों। साठ के दशक में इंदिरा गांधी के शासन काल में बैंकों का राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स की समाप्ति का काम जरूर हुआ,पर तब तक देर हो चुकी थी। यदि आज आर्थिक मंदी की चपेट में भारत कम ही आ पाया है तो इसका एक बड़ा कारण यह बताया जा रहा है कि यहां बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो चुका है। खैर इस माहौल में एक बार फिर ऐतिहासिक जेपी-नेहरू पत्र व्यवहार पर नजर डाल लेना मौजूं होगा।कांग्रेस-समाजवादी सहयोग की विफलता के बाद जवाहर लाल नेहरू और जय प्रकाश नारायण ने अलग -अलग प्रेस बयान जारी किए थे। 18 मार्च 1953 को पंडित नेहरू ने अपने लम्बे प्रेस बयान में कहा था कि ‘ मेरे लिए स्वाभाविक है कि जब कभी अवसर मिले,मैं अपने पुराने साथयों से मिलूं।उनमें से कुछ प्रजा समाजवादी पार्टी के नेता हैं।वे भारत की आजादी की लड़ाई के आजमाए हुए सैनिक हैं।हमने अपनी जिंदगी का अधिकतर हिस्सा साथ -साथ गुजारा है।चाहे जो भी मतभेद हों, लेकिन बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें कांग्रेस एवं प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के बीच नजरिए एवं तरीकों में समानता है।अतः इन दोनों दलों के लिए यह स्वाभाविक है कि जब कभी अवसर मिले वे किसी भी कार्य क्षेत्र में परस्पर सहयोग करें।इसलिए अक्सर मैंेने सोचा है कि इस सहयोगात्मक कार्य क्षेत्र को हमें व्यापक बनाना चाहिए।अपने इन्हीं विचारों के कारण मैंने जय प्रकाश नारायण को मिलने के लिए आमंत्रित किया।मिलने के बाद मैंने उनसे कहा कि हमें नजदीकी सहयोग की संभावना का पता लगाने की कोशिश करनी चाहिए।ऐसा सहयोग सभी स्तरों पर हो सकता है,सार्वजनिक स्तर पर भी और सरकार के स्तर पर भी।मैंने कांग्रेस-प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के विलय का प्रस्ताव नहीं रखा।हमने सोचा कि हमारे बीच काफी सहमति के बावजूद न्यूनत्तम कार्यक्रम आदि के बारे में किसी तरह का वायदा करने का अभी समय नहीं है।इसलिए हमने अभी इस लाइन पर आगे नहीं बढ़ने का फैसला किया।’ जय प्रकाश नारायण ने इस संबंध में 19 मार्च 1953 को अपने बयान में कहा कि ‘एक लम्बे समय से जवाहर लाल जी मुझसे मिलना चाहते थे।हम मिले।बातचीत से पता चला कि हमारे बीच सहमति का क्षेत्र काफी व्यापक है। इन वात्र्ताओं के दरम्यान प्रधान मंत्री ने हमारे सहयोग की इच्छा प्रकट की और स्पष्ट किया कि इसका मतलब सरकार और जनता दोनों स्तरों पर सहयोग है।’ ‘पहले की तरह अब भी व्यक्तिगत तौर पर मैं सेाचता हूं कि अगर दोनों तरफ हार्दिक इच्छा हो और समस्याओं के प्रति समान नजरिया हो तो राष्ट्रीय हित का तकाजा है कि संयुक्त प्रयास किए जाएं। 16 मार्च को आगे बातचीत के लिए प्रधान मंत्री से मैं पुनः मिला।इस अवसर पर उन्होंने सोचा कि अगले कुछ वर्षों के लिए एक न्यूनत्तम कार्यक्रम सामने रखने में अपनी दृष्टि से हमलोग सही थे लेकिन एक दूसरे को खास वायदे में बंाध देने से कोई खास फायदा नहीं होने जा रहा है। दूसरी ओर मुझे लगा कि काम के उभयनिष्ठ आधार के बिना सहयोग के , खासकर सरकारी स्तर पर , प्रयोग का निश्चित परिण्णाम द्वंद्व,निष्प्रभाव और असफलता में होगा। व्यक्ति तो आपसी समझदारी से साथ- साथ काम कर सकते हैं।पर ,मुझे लगता है कि बिना पारस्परिक सहमत कार्यक्रम के दो पार्टियां ऐसा नहीं कर सकतीं।नजरिए में इस भिन्नता के कारण प्रधान मंत्री ने सभी स्तरों पर सहयोग की जो बात उठाई थी,वह खत्म कर दी गई।’ प्रभात खबर (16-01-2009)

नेहरू का मनपसंद अखबार था मद्रास का ‘हिंदू’


जवाहर लाल नेहरू मद्रास के अंग्रेजी दैनिक ‘हिंदू’ को देश का सर्वोत्तम उत्पादित अखबार मानते थे। वे यह भी मानते थे कि संपादक एस.मुलगांवकर सर्वाधिक प्रभावशाली पत्रकारीय लेखन करते हैं।वे चाहते थे कि रोज शाम में उनके सामने हिंदू अखबार जरूर रखा जाए। ‘हिंदू’ उन दिनों दिल्ली से नहीं निकलता था।वह मद्रास से विमान से आता था।नेहरू हिंदू के संवाददाताओं को देश में सर्वोत्तम संवाददाता मानते थे।नेहरू के साथ वर्षों तक काम कर चुके एक निजी सचिव के अनुसार नेहरू किसी खास पत्रकार को अपना करीबी बनाने में विश्वास नहीं करते थे।इसके विपरीत उनके जमाने के कुछ बड़े नेताओं के अपने- अपने हमराज पत्रकार हुआ करते थे। यह आश्चर्य की बात है कि नेहरू को ‘हिंदू’ अखबार प्रिय था जबकि वह अखबार नेहरू की मिश्रित अर्थ व्यवस्था का समर्थक नहीं था।तब वह अखबार राजा गोपालाचारी की खुली अर्थ व्यवस्था की नीति का समर्थक था और उसके पक्ष में लेखन करता रहता था।वैसे भी नेहरू डा.राजेंद्र प्रसाद के बदले राजा गोपालाचारी को ही देश का प्रथम राष्ट्रपति बनाने पर अमादा थे। मिश्रित अर्थ व्यवस्था की विफलता के बाद खुली अर्थ व्यवस्था का कोई व्यक्ति समर्थक हो जाए तो बात समझ में भी आती है,पर पचास के दशक में तो सोवियत अर्थ व्यवस्था केे प्रति जब इस देश के एक बड़े हिस्से में रूमानी आकर्षण था तो राजा जी और ‘हिंद’ू को पसंद करना अजीब सा लगता है।हालांकि आज का ‘हिंदू’ आर्थिक मामलों मंे तब के ‘हिंद’ू की अपेक्षा बिलकुल अलग है। प्रेस के साथ नेहरू का व्यवहार कुल मिलाकर शालीन ही था।प्रेस भी तब कुछ ऐसा ही था।सरकार में आने से पहले कई अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की तरह ही नेहरू भी ‘नेशनल हेराल्ड’ के लिए अनेक लेख व संपादकीय लिखे थे। यानी, वे इस स्थिति में थे कि पत्रकारों और पत्रकारिता के बारे में वस्तुपरक आकलन कर सकें।पहले हिंदुस्तान टाइम्स और बाद में इंडियन एक्सपे्रस के संपादक रहे एस.मुलगांकर ने नेहरू की नीतियों की कई बार अपने लेखन में कड़ी आलोचना की।इसके बावजूद नेहरू ने सरकार के प्रचार कार्यों को बेहतर बनाने के लिए मुलगांवकर की सेवाएं लेनी चाहींं।पर मुलगांवकर ने कुछ ऐसी शत्र्तें रख दीं जिन्हें नेहरू पूरी नहीं कर सके।बात आई- गई हो गई। देश के एक नामी पत्रकार को नेहरू सन् 1952 में सूचना व प्रसारण राज्य मंत्री बनाना चाहते थे।पर उस पत्रकार बी.शिवा राव ने कैबिनेट का दर्जा मांग लिया।इस पर नेहरू खिन्न हो गए और अपना यह विचार त्याग दिया।चर्चित पत्रकार दुर्गा दास को लेकर नेहरू ने एक बार जरूर घनश्याम दास बिड़ला से शिकायत की थी।दुर्गा दास हिंदुस्तान टाइम्स में नेहरू के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां करते थे।टाइम्स आॅफ इंडिया को लेकर भी एक बार नेहरू आर.के.डालमिया पर सख्त नाराज हुए थे।पर नेहरू ने इस नाराजगी के कारण अखबार का सरकारी विज्ञापन बंद नहीं कराया।हां,उन्होंने अपने स्टाफ को यह जरूर निदेश दे दिया कि यह अखबार उनके सामने नहीं लाया जाए।उन दिनों डालमिया ही उस अखबार समूह के मालिक थे।बाद में जब उनके रिश्तेदार शांति प्रसाद जैन ने इस समूह को संभाला तो यह नहीं सुना गया कि इस अखबार समूह ने कोई सरकार विरोधी अभियान चलाया हो। वैसे भी तब ‘की होल’ और इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म का जमाना नहीं था।तब देश के अधिकतर बड़े नेताओं की राजनीति का एकमात्र उद्ेश्य सरकारी खजाने को लूट कर घर भरना भी नहीं था। नेहरू यह अच्छी तरह जानते थे कि मीडिया के एक हिस्से का यह अतिशयोक्तिपूर्ण दावा सही नहीं है कि लोक अभिमत को सिर्फ वह नेताओं की अपेक्षा अधिक प्रतिनिधित्व करता है।इसलिए जो पत्रकार इस गुमान में रहते थे,उनकी वे परवाह कम ही करते थे।एक दिलचस्प किंतु शर्मनाक वाकया ब्लिट्ज के मुतल्लिक सामने आया था।तब के अगिया बैताल संपादक आर.के.करंजिया ने अपनी साप्ताहिक पत्रिका ब्लिट्ज में यह खबर छापी कि इंदिरा गांधी ने एक व्यापारी से अनेक साडि़यां उपहार में ले ली हैं।इस खबर पर नेहरू खफा थे।उनके अनुसार यह खबर सही नहीं थी।उन्होंने मशहूर वकील कैलाश नाथ काटजू से संपर्क किया।उन्होंने सलाह दी कि ब्लिट्ज को लीगल नोटिस दी जाए और माफीनामा छापने को कहा जाए।धमकी दी गई कि प्रमुखता से क्षमा याचना छापिए अन्यथा कानूनी कार्रवाई की जाएगी।ब्लिट्ज के पास साड़ी स्वीकार करने का कोई सबूत तो था नहीं।उसने माफीनामा छाप दिया। ऐसी सनसनीखेज व बिना सबूत की खबरें छापने वाले प्रेस से निपटने का नेहरू का कानूनी तरीका अनेक लोग पसंद करते थे।बाद के वर्षों में इस देश व प्रदेश के अनेक नेताओं ने अपने भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए मीडिया के खिलाफ सत्ता के नशे में जो कुछ कार्रवाइयां कीं और आज भी कई सत्ताधारी नेता कर रहे हैं,वे कार्रवाइयां देर सवेर उनके ही राजनीतिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह साबित हुई और होने वाली भी है। प्रभात खबर (14-11-2008)

गांधी के प्रति जेल में पटेल का मातृवत् स्नेह


महात्मा गांधी तथा सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे शीर्ष नेता भी अपने राजनीतिक सह कर्मियों के स्वास्थ्य व अन्य निजी समस्याओं का भी कितना ध्यान रखते थे, इसका पता उनके आपस के पत्र- व्यवहार व लेखों से चलता है।

महात्मा गांधी की जेल में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जो सेवा की, उससे अभिभूत होकर गांधी जी ने उसे मातृवत् स्नेह करार दिया।

इस संबंध में ़महात्मा गांधी ने 8 मई 1933 को लिखा कि ‘मेरे जीवन के महानतम सुखों में से एक था कि मुझे सरदार के साथ जेल में रहने का अवसर प्राप्त हुआ। मैं उनके अजेय साहस तथा देश के लिए अद्वितीय प्रेम के बारे में तो जानता था, लेकिन उनके साथ 16 महीने का लंबा समय बिताने का सौभाग्य पहले मुझे प्राप्त नहीं हुआ था। उनके अनुराग और प्रेम से मैं इतना अभिभूत हो गया कि मुझे अपनी प्रिय मां का स्मरण हो आया। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उनमें मातृवत् स्नेह जैसे गुण मौजूद हैं। यदि मैं थोड़ा सा भी अस्वस्थ होता तो वे हाजिर हो जाते और मेरी छोटी से छोटी आवश्यकता पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देते। उन्होंने और उनके सहयोगियों ने अपने बीच निश्चय किया कि वे मुझे कुछ भी कार्य नहीं करने देंगे। मैं आशा करता हूं कि सरकार मेरा विश्वास करेगी कि जब भी हमने राजनीतिक चर्चा की, वह ऐसे व्यक्ति थे जो सरकार की मुश्किलों को महसूस करते थे। बारदोली और कैरा के किसानों की चिंता और कष्टों के प्रति वह कितना चिंतित रहते थे, यह मैं कभी नहीं भूलूंगा।’

सरदार वल्लभ भाई पटेल, जो आजादी के बाद देश के उप प्रधान मंत्री और गृह मंत्री बने थे, यह भी चाहते थे कि महात्मा गांधी यदि पूर्ण स्वस्थ नहीं हैं तो उन्हें अधिक श्रम नहीं करना चाहिए। यहां तक कि अपने हाथ से पत्र भी नहीं लिखना चाहिए।

सरदार पटेल ने 5 जून 1933 को महात्मा गांधी को लिखा, ‘आदरणीय बापू, लगभग एक मास बाद मुझे आपका हस्तलेख देखने का सौभाग्य मिला। हम बहुत प्रसन्न हुए। हम दोनों ठीक हैं। चिंता करने का क्या फायदा, मेरी चिंता का कोई प्रभाव नहीं हो सकता। आपकी फिक्र करने को ईश्वर है।’ सरदार पटेल ने लिखा, ‘अपने हाथ से पत्र लिखने में जल्दीबाजी न करें। शरीर में ताकत आने दें। तब तक आप महादेव को लिखने का आदेश दें और आप केवल पत्रों पर हस्ताक्षर करें, इतना ही काफी है। वल्लभ भाई की शुभकामनाएं और प्रणाम।’

देखिए, सरदार पटेल की रोगग्रस्त नाक की समस्या पर महात्मा गांधी ने जेल से कैसा पत्र लिखा। मेजर भंडारी को 20 मार्च 1933 को गांधी जी ने लिखा,‘ प्रिय मेजर भंडारी, मैंने अनेक बार सरदार वल्लभ भाई पटेल की नाक की समस्या के बारे में आपको बताया। आप जानते हैं कि इस पर बात करने की उनकी अनिच्छा ही रहती है। लेकिन हमलोग जो इसके बारे में जानते हैं, आशंकित हैं। जब तक इसका दौरा समाप्त नहीं होता, वह तड़पते रहते हैं। आपने और मेजर मेहता ने जो इलाज सुझाए, सब नाकाम रहे। दौरे जल्दी -जल्दी पड़ रहे हैं और अधिक कष्टप्रद होते जा रहे हैं। गत शनिवार को सबसे भयंकर दौरा पड़ा। 30 घंटे से अधिक नाक बहती रही। आंखें खून जैसी लाल हो गई थीं। पूरे दिन उन्होंने कुछ नहीं खाया। सुबह केवल चाय पी और शाम को दूध, फल और उबली हुई सब्जियां खाई। वह अपना सामान्य भोजन नहीं ले पा रहे हैं। मैं महसूस करता हूं कि विशेषज्ञों द्वारा इनकी जांच कराने का समय आ गया है। भवदीय, एम.के.गांधी।’

गांधी जी उम्र जैसे -जैसे बढ़ रही थी,सरदार पटेल चाहने लगे थे कि उन्हें अनावश्यक तनाव व कार्याधिक्य से मुक्त ही रखा जाए। एक अक्तूबर 1935 को सरदार पटेल ने एक बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि ‘लोग मुझसे पूछते हैं कि गांधी जी कांग्रेस में कब वापस आएंगे, तो मैं उत्तर देता हूं कि महात्मा गांधी 67 वर्ष के हैं।हम उनसे कितनी अपेक्षाएं और रख सकते हैं ? अब हमें उनके अधूरे कार्य को पूरा करना चाहिए।’

निजी दुखों को भुला कर भी सरदार पटेल आजादी के लिए जेल यातना सह रहे थे। अक्तूबर , 1933 में सरदार पटेल के अपने भाई का निधन हो गया। तब सरदार नासिक सेंट्रल जेल में थे। बंबई के बहुत से लोगों की इच्छा थी कि दाह संस्कार में शामिल होने के लिए सरदार पेरोल पर जेल से बाहर आएं। पर, उन लोगों को जवाब देते हुए सरदार ने जेल से लिखा, ‘जेल से बाहर आने की मांग करना न तो मुझे शोभा देता है और न ही राष्ट्र को।सत्याग्रही के लिए यह उचित नहीं है कि वह सरकार पर अनुचित दबाव डाले जिसमें ऐसी स्थिति से फायदा उठाया जाए।’

प्रभात खबर (12-09-2008)

भारत में सफल, पर चीन में क्यों विफल हुए यूरोपियन

अंग्रेज गवर्नर वारेन हेस्ंिटग्स @1772-1785@ने खुद ब्रितानी संसद में बड़े अभिमान के साथ यह कबूल किया था कि उसने किस तरह भारतीय शासकों के बीच फूट डाल कर राज किया। आज जब एक बार फिर इस देश में विभाजनकारी शक्तियां सिर उठा रही हंै, वारेन के इन शब्दों को याद करके उनसे कुछ सीख लेना जरूरी है, ‘ महान भारतीय संघ के एक सदस्य निजाम को ठीक मौके पर उसका कुछ इलाका वापस करके संघ से फोड़ा।दूसरे मूदाजी भोंसले के साथ मैंने गुप्त पत्र-व्यवहार जारी रखा और उसे अपना मित्र बना लिया।तीसरे माधो जी सिंधिया को दूसरे कामों में लगाकर और पत्र व्यवहार करके मैंने भुलाए रखा और सुलह के लिए बतौर अपने हथियार के उसका उपयोग किया।’ अंग्रेजों की इस फूट नीति और कूटनीति के बारे में सुंदर लाल ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘भारत में अंग्रेजी राज’ में विस्तार से लिखा है।सुंदर लाल ने लिखा कि ‘ वारेन हेस्टिंग्स के समय में हिंदुस्तान के अंदर ईस्ट इंडिया कम्पनी का इलाका नहीं बढ़ा।फिर भी वारेन का शासन काल ब्रिटिश भारत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्लाइव ने इस देश के अंदर अंग्रेजी राज की जो बुनियाद डाली थी,वारेन ने भारत की राज शक्तियों को और अधिक कमजोर करके उन बुनियादों को पक्का कर दिया।’ अंग्रेजों के आने से पहले मध्य युग में भी विदेशी हमलावरों ने हमारी आपसी फूट का भरपूर लाभ उठाया था।अंगेजों के जमाने में भी हमारे देशी शासकों ने इतिहास से नहीं सीखा।कम से कम आज तो हम पूरी तरह चेत जाएं, इसके लिए जरूरी है कि हम भूले-बिसरे प्रकरणों को याद करते रहेंं। वारेन हेस्टिंग्स कैसा शासक था,इसके बारे में खुद लार्ड मैकाले ने लिखा था,‘ वारेन हेस्टिंग्स ने भी चाहे ईमानदारी से हो चाहे बेईमानी से,जिस तरह हो सके , भारत से धन बटोरने का निश्चय कर लिया।देश की स्थिति का उसे पूरा ज्ञान था और सूझ की भी कमी उसमें नहीं थी।’ अंग्रेजों ने इस देश के साथ क्या- क्या किया,उसकी एक झलक उस चर्चा से मिलती है जो ब्रिटिश संसद में हुई थी।चर्चा सन् 1804 के दूसरे मराठा युद्ध के औचित्य को लेकर हुई थी।सर फिलीप फैं्रसिस ने संसद में कहा था कि ‘भारत के साथ हमारा संबंध कैसे शुरू हुआ,इसके बारे में मुझे आपको यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है कि शुरू में हमारा संबंध केवल तिजारत का था।देशी नरेशें ने भी हम पर संदेह नहीं किया,बल्कि हर तरह से हमारे साथ अनुग्रह का व्यवहार किया।उन्होंने न केवल तिजारत करने और उससे खूब फायदा उठाने के लिए हमें हर तरह की सुविधा प्रदान की,बल्कि ऐसी -ऐसी रियायतें और माफियां भी हमें दे दीं जो उनकी अधिकांश प्रजा को भी प्राप्त न थीं।’ ‘ व्यापार की दृष्टि से विदेशी कौमों के साथ अपनी तिजारत को बढ़ने का मौका देना देशी नरेशों के लिए बुद्धिमता थी, किंतु जबकि उनकी तिजारती आंखें खुली हुई थीं,उनकी राजनीतिक आंखें बंद थीं।उन्होंने उन असूलों पर काम नहीं किया,जिन असूलों पर चीन वालों ने काम किया और जिनके कारण यूरोपियन कौमें चीन पर अपनी सत्ता जमाने में सफल न हो सकीं।’ सर फिलिप फ्रैंसिस ने अपने भाषण में यह भी दिखलाया कि किस तरह अंग्रेज शासक भारतीय नरेशों के खासकर उस समय के सिंधिया के चरित्र पर बिलकुल झूठे दोष लगा कर उसे बदनाम करते थे और किस तरह के छलों द्वारा उन नरेशों की स्वाधीनता हरते थे।उन्होने कहा था कि ‘पहले हमने तिजारत शुरू की, तिजारत से कोठियां हुईं, कोठियों से किलेबंदी , किलेबंदी से सेनाएं, सेनाओं से देश विजय और विजयों से हमारी आजकल की हालत।’ उनकी राय में भारत मंे इलाके के विजय करने और अपने राज्य को बढ़ाने की योजनाएं करना अंग्रेज कौम की इच्छा के विरूद्ध है।’ एक अन्य अंग्रेज इतिहासकार ने ठीक ही लिखा है कि ‘हमलोगों में यह रिवाज है कि पहले किसी देशी नरेश का राज उससे छीन लेते हैं।फिर पदच्युत नरेश पर और उसके बनने वाले उत्तराधिकारी पर झूठे कलंक लगा कर उसे बदनाम करते हैं।’ इतने चतुर व घाघ अंग्रेज शासकों से लड़कर हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने भारी संघर्ष व बलिदान के बलकर हमें आजादी दिलाई है।पर आज इस कीमती आजादी को बचाए रखने के लिए हमें जो कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए,वे सावधानियां क्या हम बरत रहे हैं ? आज राजनीतिक गुलामी की तो नहीं, पर इस देश पर आर्थिक गुलामी का खतरा तो बरकरार है ही। इतिहास से शिक्षा लेकर हम किसी नए खतरे से जरूर बच सकते हैं।इतिहास से शिक्षा तभी मिलेगी जब हम अपना सही -सही इतिहास पढ़ेंगे। पर इस देश के कई बुद्धिजीवियों और इतिहासज्ञों के साथ दिक्कत यह है कि वे हमें एक खास तरह का इतिहास ही पढ़ाना चाहते हैं। प्रभात खबर (2-1-2009)

सात सौ साल पहले के हमारे फल और अनाज

यह तो पीजा और बर्गर तथा अन्य आधुनिक देसी-विदेशी भोज्य पदार्थों का युग है। पर,इस मौजूदा युग की नई पीढ़ी के लिए यह जान लेना रूचिकर होगा कि करीब सात सौ साल पहले के भारत के प्रमुख फल और अनाज कैसे और कौन -कौन थे। यानी सात सौ साल पहले के हमारे पूर्वज किन- किन अनाजों और फलों पर निर्भर थे।इस संबंध में इतिहास प्रसिद्ध विदेशी यात्री इब्न बतूता ने अपने यात्रा वृतांत में चैदहवीं शताब्दी के भारत के मुख्य अनाजों और फलों का वर्णन किया है। अबू अब्दुला मुहम्मद उर्फ इब्न बतूता ने भारत के तब के आम, कटहल, जामुन,नारंगी, महुआ का वर्णन किया है।इसी तरह अनाजों के बारे में उसने लिखा है कि ‘यहां साल में दो फसलें होती हैं।गर्मी पड़ने पर वर्षा होती है और उस समय खरीफ की फसल बोई जाती है।यह फसल बोने के साठ दिन पीछे काटी जाती है।अन्य अनाजों के अतिरिक्त इसमें निम्नलिखित अनाज भी उत्पन्न होते हैं-कोदो,चीना,शामाख यानी सांवक जो चीना से छोटा होता है और विरक्तों, साधुओं, संन्यासियों तथा निर्धनों के खाने के काम आता है।एक हाथ में सूप और दूसरे हाथ में छोटी छड़ी लेकर पौधे को झाड़ने से सांवक के दाने जो बहुत ही छोटे होते हैं, सूप में गिर पड़ते हैं। धूप में सुखा कर काठ की ओखली में डाल कर कूटने से इनका छिलका पृथक हो जाता है और भीतर का श्वेत दाना निकल आता है।इसकी रोटी भी बनाई जाती है और खीर भी पकाते हैं। भैंस के दूध में इसकी बनी हुई खीर रोटी से कहीं अधिक स्वदिष्ट होती है।मुझे यह खीर बहुत प्रिय थी,और मैं इसको बहुधा पका कर खाया करता था।’ रबी और खरीफ के बारे में बतूता लिखता है कि ‘खरीफ की फसल बोने के साठ दिन पश्चात धरती में रबी की फसल का अनाज - गेहूं, चना, मसरी, जौ इत्यादि बो दिए जाते हैं।यहां की धरती अच्छी है और सदा फूलती -फलती रहती है।धान तो एक वर्ष में तीन बार बोया जाता है।इसकी उपज भी अन्य अनाजों से कहीं अधिक होती है।’ ‘मूग भी मटर की तरह है।परंतु मूंग कुछ लंबी और हरे रंग की होती है।मूंग और चावल की खिचड़ी नामक भोजन विशेष रूप से बनाया जाता है।जिस तरह हमारे देश मोराको में प्रातःकाल निहारमुख हरीरा लेने की प्रथा है,उसी प्रकार यहां के लोग घी मिला कर खिच़ड़ी खाते हैं।मोठ अनाज तो होता है कजरू के समान, परंतु दाना अधिक छोटा होता है। यह अनाज भी घोड़ों और बैलों को दाने के रूप में दिया जाता है।यहां के लोग जौ को इतना बलदायक नहीं समझते इसी कारण चने अथवा मोठ को दल लेते हैं और पानी में भिंगों कर घोड़ों को खिलाते हैं।घोड़ों को मोटा करने के लिए हरे जौ खिलाते हैं।इसके अतिरिक्त तिल और गन्ना भी इसी खरीफ फसल में बोया जाता है।’ फलों में आम का वर्णन इब्न बतूता ने कुछ इस तरह किया है, ‘इस देश में आम नामक एक फल होता है जिसका वृक्ष होता तो नारंगी की भाति है,पर डील में उससे कहीं अधिक बड़ा होता है।पत्ते खूब सघन होते हैं।इस वृक्ष की छाया खूब होती है।परंतु इसके नीचे सोने से लोग आलसी हो जाते हैं।फल अर्थात आम, आलू बोखारे से बड़ा होता है।कच्चे में लोग आम का अचार बनाते हैं।आम के अतिरिक्त इस देश में अदरक और मिर्च का भी अचार बनाया जाता है।कटहल का वृक्ष बड़ा होता है। कटहल के फल पेड़ की जड़ में लगते हैं।यह खूब मीठा और सुस्वादु होता है।प्रत्येक कोये के भीतर बाकले की भांति गुठली होती है। बाकला इस देश में नहीं होता। कटहल की गुठली को भून कर या पका कर खाने से इसका स्वाद भी बाकले सा प्रतीत होता है।लाल रंग की मिट्ठी दबा कर रखने से ये गुठलियां अगले वर्ष तक भी रह सकती हैं।इसकी गणना भारत वर्ष के उत्तम फलों में की जाती हैं।’ ‘जामुन का बड़ा पेड़ होता है।फल जैतून की भांति होता है।नारंगी इस देश में बहुत होती है।नारंगियां अधिकतया खट्टी नहीं होतीं।महुआ का पेड़ बहुत बड़ा होता है।फल छोटे आलू बोखारे की तरह होता है और बहुत मीठा होता है।भारत में अंगूर बहुत ही कम होता है।दिल्ली तथा अन्य कतिपय स्थानों के अतिरिक्त शायद ही कहीं होता हो।महुए के पेड़ साल मेंे दो बार फलते हैं।इसकी गुठली का तेल निकाल कर दीपों में जलाया जाता है।कसेहरा यानी कसेरू धरती से खोद कर निकाला जाता है।यह कसतल की भांति होता है।बहुत मीठा होता है।हमारे देश के फलों में से अनार भी यहां होता है और वर्ष में दो बार फलता है।माल द्वीप समूह में अनार के पेड़ में मैंने बारहों महीने फल देखे।’ प्रभात खबर (12-12-2008)