शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

मनरेगा को किसानों से जोड़ने की सलाह पर विचार जरूरी


   देश के कुछ हिस्सों में कृषि संकट, राजनीतिक संकट का स्वरूप ग्रहण कर रहा है।यह संकट बिहार में भी है।पर अभी प्रारंभिक अवस्था में है।
बिहार के किसान नीतीश  सरकार से इस बात से तो खुश हैं कि कानून -व्यवस्था नब्बे के दशक की अपेक्षा  बेहतर है और विकास भी हो रहे हैं।पर जरूरत के अनुसार उन्हें मजदूर नहीं मिलने के कारण वे दुःखी भी हंै । 
कृषि संकट का सबसे बड़ा कारण यह है कि किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिल रहा है।खेती महंगी होती जा रही है। घाटे का सौदा है।
कुछ किसान अपने कुछ खेत परती छोड़ दे रहे हैं।
   अनाज के लिए गोदाम और कोल्ड स्टोरेज की भारी कमी के कारण किसानों के लिए अपनी उपज को
अधिक दिनों तक अपने पास रखना कठिन हो रहा है।
जल्द बेचने के कारण दाम कम मिल रहे हैें।औने -पौने दाम में उपज बेचनी पड़ रही है।
उधर खेती में लागत खर्च बढ़ता जा रहा है।
मनरेगा के कारण बुवाई और कटाई के मौसम में मजदूर कम मिल रहे  हैं या नहीं मिलते हैंे।
  2011 में तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह को सलाह दी थी कि बुवाई और कटाई के समय मनरेगा को स्थगित रखा जाना चाहिए ताकि किसानों को आसानी से मजदूर मिल सकें और खेती के काम ठीक से हो सके।
  पर प्रधान मंत्री ने उनकी सलाह नहीं मांनी।प्रधान मंत्री को लगा होगा कि शायद इससे मजदूरों को नुकसान होगा।या फिर मनरेगा की ‘मलाई’ खाने वाले बिचैलियों ने शरद पवार की सलाह को लागू नहीं होने दिया होगा !
 पर इसका एक उपाय यह भी हो सकता है।  
सरकार मनरेगा से जुड़े मजदूरों को खेती के दिनों में किसानों से जुड़ जा़ने की छूट दे।यानी मनरेगा के मजदूर गैर सरकारी जमीन में भी काम करें।
इसके लिए नियम बदले जाएं ।अभी मनरेगा मजदूर सरकारी जमीन में ही काम कर सकते हैं।
 उन मजदूरों को मजदूरी के रूप में कुछ पैसे सरकार दे और कुछ किसान।दोनों मिलकर उन्हें इतने पैसे मिल जाएं  ताकि वह राशि मनरेगा के तहत फिलहाल मिलने वाली राशि से अधिक हो जाए।इस साल मनरेगा पर केंद्रीय बजट 48 हजार करोड़ रुपए का था।यदि किसान भी कुछ पैसे मजदूरों को देने लगेंगे तो इस मद में सरकारी बजट खर्च घट सकता है। 
इससे मजदूरों को भी लाभ होगा और किसानों को भी।
 खेती बर्बाद नहीं होगी और खेती से जुड़े परिवारों के नौजवान सरकारी नौकरियों के लिए सरकार पर अधिक दबाव नहीं डालेंगे।
राज्य सभा की सदस्यता के लिए  इतना  हंगामा क्यों ?---
आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास ऐसे उच्च सदन में जाने से लिए बेचैन हैं जहां गत माह  ‘भारत रत्न’ को भी बोलने का मौका नहीं मिल सका।सचिन तेंदुलकर को अपनी एक जरूरी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ा।
  कुमार विश्वास  ‘भारत रत्न’ तो हैं नहीं।
विश्वास जी, पता नहीं, राज्य सभा में चले भी जाइएगा तो कितना बोल पाइएगा ?
आप एक अच्छे कवि हैं।श्रोताआंे को  मंचों से आनंदित करते रहिए।इस गलतफहमी में मत रहिए कि आपके कारण लोग आप को वोट देते हैं।आम धारणा यह है कि ‘आप’ का जो भी वोट है, वह केजरीवाल के कारण है।
 राज्य सभा की सदस्यता चार्टर्ड एकांउटेंट और व्यापारियों के लिए छोड़ दीजिए ।
एक व्यक्ति ‘आप’ के लिए चंदा का जुगाड़ करेंगे और दूसरे उस चंदे का एकाउंट ठीक रखेंगे।
  यदि ‘आप’ या उसके किसी खास बड़े नेता की  कानूनी परेशानियां बढ़ने लगेंंगी  तो अगली बार केजरीवाल साहब किसी बड़े वकील को राज्य सभा में भेज सकते हैं।
 आप की सुंदर कविताओं से न तो पार्टी को चंदा मिलेगा और न ही चुनाव आयोग संतुष्ट होगा ।याद रहे कि चुनाव आयोग बार- बार ‘आप’ से कह रहा है कि आप अपने करोड़ों के चंदे का हिसाब तो दे दीजिए।

  एक भूली बिसरी याद----
अब तो किसी सजायाफ्ता को चुनावी टिकट से वंचित करने के लिए जन प्रतिनिधित्व कानून में प्रावधान कर दिया गया है।
पर 1969 में तो कांग्रेस ने बिहार के अपने ऐसे छह प्रमुख  नेताओें के टिकट काट दिए थे जिनके खिलाफ सिर्फ न्यायिक जांच आयोग गठित किया गया था।
यानी 1969 की कांग्रेस आज की अधिकतर राजनीतिक पार्टियों की अपेक्षा लोकलाज का अधिक ध्यान रखती थी।हालांकि अब तो कांग्रेस का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है।
   जिन छह नेताओं के टिकट कटे थे,उनके नाम हैं के.बी.सहाय,महेश प्रसाद सिंहा,सत्येंद्र नारायण सिंहा ,राम लखन सिंह यादव ,अम्बिका शरण सिंह और राघवेंद्र नारायण सिंह।उपर्युक्त नेताओं के खिलाफ सन 1967 में गठित गैर कांग्रेसी   सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए न्यायिक जांच आयोग बनाया था।आयोग के अध्यक्ष थे सुप्रीम कोर्ट के जज रह चुके टी.एल.बेंकटरामा अय्यर।
   उन नेताओं के खिलाफ किस तरह के आरोप थे और उनके खिलाफ  आयोग ने क्या रपट दी, यह इस लेख का विषय नहीं है।अभी अवसर सिर्फ टिकट कटने की एक बड़ी कहानी कहने का है।इस संबंध में पूर्व मुख्य मंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह ने ‘मेरी यादें मेरी भूलें ’में लिखा है कि ‘अप्रैल 1969 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का अधिवेशन फरीदाबाद में हुआ।उससे पहले आम चुनाव हो गया था।उस चुनाव के लिए जिन उम्मीदवारों का चयन हुआ,उनमें के.बी.सहाय,महेश बाबू,राम लखन सिंह यादव,अम्बिका बाबू और राघवेंद्र बाबू और मुझे टिकट नहीं दिए गए।क्योंकि  हमलोगों पर आरोप लगाकर अय्यर कमीशन गठित कर दिया था।अभी तो जांच चल ही रही थी कि टिकट काट दिए गए।इसके अलावा हमलोगों को टिकट न देने का उद्देश्य यह भी था कि बिहार कांग्रेस के नेतत्व में परिवत्र्तन किया जाए। कांग्रेस के कुछ  प्रमुख नेतागण  डा. राम सुभग सिंह को बिहार में नेता बनाना चाहते थे।’
    जो बातें सत्येंद्र बाबू ने नहीं लिखी ,वह यह है कि दरअसल स्वतंत्रता सेनानी व केंद्र में लंबे समय तक मंत्री रहे  डा.राम सुभग सिंह  स्वच्छ छवि के नेता थे।उन्होंने सत्ता का दुरूपयोग करके कोई संपत्ति  बनाई हो,ऐसी कोई जानकारी अब तक इन पंक्तियों लेखक को नहीं है।
इस पहल के लिए उस समय की कांग्रेस की प्रशंसा की जानी चाहिए।

   पता विहीनता की समस्या ----
सरकार के डाक महकमे की नजर में मेरा कोई पता नहीं है।
दरअसल पिछले दिनों जय पुर के एक प्रकाशक  ने 
मेरे नाम एक पुस्तक भेजी।पुस्तक रजिस्टर्ड पोस्ट के जरिए भेजी गयी थी।
उसका नंबर है --सी आर 147213010 आइ एन ।वह किताब जब कई दिनों के बाद भी मेरे यहां नहीं पहुंची तो मैंने जय पुर फोन किया।प्रकाशक ने मुझे बताया कि डाक महकमे को आपके घर का पता नहीं मिला ,इसलिए वह किताब लौट आई है।प्रकाशक ने रसीद की फोटो काॅपी भी व्हाॅटसेप पर भेज दी है।प्रकाशक  ने न  सिर्फ सही पता लिखा है बल्कि मेरा मोबाइल नंबर और पिन कोड भी लिख दिया था।यह सब रसीद में भी दर्ज है।
 याद रहे कि पटना के पास के खगौल के नजदीक  के गांव में स्थित मेरे घर अक्सर सामान्य डाक व रजिस्टर्ड लेटर आते रहते हैं।
कभी -कभी प्रायवेट कूरियर वाले भी पहुंच जाते हैं।
  पर इस बार क्या हुआ ?
क्या कोई संबंधित डाक अधिकारी इसकी पड़ताल करेंगे ?
डाक  विभाग एक विश्वसनीय महकमा  माना जाता है।
उसे अपनी विश्वसनीयता बनाये रखनी चाहिए अन्यथा प्रायवेट कूरियर की पहले से ही चांदी है और भी हो जाएगी।

       और अंत में----
  मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने अधिकारियों को निदेश दिया  है कि अपराध नियंत्रण के लिए राज मार्गों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं।
यह बहुत अच्छा कदम है।पर कैमरे लगाने के साथ ही  शासन को चाहिए कि वह ऐसे दस्ते भी बनाए जो निरंतर यह देखता रहे कि वे कैमरे काम कर भी रहे हैं या नहीं।अन्यथा, यह प्रयास भी विफल हो जाएगा।

बुधवार, 3 जनवरी 2018

  कुछ लोग सवाल कर रहे हैं कि आम आदमी पार्टी ने कुमार विश्वास और आशुतोष जैसे नेताओं की जगह  दो अन्य ‘अनजान’ व्यक्तियों को राज्य सभा में भेजने का निर्णय क्यों किया ?
दरअसल वे लोग अरविंद केजरीवाल की कुछ समस्याएं समझ नहीं पा रहे हैं ।ऐसी समस्याएं  पार्टी को चलाने वाले किसी नेता के समक्ष ही आती हंै।अब तो हर पार्टी को एक ‘चंदा बटोरू’ चाहिए और दूसरा उस चंदे का हिसाब रखने वाला ।
   आयकर विभाग  ‘आप’ को  कुछ करोड़ रुपए के चंदे का हिसाब देने के लिए अब तक  सिर्फ  34 बार मौका दे चुका है।पार्टी शायद जवाब नहीं दे सकी है।
 उस नोटिस से मुक्ति पाने का रास्ता  कुमार विश्वास की कविता से तो  मिलेगा नहीं ! कोई सी.ए.ही बता  सकता है। 
किसी सी.ए. साहब को  अलग से फीस न  देनी पड़े, इसलिए राज्य सभा की सीट दे दो।वह तो मुफ्त में अरविंद केजरीवाल के पास उपलब्ध है। कोई नेता गंभीर मुकदमे में फंसता है तो किसी वकील को राज्य सभा में पहुंचा ही तो देता है !
‘आप’  तो ‘पार्टी विथ ए डिफरेंस’ का तमगा खुद ही बहुत पहले ही अपने सीने से नांेच कर फेंक चुकी है।
वैसे भी ‘भाजपा बनाम शत्रुघ्न सिंहा’ के अनुभव के बाद कोई पार्टी किसी ‘फ्री थिंकर’ या ‘फ्रीलांसर’ को संसद में भला क्यों भेजेगी ? फ्री थिंकर लोग किसी भी पार्टी के लिए देर -सवेर सिरदर्द साबित हो जाते हैं।कभी राज्य सभा में रहते हुए,कभी राज्य सभा का अगली बार टिकट न मिलने पर।
भविष्य गड़गड़ देख कर कुछ लोग बीच में ही पार्टी का साथ छोड़  जातेे हैं।    

लालू की सजा पर न होता बवाल अगर इस चेतावनी पर किसी ने किया होता गौर

      
           
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डी.संजीवैया ने सन 1963 में ही इन्दौर के अपने भाषण में कह दिया था कि ‘वे कांग्रेसी जो 1947 में भिखारी थे, वे आज करोड़पति बन बैठे।
गुस्से में बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने तब यह भी कहा कि ‘झोपडि़यों का स्थान शाही महलों ने और कैदखानों का स्थान कारखानों ने ले लिया है।’
  आंध्र प्रदेश के मुख्य मंत्री रहे संजीवैया का वह भाषण एक गंभीर चेतावनी की तरह था।
पर सत्ताधारियों द्वारा उसे भी गंभीरता से नहीं लिया गया।
नतीजतन समय बीतने के साथ इस देश में भ्रष्टाचार  बढ़ता ही चला गया।और अब जब लालू प्रसाद जैसे नेताओं पर छिटपुट कार्रवाइयां हो रही हैं, तो वह सामाजिक तनाव बढ़ाने का कारण भी बन रही है।सवाल उठाया जा रहा है कि जब आजादी के तत्काल बाद से ही सत्ताधारियों ने देश को लूटना शुरू कर दिया था,तब शासन की ओर से इतनी बड़ी  कार्रवाइयां क्यों नहीं की गयीं थीं।अब अघोषित कारणों से ये कार्रवाइयां हो रही हैं।मंशा पर भी सवाल उठाया जा रहा है।
   खैर इस आरोप में तो कोई खास दम नहीं है।पर आरोप तो है।आरोप से अधिक यह प्रचार है।उस प्रचार में कुछ लोग आ भी जा रहे हैं।पर इसका मौका आखिर किसने दिया ?
ऐसा नहीं है कि आजादी के बाद के वर्षों में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाइयां नहीं हुईं।
ऐसा भी नहीं है कि कार्रवाइयों में सिर्फ भेदभाव ही किया गया।
पर यदि भेदभाव थोड़े भी हुए तो उसे बढ़ा-चढ़ाकर आज पेश किया जा रहा है।ऐसा करने में कुछ लोगों को राजनीतिक यानी चुनावी लाभ नजर आ रहा है।
   लालू प्रसाद के मामले में निशाने पर मौजूदा केंद्र सरकार है।हालांकि  चारा घोटाले पर अदालती आदेश से सी.बी.आई.ने कार्रवाई तब शुरू की जब खुद लालू प्रसाद की पार्टी की केंद्र में सरकार थी।जाहिर है कि जब आदेश सुप्रीम कोर्ट का हो तो कोई सरकार भला क्या करती !
 हां, इधर नरेंद्र मोदी की सरकार ने इन दिनों पूरे देश में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाइयां तेज कर दी है।
ऐसा इससे पहले किसी अन्य सरकार ने नहीं किया था।
 ये कार्रवाइयां जब और तेज होंगी तो पूरे देश में यह सवाल उठाया जाएगा कि बदले की भावना से यह काम हो रहा है।
 ऐसे सवाल उठाने वालों में कांग्रेस प्रमुख है और होगी।
पर आजादी के बाद खुद कांग्रेस की सरकारों का भ्रष्टाचार के मामले कैसा रिकाॅर्ड रहा है ?
  कौन नहीं जानता कि 2014 में कांग्रेस की अभूतपूर्व चुनावी हार में भी उसकी सरकार के भ्रष्टाचार की ही मुख्य भूमिका थी।
 मोदी सरकार कांग्रेस की उस पराजय से भी सबक लेकर कार्रवाइयों में लगी हुई है।
  भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाइयों से आम जनता खुश होती है।
भाजपा की हाल की चुनावी जीत का वह भी एक कारण है।
  क्या कांग्रेस अब भी अपनी पिछली गलतियों से सबक लेगी ?
लगता तो नहीं है।ऐसे में उसकी सरकारों की गलतियों को गिना देना मौजू होगा।
  प्रशासनिक सुधार के लिए गठित संथानम समिति की रपट के अनुसार 1 अप्रैल से 31 दिसंबर 1956 तक की अवधि में केंद्र सरकार को भ्रष्टाचार से संबधित 4676 शिकायतें मिली थीं।
सन 1962 में यह संख्या बढ़ कर 20 हजार 461 हो गयी।1962 के अंत तक भारत सरकार के पास 4283 मामले जांच के लिए लंबित थे।
 राज्य सरकारों को  मिलने वाली शिकायतें इनसे अलग थीं।
ध्यान रहे कि जितने भ्रष्टाचार होते हैं,उनमें से बहुत कम की शिकायतें ही ऊपर तक पहुंच पाती हैं।
  यह भी ध्यान रहे कि उन वर्षों में  केंद्र और राज्य सरकारों की 
राजनीतिक कार्यपालिका के शीर्ष पदों पर आजादी की लड़ाई के योद्धा ही बैठे हुए थे।पर उनमें से अधिकतर ने भ्रष्टाचार से सह अस्तित्व की रणनीति अपना ली थी।
 उसका सबसे बड़ा प्रमाण वी.के.कृष्ण मेनन प्रकरण था।
मेनन ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त थे तो उन पर जीप खरीद घोटाले का आरोप लगा।पर उन्हें ही बाद में रक्षा मंत्री बना दिया गया।वे जीपें सेना के लिए ही थीं।
  तब आरोप लगने पर सरकार की ओर से यह कहा जाता था कि सरकारी भ्रष्टाचार पर अंकुश के कड़े उपाय किए जाएंगे तो उससे प्रशासन में पस्तहिम्मती आएगी।
 नतीजतन भ्रष्टाचार बढ़ता ही चला गया।
जिस तरह नाले का पानी जैसे -जैसे नीचे की ओर बहता जात  है,उसकी रफ्तार बढ़ती जाती है,उसी तरह समय बीतने के साथ भ्रष्टाचार,  घोटालों  और महा घोटालों में परिणत होते चले गये।जिसने चाहा ,भ्रष्टाचार की  गंगा में डुबकी लगाई।बाद के वर्षों में तो सबने समझा कि जब आजादी के तत्काल बाद के भ्रष्ट सत्ताधारियों में से अधिकतर कानूनी गिरफ्त में आने से बच गए तो हम भी बच ही जाएंगे।
पर, लगता है कि अब समय थोड़ा बदल रहा है। 
   बीच के वर्षों में भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण ही कई सरकारें चुनावों में हारती गयीं।पर किसी ने उससे भी सबक नहीं लिया।
आंशिक तौर पर ही सही,पर लगता है कि मौजूदा सरकार ने सबक लिया है। अब देखना है कि मन मोहन सरकार के भ्रष्टाचार के कारण देश में  पैदा हुए जनरोष की लहर पर सवार होकर 2014 में सत्ता में आयी मोदी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में कितना सफल होती है।सफल जितनी भी हो,यदि सिर्फ लड़ती हुई भी नजर आएगी तो वह अगला चुनाव जीतेगी।
 चुनाव नतीजा काफी हद तक उसी पर निर्भर करेगा।
 इसीलिए मोदी सरकार  कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहती है। चुनाव विश्लेषण के नतीजे बताते हैं कि जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक के दायरे के कुछ लोगों को बात  छोड़ दीजिए तो आम लोग भ्रष्टाचार को बहुत बुरा मानते हैं।
@मेरा यह लेख फस्र्टपोस्ट हिंदी में 3 जनवरी 2018 को प्रकाशित@





   


ललित नारायण मिश्र हत्या कांड की फिर से जांच कराने की मांग पर अड़े हैं उनके पुत्र




       1975 में  तत्कालीन  रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की  हुई हत्या की फिर  से जांच कराने की उनके पुत्र ने सरकार से मांग की है।
याद रहे कि मुम्बई के पंकज के. फडनिस महात्मा गांधी की 1948 में हुई हत्या की फिर से जांच कराने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में लोक हित याचिका दायर की है।
गत अक्तूबर मंे दायर फडनिस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 
एडीशनल सोलिसिटर जनरल अमरेंद्र शरण से कहा है कि वे इस मामले में कोर्ट को सहयोग करें।
 इस पृष्ठभूमि में ललित नारायण मिश्र के  पुत्र व बिहार विधान
परिषद के सदस्य  विजय कुमार मिश्र ने इन पंक्तियों के लेखक से कहा कि हम अपनी इस पुरानी मांग पर कायम हैं कि हत्याकांड की फिर से  जांच होनी चाहिए।
  याद रहे कि  दिसंबर , 2014  में दिल्ली की निचली अदालत ने ललित नारायण मिश्र हत्यांकांड में चार आनंद मार्गियों को आजीवन कारावास की सजा  दी।उनकी अपील ऊपरी अदालत में लंबित है।उन्हें 2015 में  जमानत मिल गयी ।
उस निर्णय के तत्काल बाद  विजय कुमार  मिश्र ने कहा था कि जांच एजेंसी ने आनंद मार्गियों को फंसा दिया।जिन्हें सजा हुई है ,उन लोगों से हमारे पिता या परिवार की कोई दुश्मनी नहीं थी।
  याद रहे कि 2 जनवरी , 1975  को  तत्कालीन रेल मंत्री को समस्ती पुर रेलवे स्टेशन पर बम मार कर बुरी तरह घायल  कर दिया गया था। अगले दिन दाना पुर रेलवे अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गयी।
यह कांड को लेकर बिहार सरकार और केंद्र सरकार के बीच लगातार खींचतान भी चली थी।विभिन्न अदालतों में भी इस केस को उलझाया गया।
 अंततः करीब चालीस साल के बाद इस केस में जिनको सजा भी हुई, उन्हें मृतक के परिजन निर्दोष मान रहे हैं।
 दरअसल चार दशकों तक इस  मामले को लेकर जैसे -जैसे विवाद गहराते रहे,उसी से स्पष्ट है कि यह एक उलझा हुआ केस है।
  अपने जीवन काल में भी ललित बाबू कई कारणों से अक्सर चर्चाओं में रहते थे।पर, उससे भी अधिक चर्चा उनकी हत्या और उसकी जांच-प्रक्रिया को लेकर हुई ।
  ललित नारायण मिश्र एक दबंग  नेता थे।वे तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और उनके छोटे पुत्र संजय गांधी के करीबी थे।कहा जाता था कि उनके जितने राजनीतिक दोस्त थे,उतने ही दुश्मन।उनकी तरक्की से कुछ बड़े लोग ईष्र्यालु हो गये थे।  
    इस हत्याकांड की जांच का भार  पहले बिहार पुलिस की सी.आई.डी.पर था।पर विजय मिश्र के अनुसार बिहार सरकार की अनुमति के बिना ही 
 इस केस को सी.बी.आई.को सौंप दिया गया।
बिहार पुलिस द्वारा पटना की अदालत में इस केस से संबंधित आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका  था।पर  केस अपने हाथ में लेने के बाद सी.बी.आई.ने सुप्रीम कोर्ट से गुजारिश की  कि वह इस  केस को बिहार से बाहर सुनवाई के लिए भेजने का आदेश दे।
   सुप्रीम कोर्ट ने 17 दिसंबर 1979 को यह आदेश दे दिया।यह केस लंबा खिंचता चला गया। 22 मई 1980 को यह केस दिल्ली में सेशन ट्रायल के लिए भेज दिया गया था।
1977 में मुख्य मंत्री बनने के बाद कर्पूरी ठाकुर ने प्रसिद्ध न्यायविद् वी.एम.तारकुंडे से कहा था कि वे इस बात की समीक्षा करें कि  सी.बी.आई.इस केस कीं जांच सही दिशा में कर रही है या नहीं।तारकुंडे ने फरवरी, 1979 में प्रस्तुत अपनी रपट में साफ-साफ कह दिया था कि सी.बी.आई.इस केस में आनंद मार्गियों को गलत ढंग से फंसा रही है।इस रपट को बिहार सरकार ने केंद्र सरकार को भेज दिया था। 
  पहले दिल्ली के पाटियाला हाउस कोर्ट में यह केस गया।फिर इसे तीस हजारी कोर्ट में भेज दिया गया। लंबी सुनवाई के बीच बारी-बारी से करीब दो दर्जन  जज बदल गए।
बचाव पक्ष के कई  वकीलों का सुनवाई के बीच ही देहांत हो चुका है।एक अभियुक्त की भी मृत्यु हो गयी  । इस केस के दस्तावेज 11 हजार पन्नों में हैं।सी.बी.आई.ने आनंद मार्ग से जुड़े 10 प्रमुख लोगों के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया। 
    सी.बी.आई. का आरोप था कि  आनंदमार्गियों ने अपने गुरू आनंदमूत्र्ति प्रभात रंजन सरकार  की जेल से रिहाई के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए रेल मंत्री की हत्या कर दी।हालांकि बिहार पुलिस की सी.आई.डी. द्वारा प्रारंभिक जांच के क्रम में जो बातें सामने आई थीं, वे बातें किन्हीं अन्य प्रभावशाली लोगों की तरफ इशारा करती थीं। 
    इस केस में  ललित बाबू के भाई  डा.जगन्नाथ मिश्र ने भी गवाही दी। विजय कुमार मिश्र और डा.मिश्र ने अदालत में कहा कि  आनंदमार्गियों से ललित बाबू की कोई दुश्मनी नहीं थी।इससे पहले ललित नारायण मिश्र की विधवा कामेश्वरी देवी ने मई, 1977 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री चरण सिंह को पत्र लिख कर उनसे मांग की थी कि वे मेरे पति की हत्या के मामले की फिर से जांच कराएं।उन्होंने यह भी लिखा था कि जिन आनंदमार्गियों को इस कांड में गिरफ्तार किया गया है,वे निर्दोष हैं।
    आश्चर्यजनक ढंग से यह बात सी.बी.आई.की कहानी से मेल नहीं खाती। इस केस को लेकर आशंकाएं और भी गहरा गयी थी जब इकबालिया गवाह  विक्रम ने भी आरोप लगाया  कि सी.बी.आई.ने उस पर दबाव डाल कर उससे गलत बातें कहलवा ली। 
      उत्तर बिहार के समस्ती पुर रेलवे स्टेशन पर 2 जनवरी 1975 को समस्ती पुर-मुजफ्फर पुर बड़ी लाइन का उद्घाटन समारोह था।समारोह चल ही रहा था कि सभा स्थल पर ग्रेनेड से हमला कर दिया गया।इस हमले में रेल मंत्री बुरी तरह घायल हो गये।अंततः उस कांड में मंत्री सहित चार लोग मरे और 25 घायल हो गए।
   इस हत्याकांड की कहानी सिर्फ इसलिए ही अजूबी नहीं है कि इसकी जांच और सुनवाई में रिकाॅर्ड समय लगा,बल्कि इसलिए भी अजीब है क्योंकि इसमें काफी गुत्थियां हैं । इस केस के अनुसंधान के दौरान कई मोड़ आए।घटना के बाद की शुरूआती जांच के दौरान अरूण कुमार ठाकुर और अरूण मिश्र के सनसनीखेज बयान सामने आए थे।इन लोगों ने समस्ती पुर के एक न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष सी.आर.पी.सी.की धारा -164 के तहत यह बयान दिया था कि किसी  प्रभावशाली व्यक्ति के कहने पर उन लोगों ने ही हत्या की योजना बनाई थी और उस काम को अंजाम दिया था। बिहार पुलिस की सी.आई.डी.ने मिश्र और ठाकुर के बयान दर्ज करवाए थे।
  पर, इसके बावजूद बाद में सी.बी.आई. ने  कह दिया कि मिश्र और ठाकुर निर्दोष हैं।दरअसल  हत्या में आनंदमार्गियों के हाथ है। बयानों से यह बात भी सामने आ रही थी कि इस हत्याकांड में बिहार के एक एम.एल.सी.,मुजफ्फर पुर के एक दबंग  नेता और दिल्ली के एक चर्चित  नेता शमिल थे।
घायल हो जाने के बाद जिस तरह बुरी तरह घायल रेल मंत्री के इलाज में लापारवाही बरती गयी,उससे भी यह शंका पैदा हुई कि कहीं कोई  षड्यंत्र तो नहीं था !

इस मुकदमे के अलावा मिश्र हत्याकांड की जांच के लिए मैथ्यू आयोग भी बना था।मैथ्यू आयोग के समक्ष समस्ती पुर रेल पुलिस के अधीक्षक सरयुग राय और अतिरिक्त कलक्टर आर.वी शुक्ल ने  कहा था कि ललित नारायण मिश्र को घायलावस्था में समस्ती पुर से दाना पुर ले जाने वाली गाड़ी को समस्ती पुर स्टेशन पर  शंटिंग में ही एक घंटा दस मिनट लग गया। दरभंगा के कमिश्नर जे.सी.कुंद्रा ने 16 अप्रैल 1975 को आयोग से  कहा कि मैंने उद्घाटन के अवसर पर दो हजार लोगों को निमंत्रित करने के रेल अधिकारियों के प्रस्ताव पर कभी सहमति नहीं दी थी।
@ फस्र्टपोस्टहिंदी में 3 जनवरी, 2018 को प्रकाशित मेरा लेख@

सोमवार, 1 जनवरी 2018

जब जेपी ने लिखा राज नारायण को पत्र

  
यह सत्तर के दशक की बात है।लोहियावादी नेताओं में फूट पड़ 
गयी थी। 1967 में डा.राम मनोहर लोहिया के असामयिक निधन के 
बाद लोहियावादी समाजवादी मुख्यतः राज नारायण और मधु लिमये 
के खेमों  में बंट गये थे।
 जार्ज फर्नांडिस मधु लिमये के साथ थे।
पूर्व मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर समाजवादियों की एकता के पक्षधर थे।उन्होंने एकतावादी-समतावादी नाम से एक पार्टी भी बना ली  थी।
 जब एकता का कर्पूरी जी का प्रयास सफल नहीं हुआ तो वह जय प्रकाश नारायण से मिले।
कर्पूरी जी ने जय प्रकाश जी से कहा कि आप पार्टी में एकता के लिए राज 
नारायण को व्यक्तिगत पत्र लिख दें।
 जेपी राजी हो गये।
उन्होंने लिख दिया।पत्र अंग्रेजी में था।
दूसरे दिन मैं वह पत्र लेने पटना के कदम कुआं स्थित जेपी के आवास पर गया था।
जेपी के निजी सचिव सच्चिदानंद ने चिट्ठी तैयार रखी थी।
चिट्ठी लिफाफे रखी थी।पर लिफाफा बंद नहीं था।
स्वाभाविक उत्सुकता के तहत मैंने उसे खोल कर पढ़ा।उस पत्र की कुछ ही  बातें मुझे याद हैं।उस पत्र से 
राज नारायण यानी नेता जी के प्रति जेपी के स्नेह का पता चला।
फिर समाजवादी आंदोलन में राज नारायण के महत्व का भी पता चला।साथ ही, जेपी ने उस पत्र में राजनारायण से यह उम्मीद की थी कि वे समाजवादियों की एकता बनाये रखने में अपनी भूमिका निभाएं।
 जेपी की चिट्ठी उनके आवास से लाने का यह मौका मुझे  इसलिए मिला था क्योकि मैं समाजवादी कार्यकत्र्ता  के नाते  उन दिनों कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव था।कर्पूरी ठाकुर उन दिनों बिहार विधान सभा मंे प्रतिपक्ष के नेता थे।
उससे पहले वह 1970 में बिहार के मुख्य मंत्री और 1967 में उप मुख्य मंत्री रह चुके थे।
 वह 1952 से ही लगातार विधायक थे और समाजवादी आंदोलन में उनका 
बड़ा मान था।
पर, मुझे बाद में लगा कि जेपी की चिट्ठी भी समाजवादियों की खेमेबाजी पर  कोई सकारात्मक  असर नहीं डाल  सकी।
 उन्हीं दिनों  बांका में हुए लोक सभा  उप चुनाव में राज नारायण जी का मुकाबला मधु लिमये से हो गया।दरअसल कर्पूरी ठाकुर ने ही लोक सभा के उस उप चुनाव में राज नारायण जी को उम्मीदवार बनवा दिया था।
संभवतः राजनारायण जी वहां की चुनावी संभावना के बारे मंे पहले से ही सशंकित थे।
 यह बात मैं व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर  कह रहा हूं।मैं राज नारायण जी से पहले से परिचित था।पर शायद उन्हें इस बात की खबर नहीं थी कि मैं इस बीच कर्पूरी जी का निजी सचिव बन चुका था।
 राज नारायण जी बांका जाने के लिए पटना रेलवे स्टेशन से गुजरने वाले थे।वह वहां नामांकन दाखिल करने जा रहे थे।कर्पूरी जी के साथ मैं
भी नेता जी यानी राज नारायण जी से मिलने पटना जंक्शन गया था।
 मुझे देखा तो नेता जी मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझे सबसे अलग ले गये।अपने कमजोर कंधे पर उनके भारी हाथ का दबाव मुझे आज भी याद है।उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मेरा बांका में उप चुनाव लड़ना सही रहेगा ?
मैं क्या कहता ! कर्पूरी जी का मैं निजी सचिव था।हालांकि एक राजनीतिक कार्यकत्र्ता के रूप मैं यह महसूस कर रहा था कि सही नहीं रहेगा।फिर भी मुझे कहना पड़ा कि आपका लड़ना ठीक रहेगा।
नेता जी लड़े  और हारे।मधु लिमये जीत गये।समाजवादी आंदोलन के लोगों के बीच पहले ‘नेता जी’ राजनारायण ही थे।मुलायम सिंह यादव तो बाद में नेता जी कहलाए।
   राज नारायण से मेरी थोड़ी लंबी  मुलाकात एक बार छपरा में हुई थी जहां वह एक राजनीतिक कार्यक्रम के सिलसिले में आए थे।
उससे पहले 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के गया राष्ट्रीय सम्मेलन में मैं उनसे आॅटोग्राफ के लिए मिला था।उन्होंने मेरे आॅटोग्राफ बुक पर एक अच्छा सा दोहा लिख दिया था।मैंने तब कई अन्य राष्ट्रीय समाजवादी नेताओं के भी आॅटोग्राफ लिये थे।वह आॅटोग्राफ बुक अब भी मेरे पास है। 
छपरा वाली मुलाकात  संभवतः 1969 में हुई।
 तब मैं वहां छात्र था और लोहियावादियों की पार्टी के छात्र संगठन क्रांतिकारी विद्यार्थी संघ का जिला सचिव था।उसके प्रदेश स्तर के नेता नरेंद्र सिंह थे।
 बिहार में युवजन सभा से हटकर  छात्रों का भी एक संगठन था जिसका नाम था क्राांतिकारी विद्यार्थी संघ।
 छपरा में  नेता जी के सबसे करीबी थे रवींद्र वर्मा ।ठीक उसी तरह, जिस तरह पटना में भोला प्रसाद सिंह ।वर्मा जी वकील थे और इलाहाबाद विश्व विद्यालय के छात्र रह चुके थे।वहीं वे समाजवादियों के प्रभाव में आए थे।
  वर्मा जी अब नहीं रहे।पर इस अवसर पर इतना जरूर कहूंगा कि समाजवादी आंदोलन को आगे बढ़ाने में अपने छोटे दायरे में ही सही, पर,उनका जितना योगदान था,उस अनुपात में न तो उनकी पार्टी और न  ही समाजवादी सरकारों ने उन्हें कुछ  दिया।खैर उसकी चिंता उन्हें नहीं थी।तब देश के अन्य अधिकतर समाजवादी भी उसकी चिंता नहीं करते थे।
  खैर वर्मा जी राज नारायण जी को लेकर टैक्सी से सारण जिले के एक सुदूर गांव में जा रहे थे।मैं भी साथ था।
 वर्मा जी ने राजनारायण जी से मेरा परिचय कराया, ‘ये हैं सुरेंद्र अकेला।
अच्छे कार्यकत्र्ता हैं।’ नेता जी ने अपने लहजे में सवाल किया, ‘का हो अकेला ? अभी अकेले हउ अ ? शादी नइख कइले ?’ मैंने कहा कि जी नहीं।इस पर नेता जी ने वर्मा जी से कहा कि ‘रवींदर, फलां .......की छोटी बहन से इसकी शादी करा दूं ? वह मेडिकल में पढ़ती है।’ उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय की एक समाजवादी महिला का नेता का  नाम लिया था।जानबूझ कर मैं उनका नाम नहीं लिख रहा हूं।
मैंने कहा कि ‘नेता जी , बहुत गैप है।कहां वह मेडिकल छात्रा और कहां मैं जो बी.एससी. की परीक्षा छोड़कर कार्यकत्र्ता बना हुआ हूं।’
 नेता जी ने कहा कि ‘मैं सारा गैप पाट दूंगा।’
 पता नहीं, वह मजाक कर रहे थे या वह सिरियस थे।पर मुझे उनके चेहरे के भाव से लगा कि वे सिरियस थे।पता नहीं वे चाहते हुए भी ऐसी शादी करा पाते या नहीं,पर उनका आत्म विश्वास देखने लायक था।साथ ही  धर्म निरपेक्षता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता। 
  तब सांप्रदायिक माहौल आज जैसा बिगड़ा हुआ भी नहीं था।
तब समाजवादी आंदोलन के नेता यह चाहते थे कि राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं की पत्नियां नौकरी वाली हों ताकि परिवार चलाने के लिए पैसे की तंगी नहीं हो।
 देश के कई समाजवादी नेताओं की पत्नियां ऐसी थीं भी।
 आज तो राजनीति में इतना पैसा है कि किसी को इसकी चिंता नहीं।
कुल मिलाकर मैं राज नारायण जी को मैं एक निःस्वार्थ, निर्भीक  और जुझारू नेता के रूप मंे याद करता हूं।
 वह अपने साथियों और कार्यकत्र्ताआंे का बड़ा ध्यान रखते थे।
एक बार समाजवादी आंदोलन के सिलसिले में दिल्ली के संसद भवन के पास  हुए प्रदर्शन में मैं भी था।
गिरफ्तारियां हो गयीं।अनेक नेताओं और कार्यकत्र्ताओं के साथ मैं भी तिहाड़ जेल पहुंच गया।
उस समय जेल जाने वालों में मधु लिमये,राज नारायण ,जनेश्वर मिश्र, किशन पटनायक ,शिवानंद तिवारी ,राजनीति प्रसाद सहित अनेक छोटे- बड़े नेता-कार्यकत्र्ता  थे।कुछ दिनों तक जेल में रहना पड़ा।
कड़ाके की जाड़ा थी।वह भी दिल्ली की जाड़ा।फिर भी नेता जी सुबह-सवेरे सभी बंदियों के पास जाते थे।सबका हाल चाल पूछते थे।किसे चाय मिली या नहीं, इसका बड़ा ध्यान रखते थे।मैंने महसूस किया कि व्यक्तिगत रूप से कार्यकत्र्ताओं का ध्यान  रखने में राज नारायण जी अन्य बड़े नेताओं से थोड़ा अलग थे।



   


  
  
  


राजनीति में एम.जी.आर.की सफलता को लेकर रजनीकांत की तरह ही जताई गयी थीं आशंकाएं


            
मशहूर फिल्म अभिनेता एम.जी.रामचंद्रन .जब पहली बार 1977 में तमिलनाडु के मुख्य मंत्री बने थे तो भी कुछ राजनीतिक पंडितों ने कहा था कि ‘वह अनर्थकारी साबित होंगे।’
यह भी कहा गया कि आम चुनाव में उनकी जीत एक सामान्य योग्यता वाले व्यक्ति यानी एक मीडियोकर की जीत है।
पर गद्दी पर बैठने के  बाद एम.जी.आर.ने स्कूली छात्र-छात्राओं के लिए महत्वाकांक्षी व बेहतर मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम सहित   राज्य में कई नए काम किए। बीच में कुछ महीनों को छोड़ कर वे 1977 से 1987 तक मुख्य मंत्री रहे।
कुल मिलाकर वे एक सफल मुख्य मंत्री साबित हुए थे।उन्हें भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया था।
1917 में जन्मे एम.जी.आर.का 1987 में निधन हो गया।
   अब जबकि तमिलनाडु के एक अन्य बड़े अभिनेता रजनी कांत ने राजनीति में कदम रखा है तो उनके बारे में भी कुछ हलकों में उसी तरह की आशंकाएं जाहिर की जा रही हैं।
डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी ने तो उन्हें अनपढ़़ तक कर दिया है।
 एम जी आर के सत्ता में आने से ठीक पहले तमिलनाडु की जैसी राजनीतिक और प्रशासनिक   स्थिति थी,उससे आज की स्थिति अधिक खराब लग रही है।ऐसे में यदि कोई सत्ता में आकर उस स्थिति में थोड़ा भी सुधार करने की कोशिश करे तो उसे लोग हाथों हाथ लेंगे,ऐसा कहा जा रहा है।देखना होगा कि यह मौका रजनीकांत को मिलता है या नहीं।
  रजनी कांत ने कहा है कि वे पार्टी बनाएंगे और अगले चुनाव में 
सभी विधान सभा सीटों पर चुनाव लड़ेंगे।
उनका यह भी दावा है कि वे तमिलनाडु की राजनीतिक  व्यवस्था को बदल कर रख देंगे।
वे पैसा,पावर और पालिटिक्स के लिए राजनीति में नहीं आ रहे हैं।
रजनीकांत ने यह बात इसीलिए कही है क्योंकि इन दिनों तमिलनाडु की राजनीति में इन्हीं तीन तत्वों का अधिक बोलबाला है। 
 जाहिर है कि रजनीकांत यदि सत्ता में आ जाएं और वे राजनीति व शासन व्यवस्था को सुधारने के लिए कुछ भी लीक से हटकर  काम करने की कोशिश करें  तो वे राजनीति में एम.जी.आर.की तरह ही जम सकते हैं।
  वैसे तो तत्कालीन डी.एम.के. नेता एम.जी.राम चंद्रन .सन् 1962 में ही विधान परिषद के सदस्य बन गए थे।यानी राजनीति से उनका नाता रजनीकांत की अपेक्षा पुराना था। फिर भी वे पहले फिल्मों पर ही अधिक ध्यान दे रहे थे।
  डी.एम.के. सबसे बड़े नेता और मुख्य मंत्री रहे अन्ना दुरै के निधन के बाद करूणानिधि ने 
डी.एम.के. की कमान संभाल ली।एम.जी.आर.ने जब देखा कि करूणानिधि अपने पुत्र एम.के.मुत्थु को आगे बढ़ा रहे हैं,तो एम.जी.आर.ने विद्रोह कर दिया।नतीजतन उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया।सन 1972 में एम.जी.आर.ने ए.आई.ए.डी.एम.के.बना लिया।
1977 के विधान सभा चुनाव में उनके दल को बहुमत भी मिल गया।
यह सब फिल्मों के जरिए  जनता पर एम.जी.आर.ने जो  जादू चलाया था,उसके कारण संभव हुआ।इधर रजनीकांत का जादू भी कम नहीं है।मुख्य मंत्री बनने के बाद एम जी आर ने स्कूली बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन के कार्यक्रम को बेहतर बनाया।उसमें पौष्टिक सामग्री की आपूत्र्ति करवाई।
वैसे तमिलनाडु में 1925 से ही मध्याह्न भोजन कार्यक्रम चल रहा था।
 महिलाओं के लिए उन्होंने अलग से विशेष बसें चलवाईं।
राज्य में शराबबंदी की।
राज्य के ऐतिहासिक स्थलों और मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया।
इस तरह के कुछ अन्य काम भी किए।
 वैसे भी उत्तर भारत के राज्यों की अपेक्षा दक्षिण भारत के राज्य विकास और सुशासन के क्षेत्र में आगे रहे हैं।
एक फिल्मी कलाकार एमजीआर के मुख्य मंत्री बन जाने के बाद भी उसमें कोई अंतर नहीं आया,ऐसी खबरें मिलती रहीं।
  हां, अपने पुत्र के प्रति करूणानिधि के झुकाव को देख कर तो एमजीआर ने पार्टी तोड़ दी, पर उन्होंने खुद अपने उतराधिकारी के रूप में जय ललिता को आगे बढ़ाया।  
एम.जी.आर.की तरह ही रजनीकांत भी तमिलनाडु में अत्यंत लोकप्रिय अभिनेता हैं।पर देखना है कि वे राजनीतिक चालें चलने में  कितने माहिर साबित होते हैं।परंपरागत विवेक उनमें कितना है।वैसे तो राह आसान नहीं है, फिर भी यदि उन्हें सत्ता में आने का मौका मिला तो देखना होगा कि वे डा.स्वामी जैसे नेताओं व अन्य राजनीतिक पंडितों की आंशंकाओं को किस हद तक गलत साबित कर पाते हैं।
अनपढ़ के आरोप पर यह कहा जा सकता है कि मद्रास के पूर्व मुख्य मंत्री के .कामराज भी बहुत ही कम पढ़े -लिखे थे। वे अंगे्रजी तक नहीं जानते थे।
पर वे परंपरागत विवेक से लैस थे।कामराज ने कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद भी सफलता पूर्वक संभाला था।पता नहीं इस मामले में रजनीकांत कहां टिकते हैं।
@ फस्र्टपोस्टहिंदी पर 1 जनवरी 2018 को प्रकाशित मेरा लेख@  

  

  
      


अवस्थी जी,
रंजन जी को दिए जवाब में मैंने जो कुछ  लिखा है,उसे पोस्ट कर रहा हूं।
रंजन जी, आपने सही कहा।
चूंकि राज्य सभा के सभापति ने यह बात उठाई है, इसीलिए 
मैंने राज्य सभा से इसकी शुरूआत की बात की।
जब राज्य सभा में सत्ताधारी दल का बहुमत नहीं है, तो  
कार्य संचालन नियमावली में संशोधन का प्रस्ताव पास ही नहीं होगा।
यानी नायडु साहब चाहते हुए भी फिलहाल वह काम नहीं कर सकते जिसका सुझाव  उन्होंने दिया है।
मेरा मानना है कि सदन की गरिमा लौटाने की जरूरत को लेकर देश में चर्चा तो होनी ही चाहिए।नायडु साहब ने इस चर्चा का मौका दिया।
मैं इस मामले में खुद भाजपा का रवैया भी जानता हूं।
मन मोहन सिंह के कार्य काल मंे 2012 में लोक सभा में प्रतिपक्ष की नेता  सुषमा स्वराज ने कहा था कि ‘सदन को नहीं चलने देना भी एक लोकतंात्रिक तरीका है।तहलका और काॅफिन घोटाले पर कांग्रेस ने भी तो सदन नहीं चलने दिया था।’
  मेरा मानना है कि जब तर्को में दम नहीं होता तो लोग शोर मचाने लगते हैं।
इस देश की आजादी के बाद के नामी,  सम्मानित और कारगर सांसदों को वेल में जाकर शोर मचाने की जरूरत  नहीं पड़ती थी।क्या हीरेन मुखर्जी, ज्योतिर्मय बसु, मधु लिमये और सुरेंद्र नाथ द्विवेदी को वेल में जाते किसी ने देखा था ?
    इस देश की विभिन्न विधायिकाओं के सदनों के भीतर हंगामे के कई नये -नये आयाम अब सामने आ रहे हैं।उनमें गाली गलौज,मारपीट,खून- खराबा,स्पीकर का सरेआम अपमान,कागज फाड़ना आदि आदि।एक बार तो सदन में जय ललिता की साड़ी तक खोलने की कोशिश हुई थी।
नयी पीढ़ी का इसलिए भी लोकतंत्र के प्रति सम्मान घट रहा है।
बीमारी बढ़ जाने पर कड़वी दवा की जरूरत होती है अन्यथा शरीर नष्ट हो जाता है।