शनिवार, 12 अप्रैल 2014

जनता के कठघरे में सांप्रदायिकता बनाम शासनहीनता

क्या राष्ट्रीय स्तर पर दुहराएगा 2005 का बिहार ?


  सांप्रदायिकता को भष्टाचार और शासनहीनता से अधिक खतरनाक मानने वाले दलों को 2005 में बिहार में चुनावी मात मिली थी। क्या वही चुनावी कथा इस बार राष्ट्रीय स्तर पर भी दुहराएगी जाएगी? पता नहीं कि अंततः क्या होगा। क्योंकि देश बड़ा है और चुनावों में एक साथ कई फैक्टर काम करते रहते हैं। अधिकतर क्षेत्रों में मतदान होने भी अभी बाकी हैं।

 फिर भी मतदाताओं के जो प्रारंभिक किंतु अपुष्ट रुझान मिले हैं, उनसे लगता है कि अधिकतर मतदाताओं के समक्ष  सांप्रदायिकता की अपेक्षा भ्रष्टाचार व महंगाई के दानव बहुत बड़ी समस्या बन कर उपस्थित हुआ है। अनिर्णय, अशासन व कुशासन ने इन समस्याओं को बढ़ाया है। बिहार में भी यही हुआ था।

   बिहार में 1991 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही जनता के सामने भ्रष्टाचार, अविकास, शासनहीनता व जंगल राज की समस्याएं बड़ी तीव्रता से उठ खड़ी हुई थीं।

राज्य में 1990 से 1997 तक लालू प्रसाद मुख्यमंत्री थे। 1997 से 2005 तक राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं। सन 2000 से 2005 तक तो बिहार में राजद और कांग्रेस की मिलीजुली सरकार थी।

  कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी इस बीच लगातार बिहार सरकार का बचाव करती रहीं। इन दलों ने तब कहा कि वे सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता में आने से रोकने के लिए लालू-राबड़ी की सरकार का साथ दे रही हैं। इसके विपरीत अधिकतर जनता के लिए सांप्रदायिकता की समस्या की अपेक्षा भ्रष्टाचार, जंगल राज और अविकास की समस्याएं काफी बड़ी समस्याएं थीं।

  1996 में समता पार्टी के नेता नीतीश कुमार ने भी यह बात समझ ली थी। इसीलिए उन्होंने तब भाजपा से हाथ मिला लिया।

  नतीजतन 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू-भाजपा गठबंधन सत्ता में आ गई। एकतरफा व ढोंगी धर्म निरपेक्षता की माला जपने वाली पार्टियां हाशिए पर चली गईं। नीतीश सरकार में भाजपा की मजबूत उपस्थिति रही। हालांकि भाजपा नीतीश कुमार के दबंग व्यक्तित्व के कारण बिहार में हिन्दुत्व का एजेंडा नहीं चला सकी। यहां तक कि वह पूर्वोत्तर बिहार में बंगलादेशी घुसपैठियों की समस्या भी भूल गई जिसको लेकर ए.बी.वी.पी. अक्सर आंदोलन करता रहता था।

 सत्ता में आने के बाद नीतीश सरकार ने भागलपुर सांप्रदायिक दंगे में शामिल दोनों पक्षों के आरोपियों को अदालतों से सजाएं दिलवाई। इसके लिए बंद करा दिये गये मुकदमों को भी फिर से खुलवाया गया था। इस कदम से दोनों समुदाओं में से किसी ने भी यह महसूस नहीं किया कि  शासन किसी के साथ पक्षपात कर रहा है। याद रहे कि इस मामले में बिहार सरकार ने वैसी एकतरफा कार्रवाई नहीं की जैसी कार्रवाई हाल के मुजफ्फरनगर दंगे के सिलसिले में करने का आरोप अखिलेश सरकार पर लगा।

   याद रहे कि इस काम में भाजपा ने नीतीश सरकार का विरोध नहीं किया। भागलपुर दंगे के एक आरोपी व एक हिन्दू संगठन से जुड़े कामेश्वर यादव के खिलाफ भी बंद केस को फिर से खुलवा कर शासन ने उसे अदालत से सजा दिलवाई। इसका भी भाजपा ने विरोध नहीं किया।

  ऐसा करके नीतीश कुमार अपने नेता डा. राम मनोहर लोहिया का ही अनुसरण कर रहे थे जिन्होंने अपने जीवनकाल में दोनों धर्मों के कट्टरपंथियों का समान रुप से विरोध किया था।

   1967 के आम चुनाव से ठीक पहले डा. लोहिया ने सार्वजनिक रुप से यह कह दिया था कि वे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने के पक्षधर हैं। याद रहे कि भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों वाले अनुच्छेद में यह लिखा हुआ है कि शासन देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा।

  पर डा. लोहिया के इस बयान का अल्पसंख्यकों के एक बड़े हिस्से ने कड़ा विरोध कर दिया।

  खुद डा. लोहिया के दल के कुछ बड़े नेताओं ने लोहिया से कहा  कि चुनाव सिर पर है और आपने ऐसा बयान दे दिया। अब तो आप चुनाव हार जाएंगे।

 डा. लोहिया ने जवाब दिया कि मैं सिर्फ चुनाव जीतने के लिए राजनीति में नहीं हूं। बल्कि देश की बेहतरी के लिए राजनीति में हूं। इस विवाद के कारण 1967 में डा. लोहिया मुश्किल से मात्र लगभग चार सौ मतों से ही लोकसभा चुनाव जीत सके थे।

  याद रहे कि लोहिया यह भी कहा करते थे कि इस देश में जब -जब कट्टर हिन्दुत्व हावी रहा है तब -तब देश कमजोर हुआ है। पर इसके विपरीत स्थिति होने पर देश का भला हुआ है। पर आज के कितने नेतागण सांप्रदायिक समस्या पर इस तरह सम्यक व संतुलित रूप से सोचते हैं ?

  पर, बिहार में सन 2009 के लोकसभा चुनाव व 2005 और 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव नतीजों के विश्लेषण से यह साफ लगता है कि आम जनता में से अधिकतर लोग उन नेताओं व दलों को ंपसंद नहीं करते हैं जो सांप्रदायिक समस्या का एकतरफा हौवा खड़ा करते रहते हैं।

  जनता के चुनावी फैसलों से यह नतीजा निकलता है कि वह दोनों तरह की कट्टरताओं को नापसंद करती है। ताजा लोकसभा चुनाव मंे हो रहे मतदान के ताजा रुझान भी कमोवेश यही संकेत दे रहे हैं। इसके बावजूद दोनों पक्षों के अतिवादी नेताओं के उत्तेजक व एकतरफा बयान आने  थम नहीं रहे हैं। यदि यह सब जारी रहा तो इसका असर आगे के मतदानों पर भी पड़ सकता है।

  बिहार के चुनाव नतीजों व ताजा लोकसभा चुनाव के मतदान के आरंभिक रुझानों से एक साफ संदेश मिलता है। पर क्या नेता व बुद्धिजीवी लोग संकेत ग्रहण करना चाहेंगे ?

  यदि वे कथित सांप्रदायिक दलों को सत्ता में आने से सचमुच रोकना चाहते हैं तो वे कुछ कथित सेक्युलर दलों से भी यह अपील करें कि वे अपने दल व सरकार में जारी भ्रष्टाचार, अपराध, वंशवाद और जातिवाद पर काबू पाएं।

 दरअसल संविधान व कानून का पालन करने वाली भ्रष्टाचारमुक्त व अपराधमुक्त पार्टी व निर्मल शासन-व्यवस्था ही सभी रंगों के सांप्रदायिक तत्वों से भी कारगर तरीके लड़कर उन्हें पराजित  सकती है। याद रहे कि भ्रष्टाचार से महंगाई बढ़ती है। महंगाई  जाति और संप्रदाय के स्तर पर कोई भेदभाव नहीं करती।

( इस लेख का संपादित अंश 12 अप्रैल, 2014 के जनसत्ता में प्रकाशित)
     
 

बुधवार, 26 मार्च 2014

खुशवंत के जीवन में एक अफसोस और एक कुख्याति

खुशवंत सिंह को इस बात का अफसोस रहा कि ‘मैंने जीवन का बहुत सा हिस्सा वकालत और राजनयिक सेवा जैसी व्यर्थ की नौकरी में गंवा डाला। काश ! मेरा वह समय भी लिखने में लगा होता।’

  याद रहे कि 1939 से 1947 तक उन्होंने लाहौर हाईकोर्ट में वकालत की। वकालत चल नहीं रही थी। बैठे -बैठे मक्खियां मारने की नौबत थी।

1947 में विदेश मंत्रालय की नौकरी कर ली। लंदन में भारतीय उच्चायोग में सूचना अधिकारी बन गये। पर तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वी.के. कृष्ण मेनन से तालमेल नहीं बना पाने के कारण खुशवंत का ओटावा तबादला कर दिया गया। 

   एक साक्षात्कार में उन्होंने लेखिका उषा महाजन को 1997 में एक और बात बताई थी, ‘लोग मुझे नाहक शराबी, कबाबी और व्यभिचारी समझते हैं जबकि मैं ऐसा नहीं हूं। इस नाहक कुख्याति का भी उन्हें अफसोस रहा। पर उन्होंने यह स्वीकारा कि मानता हूं कि अपनी इस कुख्याति के लिए मैं खुद ही जिम्मेदार हूं।

उन्होंने कहा ः दरअसल मेरी यह छवि बंबई में इलेस्ट्रेटेड वीकली के संपादन के दौरान बीते नौ वर्षों की देन है। वहांं मैंने सेक्स जैसे प्रतिबंधित विषयों पर लिखने की शुरुआत की और लड़कियों की अर्धनग्न तस्वीरें छापीं। इससे पत्रिका की प्रसार संख्या 80 हजार से बढ़कर चार लाख से भी अधिक हो गई।ल ेकिन दुर्भाग्यवश इसके साथ ही एक ऐसी छवि भी अर्जित कर ली जो मेरी सही तस्वीर न होते हुए भी आज तक मुझसे चिपकी हुई है। मेरे परिवारवाले और मुझे करीब से जानने वाले जानते हैं कि मैं वैसा नहीं हूं।

मैं न तो शराबी हूं और न ही औरतों आशिक हूं। दिन भर पढ़ने -लिखने और लोगों से मिलने का इतना काम रहता है कि इन सब चीजों की फुर्सत ही नहीं मिल सकती।

सिर्फ शाम में मैं अपनी ड्रिंक के साथ रिलैक्स करता हूं। ज्यादा कभी नहीं पीता वरना दूसरे दिन काम कैसे करूंगा ? अपनी पूरी जिंदगी में मैंने एक बार भी शराब पीकर अपने होश नहीं खोये।

  खुशवंत सिंह ने जब भी किसी को कोई इंटरव्यू दिया, उन्होंने सच्ची बातें बता दीं। ऐसी बातें भी जिन्हें आम तौर पर लोग छिपा जाते हैं।

 हाल ही में दिल्ली की एक हिंदी पाक्षिक पत्रिका से बातचीत में उन्होंने कहा था कि संजय गांधी के कहने पर मुझे एक अंग्रेजी दैनिक का संपादक बनाया गया था।

 उन्होंने यह भी स्वीकारा था कि उनकी नेहरु-इंदिरा परिवार से नहीं बल्कि सिर्फ संजय गांधी से घनिष्ठता थी। इंदिरा गांधी के कहने पर मुझे उस अखबार के संपादक पद से हटा दिया गया था।

इस साल के प्रारंभ में उनसे पूछा गया था कि इस उम्र में भी सक्रिय रहने का राज क्या है ? उन्होंने बताया कि मैं अपने जीवन में बहुत सख्त हूं। कम खाता हूं। मैं बहुत कम पीता हूं। ज्यादातर तरल लेता हूं। क्योंकि वह पचाने में आसान होता है।

 कई विधाओं में कलम चलाने वाले खुशवंत सिंह ने सिख इतिहास भी लिखा था जिसकी शुरू के दिनों में व्यापक चर्चा भी हुई।वे कथाकार थे। ट्रेन टू पाकिस्तान उनका चर्चित उपन्यास है जिस पर फिल्म भी बनी। अपनी पुस्तकों में से ‘दिल्ली’ को वे सर्वाधिक पसंद करते थे।

साहित्यिक पुरस्कारों के बारे में उन्होंने अपनी राय करीब डेढ़ दशक पहले ही बता दी थी। उन्होंने कहा था कि ‘जिनको अवार्ड मिलते हैं, वे अपने आप को वोट देकर अवार्ड ले लेते हैं। खुद को कैनवैस करके, लोगों के आगे -पीछे लग कर न जाने कितनी सेकेंड ग्रेड की किताबों को मिल जाते हैं पुरस्कार ! मैंने उनमें से एक भी किताब बाजार में नहीं देखी।

    ‘राज्यसभा की सदस्यता के बारे में उन्होंने कहा था कि राज्यसभा की सदस्यता ऐसे नहीं मिलती है। मांगनी पड़ती है। कैनवेसिंग करनी पड़ती है। इसके लिए बहुत तरफ से दबाव पड़ रहे होते हंै उन पर।’ उनसे पूछा गया था कि आपके मित्र इंदर कुमार गुजराल अब प्रधानमंत्री हैं। क्या आपको पुनः राज्यसभा की सदस्यता कर उम्मीद है ? खुशवंत सिंह 1980 से 1986 तक राज्यसभा के सदस्य थे।

 खुशवंत सिंह की याद आते ही एक और सवाल बरबस जेहन में कौंध जाता है। खुशवंत सिंह ने अधिक पुस्तकें लिखीं या उनके पिता सर सोभा सिंह और दादा सरदार सुजान सिंह ने अधिक बिल्डिंगें बनवार्इं ?

वे दिल्ली के सबसे बड़े ठेकेदार थे। सचिवालय का साउथ ब्लाॅक, इंडिया गेट, आकाशवाणी भवन, राष्ट्रीय संग्रहालय, बड़ौदा हाउस और सैकड़़ों सरकारी बंगले उन्होंने बनवाये।

  (जनसत्ता के 21 मार्च 2014 के अंक में प्रकाशित)  
     
      


बुधवार, 19 मार्च 2014

आसान नहीं है मणिकांत वाजपेयी को भूल जाना

 जिन थोड़े से पत्रकारों को मैं श्रद्धापूर्वक याद करता हूं, उनमें मणिकांत वाजपेयी शामिल हैं। उनका इसी 18 मार्च, 2014 को निधन हो गया।

उन्हें भूल पाना मेरे लिए आसान नहीं होगा। पटना में उनके साथ बैठकर मैं देर तक उनसे बातें किया करता था। उनसे भी मैंने कुछ सीखा है। उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी, उनकी विनम्रता और अपने काम के प्रति उनकी अटूट निष्ठा अनुकरणीय थी।

मेरे पत्रकार जीवन का वह निर्माण काल था जब मैं पहली बार वाजपेयी जी से पटना में मिला था। अच्छा हुआ कि तब वाजपेयी जी के साथ बैठने व बतियाने का मुझे सौभाग्य मिला।,तब मैं उनके सामने हर तरह से जूनियर था। पर उन्होंने ऐसा कभी मुझे आभास नहीं होने दिया।

,  पटना रेडियो स्टेशन के महत्वपूर्ण पद पर रहकर काम करना हमेशा ही एक चुनौती भरा दायित्व रहा है। उन दिनों तो रेडियो का और भी अधिक महत्व था। क्योंकि तब तक मीडिया का आज की तरह विस्तार नहीं हुआ था। प्रभावशाली नेता कौन कहे, छुटभैया नेताओं की भी यही इच्छा रहती थी कि उनका नाम शाम के बुलेटिन में जरुर आ जाये।

  इसको लेकर वाजपेयी जी को अक्सर धमकियां मिलती थीं। पर वे धमकियों में नहीं आते थे। वे खबरों के साथ कोई पक्षपात नहीं करते थे। ऐसा उनके सहकर्मी भी बताते रहे हैं।

  वाजपेयी जी सूचना सेवा के बड़े -बड़े पदों पर रहे। सेवाकाल के अंतिम दिनों में वे डिपुटी प्रिंसिपल इंफोर्मेशन अफसर थे। इसके बावजूद जब वे रिटायर हुए तो उनका बनवाया हुआ अपना कोई मकान या फ्लैट नहीं था।
 हां, उनकी तपस्या का फल उन्हें इस रूप में जरूर मिला कि उनकी संतानें संस्कारी हैं।

उनके यशस्वी पुत्र पुण्य प्रसून वाजपेयी की ईमानदारी की चर्चा दिल्ली से पटना तक वे सब लोग करते हैं जो उन्हें किसी न किसी रूप में जानते हैं।

आज के समय में टी.वी. पत्रकारिता का इतना बड़ा नाम और इतनी कठोर ईमानदारी !

सुखद आश्चर्य होता है। पिता के संस्कार और परवरिश का इसमें बड़ा योगदान माना जाएगा। पिछले कुछ साल से वाजपेयी जी बीमार थे। वे एक लाइज बीमारी से ग्रस्त थे। उनके परिवार ने उनकी बड़ी सेवा की।

  मणिकांत जी के साथ रेडियो में काम कर चुके महेश कुमार सिन्हा और पत्रकार मोहन सहाय ने बारी -बारी से दिल्ली से फोन पर मंगलवार को मुझे यह दुःखद समाचार दिया। वे मेरे प्रति वाजपेयी जी के स्नेहल व्यवहार को जानते थे। हालांकि तब तक दूरदर्शन का पटना केंद्र यह समाचार दे चुका था।

  महेश कुमार सिन्हा के अनुसार वाजपेयी जी अपने काम के प्रति ईमानदार पत्रकार थे। खबर देने के मामले में वे हमेशा तत्पर रहते थे।

 स्टेट्समैन के पटना संवाददाता रह चुके मोहन सहाय बताते हैं कि वे स्वच्छ दिल के मिलनसार व्यक्ति थे। उनके बारे में अनेक समकालीन लोगों की भी ऐसी ही राय रही है।

  अच्छा लगता ,यदि पटना के अखबारों में भी उनके निधन की खबर आज आ गई होती।

  दरअसल अपवादों को छोड़ दें तो पुरानी पीढ़ी के पत्रकारों की खोज -खबर आज का मीडिया ऐसे भी कम ही लिया करता है। जबकि उन पत्रकारों के पास राजनीति, प्रशासन तथा समाज के अन्य वर्गों के बारे में एक तुलनात्मक दृष्टि होती है। उनसे सीखा जा सकता है।

 उनके अनुभव बांटे जाने चाहिए। वैसे भी उन में से कई पत्रकार अपने जमाने में राजनीति व प्रशासन को प्रभावित कर चुके होते हैं। पर आज उनमें से अधिकतर पत्रकार उपेक्षित जीवन बिता रहे होते हैं। वैसे भी कुछ दशक पहले तक पत्रकारिता में पैसे भी तो कम ही मिलते थे।

  विडंबना यह है कि उनमें से कुछ पत्रकारों के निधन की खबर उनको जानने वाले थोड़े से लोगों के जरिए ही मिल पाती है। जबकि उन पत्रकारों ने खुद अपने कार्यकाल में न जाने कितने लोगों की खबरें आम लोगों तक पहुंचाईं होगी।

रविवार, 16 मार्च 2014

बलिदान की भूमि पर आदर्शों की हत्या

  बिहार में इस बार जितने बड़े पैमाने पर टिकट के लिए दल -बदल हो रहे हैं, उतने इससे पहले कभी नहीं हुए। बिहार कभी सेवा, त्याग और बलिदान वाली राजनीति की भूमि रहा है। अब तो उसे पहचानना ही मुश्किल है।
सवाल यह नहीं है कि कितने लोग दल -बदल कर रहे हैं। सवाल यह है कि आज की राजनीति में कौन ऐसा नेता बचा है जिसका टिकट कट जाने के बावजूद वह अपने दल में बना रह जाएगा ?

किसी नेता को अपनी पत्नी के लिए टिकट चाहिए तो किसी को अपने पति के लिए। किसी की संतान टिकट के लिए मचल रही है तो कोई खुद टिकट के बिना जिंदा नहीं रह सकतां।

  टिकट के लिए इस चूहा -दौड़ को देख कर लगता है कि आज टिकट धर्मा, टिकट कर्मा, धर्मा-कर्मा टिकट-टिकट ही हो चुका है।

    बिहार की इसी धरती पर डा. राजेंद्र प्रसाद हुए थे जिन्होंने 1949 में जवाहर लाल नेहरू को यह लिख कर दे दिया था कि मैं किसी पद का उम्मीदवार नहीं हूं। उनसे पंडित नेहरू ने पूछा था कि क्या आप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं?

यह और बात है कि बाद में सरदार पटेल और दूसरे नेताओं के हस्तक्षेप के बाद राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति बने थे।
  जय प्रकाश नारायण कभी सक्रिय राजनीति में भी थे, पर खुद कभी चुनाव नहीं लड़े। बाद में जेपी ने उपप्रधानमंत्री बनाने के नेहरू के आॅफर को ठुकरा दिया था।

आजादी के समय के बिहार कांग्रेस के दो सर्वाधिक प्रमुख नेता डा. श्रीकृष्ण सिन्हा और डा.अनुग्रह नारायण सिन्हा कभी टिकट के लिए आवदेन पत्र तक ंनहीं देते थे।

उन्हें पार्टी टिकट आॅफर करती थी। तब श्रीबाबू मुख्यमंत्री व अनुग्रह बाबू वित्त मंत्री थे।

 समाजवादी नेता व पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर से जब 1980 में उनकी पार्टी ने कहा कि आपके पुत्र को भी हम लोग विधानसभा का चुनाव लड़वाना चाहते हैं तो कर्पूरी ठाकुर ने कहा कि उसे दे दीजिए, पर तब मैं खुद नहीं लडूंगा। क्योंकि परिवार के किसी एक ही व्यक्ति को चुनाव लड़ना चाहिए। बिहार के ताजा राजनीतिक इतिहास में ऐसे अन्य अनेक उदाहरण मिलेंगे।

2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में राजद नेता जगदानंद सिंह ने रामगढ़ विधानसभा क्षेत्र में अपने पुत्र को हरवा दिया। उनका पुत्र भाजपा से उम्मीदवार था। जगदानंद ने एक यादव कार्यकर्ता को उम्मीदवार बनवा कर बेटे को हराया।

इससे पहले कोई यादव उम्मीदवार उस क्षेत्र से चुनाव जीत नहीं पाया था। क्योंकि वह राजपूतबहुल क्षेत्र है। जगदानंद सिंह खुद राजपूत परिवार से आते हैं। उन पर लालू प्रसाद का दबाव था कि वे अपने बेटे को ही राजद का उम्मीदवार बनायें। पर उन्होंने नहीं बनाया। 

जगदानंद बक्सर से निवर्तमान सांसद हैं। पर इसके विपरीत आज अपने ही घोषित नीति -सिद्धांत, दलीय आस्था और नेतृत्व के प्रति निष्ठा को तिलांजलि दे -दे कर बड़ी संख्या में नेतागण दल बदल कर रहे हैं और परिवारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं।

  लगता है कि संसद की सीट नहीं हो बल्कि स्वर्ग की सीढ़ी हो।

बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष चैधरी महबूब कैसर का एल.जे.पी. में जाना और राजद नेता रामकृपाल यादव का भाजपा ज्वाइन करना लोगों को चैंकाता है।

यानी चुनावी टिकट के समक्ष सांप्रदायिकता व सामाजिक न्याय के मुद्दे कुछ भी नहीं हंै। वंे मुददे भी सिर्फ मतदाताओं को मूर्ख बनाने के लिए हैं। 

  रामविलास पासवान यह काम पहले ही कर चुके हैं। पर उनके ताजा ‘दिल-बदल’ को देखकर कम से कम उन लोगों को कोई आश्चर्य नहीं हुआ जो 2002 में उनके राजग छोड़ने की असलियत को जानते हैं।

   ऊपर दिये गये कुछ नाम तो नमूने मात्र हैं। दल बदल की महामारी व टिकट के लिए मारामारी से कोई दल वंचित नहीं है। बड़े नेताओं की ओर से ऐसे कामों के लिए पूरा उकसावा है।

  आखिर ऐसे दल बदलु लोग किसी न किसी कीमत पर संसद में क्यों जाना चाहते हैं? क्या वे राष्ट्रहित में सार्थक चर्चा करने के लिए उतावले हैं ? क्या ऐसा कुछ इन दिनों संसद में हो भी रहा है ?

 क्या इन दिनों संसद में देशहित के गंभीर मुद्दे पर कभी कोई आम सहमति बन भी पा रही है ?

  क्या भ्रष्टाचार, महंगाई, संसद के भीतर की रोज ब रोज की अराजकता तथा दूसरे जरुरी मुद्दों पर कोई सार्थक व कारगर बहस हो पा रही है ?

राजनीति में धन बल, बाहुबल व कारपोरेट बल के बढ़ते प्रभाव को रोकन के लिए संसद कोई काम कर भी रही है ?

 इसके विपरीत जनहित में जो कुछ भी कदम उठाए जा रहे हैं, वे आम तौर पर  अदालतों व मीडिया के दबाव के कारण ही।

 ऐसे में दल बदलु लोगों, नव कुबेरों, स्वार्थी तत्वों और आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को संसद में भेज कर मतदातागण देश का कौन सा भला करेंगे ?

यदि थोड़े से  अपवादों को छोड़ दें तो दल बदल करने वालों में से अधिकतर नेताओं के जीवन में शुचिता नाम की कोई चीज नहीं है।

  देश व लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि अधिकतर राजनीतिक दलों ने ऐसे ही लोगों को भेजने की तैयारी कर ली है। इस स्थिति में राजनीतिक प्रेक्षकों व देश का भला सोचने वालों की राय है कि अब यह जिम्मेदारी मतदाताओं पर है जो ऐसे लोगों को कत्तई तरजीह नहीं दें।राजनीतिक दलों की गलतियां सुधारने की जिम्मेदारी अब मतदाताओं पर आ पड़ी है। 


(इस लेख का संशोधित अंश जनसत्ता के 15 मार्च 2014 के अंक में प्रकाशित)

रविवार, 9 मार्च 2014

लेकिन मंडल परिवार से कोई आईएएस क्यों नहीं बना !

मंडल- आरक्षण पर 1994 में जनसत्ता में छपे नेताओं के बयान 


पटना , 18 अगस्त। सामंती पृष्ठभूमि के दो नेता बिहार के मुख्यमंत्री बने। ये थे बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल और सत्येंद्र नारायण सिंह। सवर्ण सत्येंद्र नारायण सिंह के परिवार और उनके रिश्तेदारों के घरों में अनेक आई.ए.एस. और आई.पी.एस. बने। लेकिन पिछड़ा वर्ग के बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल का परिवार अब तक एक भी आई.ए. एस. या आई.पी.एस. पैदा नहीं कर सका।

  क्रीमी लेयर यानी मलाईदार परत की अवधारणा के विरोधी यह कह रहे हैं कि पहले तो सवर्ण लोगों ने जातीय आधार पर बेईमानी की। अब वे लोग क्रीमी लेयर का बंधन लगाकर बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल और पूर्व मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय जैसे संपन्न पिछड़ों के परिजनों को आरक्षण के लाभ से वंचित करना चाहते हैं।
वे कहते हैं कि आरक्षण की लड़ाई सिर्फ नौकरियों के लिए नहीं, बल्कि सम्मान व राजपाट में हिस्सेदारी की लड़ाई का भी हिस्सा है।

  मलाईदार परत के विरोधी यह भी कहते हैं कि धन संपत्ति, लाठी और दूसरे मामलों में बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल और सत्येंद्र नारायण सिंह और उनके रिश्तेदारों के परिवारों में कोई खास फर्क नहीं है। फर्क यही है कि श्री मंडल के परिवार में कोई आईएएस या आईपीएस नहीं है। इसलिए मंडल परिवार एक खास प्रकार की हीन भावना से भी ग्रस्त है। आरक्षण से संबंधित मंडल आयोग की रपट से इस भावना से मुक्ति मिलने वाली थी। पर, सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर का बंधन लगा कर धनी पिछड़ों के साथ अन्याय किया है।

 जनता दल ने क्रीमी लेयर की अवधारणा का प्रारंभ से ही विरोध किया है। इसीलिए जब बिहार सरकार को पिछड़ों की मलाईदार परत की पहचान करनी पड़ी तो उसने ऐसा मापदंड तय किया जिसके तहत आरक्षण के लाभ से राज्य का शायद ही कोई पिछड़ा वंचित हो।

लालू कहते हैं कि वे क्रीमी लेयर लगाकर पिछड़ों की एकता तोड़ना नहीं चाहते।

लालू सरकार ने रिटायर आई.ए.एस. यूएन सिन्हा की अध्यक्षता में क्रीमी लेयर की पहचान के लिए समिति बनाई थी। समिति ने जो रपट सरकार को दी, उसमें संशोधन के साथ राज्य सरकार ने उसे स्वीकार किया है।
 राज्य सरकार ने क्रीमी लेयर की छंटाई के लिए जो मापदंड तैयार किया है वह जाहिर है कि बिहार सरकार की नौकरियों पर लागू होगा। लेकिन लालू प्रसाद की जनता दल सरकार ने इस बात को ध्यान में रखकर यह मापदंड तय किया है कि ताकि उसे मौका मिलने पर केंद्र की नौकरियों के लिए भी लागू किया जा सके।

हालांकि जनता दल निकट भविष्य में केंद्र में सत्ता पा सकेगा, ऐसी उम्मीद बहुत थोड़े से लोग ही कर सकते हैं। केंद्र की नौकरियांे के लिए क्रीमी लेयर की छंटाई का काम आर.एन. प्रसाद की समिति ने किया है। आर.एन. प्रसाद की समिति की रपट के अनुसार केंद्र की नौकरियांे में आरक्षण का लाभ उन परिवारों को नहीं मिलेगा जिसकी साल में एक लाख रुपये से अधिक आमदनी है।

पर मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने कहा है कि बिहार में पिछड़ों में कोई क्रीमी लेयर यानी संपन्न तबका नहीं है। क्रीमी लेयर केंद्र सरकार का ब्रहमपाश है जिसके जरिए वह पिछड़ों को मारना चाहती है। क्रीमी लेयर को मैं बधिया आरक्षण मानता हूं। जनता दल के लोहियावादी विधायक राधाकांत यादव ने जनसत्ता को बताया कि पिछड़ों के जिस सपन्न तबकों में नौकरियों के लिए योग्य उम्मीदवार उपलब्ध है, उन्हें तो केंद्र सरकार क्रीमी लेयर के नाम पर छांटना चाहती है। लेकिन जिस कमजोर तबके मेें अभी योग्य उम्मीदवार नहीं हैं, उसे आरक्षण का लाभ देने का ढांेग कर रही है।

डा.राम मनोहर लोहिया ने भी कहा था कि पिछड़ों को जब कुछ मिलने लगेगा तो उसका लाभ पहले वहीं उठाएंगे जो अपेक्षाकृत खुशहाल और दबंग हैं। श्री यादव ने कहा कि हालांकि लोहिया की आरक्षण नीति और आज की आरक्षण नीति में फर्क आ चुका है। आज अरक्षण की लड़ाई में सुविधा और सत्ता में हिस्सेदारी की लड़ाई भी है।

  यू एन सिन्हा समिति के सदस्य डा. राम उदगार महतो ने बताया कि यहां दस लाख रुपये सालाना से अधिक आय और बीस लाख रुपये से अधिक की अचल संपत्ति वाले लोग मलाईदार परत में आएंगे। उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।

डा.महतो ने कहा कि यदि आर.एन. प्रसाद समिति का मापदंड यहां लागू किया जाए तो कोई पिछड़ा यहां किसी काॅलेज का प्रिंसिपल तक नहीं बन सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि आर.एन. प्रसाद समिति का मापदंड यहां लागू कर दिया जाए तो पिछड़ों के लिए आरक्षित सीटें खाली रह जाएंगी। जिस तरह अनुसूचित जाति  के लिए आरक्षित सीटें खाली रहती हैं। अभी पूरे बिहार में सिर्फ सात या आठ हरिजन ही विश्वविद्यालयों में टीचर हैं। प्रोफेसर तो शायद एक भी नहीं।

  दूसरी ओर, खुद यू.एन. सिन्हा समिति के एक बागी सदस्य प्रो.कमलेश्वरी साह ने यह सुझाव दिया था कि विधायक , सांसद या मंत्री जो दो बार चुनाव जीत चुके हैं, उनके परिवार के सदस्यों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

  लालू सरकार ने इसे नहीं माना। क्रीमी लेयर से संबंधित लालू सरकार के मापदंड के खिलाफ डा.जगन्नाथ मिश्र ने राज्यसभा मे आवाज उठाई तो केंद्रीय कल्याण मंत्री सीताराम केसरी ने उसकी जांच कराने का आश्वासन दिया। जनसत्ता से बातचीत में डा.मिश्र ने कहा कि इस बारे में लालू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ काम किया है। इससे साफ हो गया है कि लालू प्रसाद पिछड़ों के सुखी संपन्न व उच्च पदस्थ लोगों के पक्षधर हैं। अन्य पिछड़ों और गरीब पिछड़ों के प्रति उनकी निष्ठा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की मंशा है कि पिछड़ों का वास्तविक गरीब और कमजोंर तबका आरक्षण का लाभ उठाए। जो पिछड़े सामान्य लोगों के बराबर आ चुके हैं, उन्हें क्रीमी लेयर मान कर छांट दिया जाए।

समाजवादी पार्टी के लक्ष्मी साहु ने क्रीमी लेयर के संबंध में बिहार सरकार के रवैये के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा है और हस्तक्षेप की मांग की है।

भारतीय जनता पार्टी की बिहार शाखा के अध्यक्ष कैलाशपति मिश्र ने कहा कि हमारी पार्टी हमेशा 27 प्रतिशत आरक्षण के पक्ष में रही है। लेकिन हम यह भी चाहते हैं कि उसका लाभ पहले उन लोगों को मिले जो गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं।

जनता दल (जार्ज) के सांसद सैयद शहाबुददीन ने कहा है कि क्रीमी लेयर के बारे में बिहार सरकार के फैसले से सुप्रीम कोर्ट की अवमानना होती है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने एक खास मकसद के तहत सरकार से कहा था कि वह क्रीमी लेयर की पहचान करे। लालू सरकार ने उस मकसद के खिलाफ काम किया हे।

सी.पी.आइ. (एम एल-लिबरेशन) की बिहार शाखा के प्रवक्ता राजाराम सिंह ने कहा है कि लालू सरकार ने पिछड़ों को धोखा दिया है।अब पिछड़ी जातियों का गरीब हिस्सा आरक्षण से वंचित होगा।लालू प्रसाद यह कहना चाहते हैं कि पिछड़ों में कोई कुलक या नव धनिक तबका नहीं है।यह गलत बात है।  
    
(यह लेख जनसत्ता के 19 अगस्त, 1994 के अंक में प्रकाशित)

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

गठबंधन से पहले ओपिनियन पोल की जल्दीबाजी क्यों ?

चुनावी गठबंधन का काम पूरा होने से पहले ही ओपिनियन पोल कराने की जल्दीबाजी क्यों दिखाई जा रही है ? इसको लेकर राजनीतिक हलकों में आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा है।

  चुनावी गठबंधन के काम अभी अधूरे हैं। चुनाव पूर्व दल-बदल की प्रक्रिया भी अभी पूरी नहीं हुई है। हर चुनाव से पहले बड़ी संख्या में नेता दल बदल करते हैं। दल बदल टिकट के बंटवारे तक जारी रहते हैं। वोट के समीकरण में राजनीतिक गठबंधनों व दल- बदल का काफी महत्व रहा है। इस देश का चुनावी इतिहास यही बताता है।

  पर गठबंधन के पहले ही इन दिनों धुआंधार चुनावपूर्व ओपियन पोल कराए जा रहे हैं। उनके नतीजे भी सार्वजनिक किये जा रहे हैं। ऐसे में ये नतीजे आखिर कितने सटीक साबित होंगे ?

  यह सवाल बिहार को लेकर अधिक मौजूं है।


नतीजे गलत होने के आसार

   वैसे भी ओपिनियन पोल के नतीजे सीटों की संख्या के बारे में सटीक नहीं होते। हो भी नहंीं सकते। पर,उससे चुनावी हवा के रुख का जरूर पता चल जाता है। पर, यह भी इस बात पर निर्भर करता है कि ओपिनियन पोल का समय क्या है। चुनावी गठबंधन से पहले तो ओपिनियन पोल के नतीजों के गलत होने के और भी आसार रहते हैं। इसके बावजूद ओपिनियन पोल करने-कराने के लिए इतनी जल्दीबाजी क्यों ? इस जल्दीबाजी के कारण ओपिनियन पोल को बकवास बताने वालों को बल मिल रहा है। नेताओं की एक जमात हमेशा ही ओपिनियन पोल के खिलाफ आवाज उठाती रही है।

ओपिनियन पोल के नतीजे जिन दलों या नेताओं के खिलाफ जाते हैं, वे तो कुछ अधिक ही जोर-शोर से ऐसे पोल के खिलाफ आवाज उठाते रहते हैं। उनमें से कुछ लोग पोल की मंशा पर भी शक करते हैं। समय पूर्व ओपिनियन पोल से ऐसे लोगों को बल मिलता है।  


अलग पोल के अलग नतीजे

बिहार से संबंधित कुछ ओपिनियन पोल के परस्परविरोधी नतीजे भी आ रहे  हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार उनके सटीक होने के बारे में संदेह है। अब तक   दो अलग- अलग ओपिनियन पोल के अलग-अलग नतीजे आ चुके हैं। ये पोल हाल ही कराए गए थे।


अलग-अलग गठबंधन

    बिहार में राजद, जदयू और भाजपा अलग -अलग बड़ी राजनीतिक ताकतें हैं। ये दल अलग-अलग गठबंधन करने की कोशिश में हैं। यदि गठबंधन हो गये तो वोट के समीकरण थोड़ा बदल सकते हैं। फिर तो चुनाव नतीजे भी अलग तरह के हो सकते हैं। ऐसे में हाल के ओपिनियन पोल के नतीजों का क्या और कितना अर्थ रह जाएगा ?

  इन पंक्तियों के लिखते समय तक राजद प्रमुख लालू प्रसाद कांग्रेस, लोजपा और एन.सी.पी. से चुनावी तालमेल की कोशिश में हंै। बातचीत चल रही है। पर इस बीच यह भी खबर आई है कि लोजपा भाजपा से तालमेल कर सकती है।

  उधर जदयू भी कुछ वाम दलों से गठबंधन कर सकता है। वह काम भी अभी पूरा नहीं हुआ है। छोटे-छोटे दलों की चुनावों में भूमिका कई बार महत्वपूर्ण हो जाती है।

राम विलास पासवान की पार्टी लोजपा एक छोटी पार्टी है। पर वह दही में जोड़न का काम करती रही है। सन 1999 के लोकसभा चुनाव में लोजपा एन.डी.ए. के साथ थी। नतीजतन उस चुनाव में बिहार से राजग को ही लोकसभा की अधिकतर सीटें मिलीं थीं।

पर राजग को छोड़कर लोजपा 2004 के लोकसभा चुनाव में राजद के साथ हो गई। परिणाम इस गठबंधन के पक्ष में हो गया और राजग की खटिया खड़ी हो गई।

पर 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले लोजपा के किसी गठबंधन में शामिल होने की घोषणा के बिना ही ओपिनियन पोल करा लिये गये और रिजल्ट घोषित कर दिये गये। आखिर ऐसे ओपिनियन पोल के नतीजों को कितना विश्वसनीय माना जाए?

 (24 फरवरी 2014 के जनसत्ता में प्रकाशित) 


शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

सुनवाई में देरी का एक रिकार्ड है एल.एन.मिश्र हत्याकांड मुकदमा

   सुप्रीम कोर्ट ने ललित नारायण मिश्र हत्याकांड मुकदमे की सुनवाई में देरी पर सन् 2011 में ही आश्चर्य प्रकट करते हुए इस संबंध में स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी। सुप्रीम कोर्ट के इस निदेश का क्या नतीजा निकला, यह तो नहीं मालूम, पर यह तथ्य है कि अब तक इस केस को अंतिम मुकाम तक नहीं पहुंचाया जा सका है।

यानी लोअर कोर्ट भी इस केस में किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका है।

  लोअर कोर्ट के फैसले के बाद उसकी अपील हाईकोर्ट व बाद में सुप्रीम कोर्ट में की जा सकती है। यानी इस केस में और कितनी देरी हो सकती है, इसकी कल्पना कठिन नहीं है।

  याद रहे कि 1975 में तत्कालीन रेलमंत्री एल.एन. मिश्र की बिहार के समस्तीपुर में खुलेआम हत्या कर दी गई थी। किसी बड़े नेता की हत्या के केस की सुनवाई में देरी का यह एक रिकाॅर्ड है। इस मामले की सुनवाई पहले समस्तीपुर कोर्ट में हो रही थी, पर 1979 में इस मुकदमे को दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया था। तब से इसकी सुनवाई जारी है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 1991 में ही यह निदेश दिया था कि इस केस की सुनवाई प्रति दिन होनी चाहिए।

  मिश्र हत्याकांड की सुनवाई में देरी इस देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था की स्थिति पर एक कड़ी टिप्पणी है। इस देरी के लिए सिर्फ न्यायालयों पर कार्य अधिकता ही जिम्मेदार नहीं है। जब एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री के हत्यारों को भी इस देश में समय पर सजा नहीं मिल पा रही है, तो अन्य सामान्य अदालती मामलों के हश्र की कल्पना आसानी से की जा सकती है। ऐसी ढीली न्याय प्रणाली का खामियाजा पूरा समाज और देश भुगत रहा है। इससे सिर्फ अपराधी खुश होते हैं।      
  
 ललित नारायण मिश्र सत्तर के दशक के चर्चित केंद्रीय मंत्री थे। अपने जीवनकाल में वे कई कारणों से अक्सर चर्चाओं में रहते थे। पर, उससे भी अधिक चर्चा उनकी हत्या को लेकर हुई थी।

    ललित नारायण मिश्र एक दबंग और विवादास्पद नेता थे। वे तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और उनके छोटे पुत्र संजय गांधी के करीबी थे। उनके जितने दोस्त थे, उतने ही दुश्मन। बिहार के मजबूत नेता व स्वतंत्रता सेनानी ललित नारायण मिश्र की हत्या से संबंधित मुकदमे की सुनवाई के अंत की वर्षों से बिहारवासी प्रतीक्षा कर रहे हैं। 

   याद रहे कि इस केस में भी शुरू से ही राजनीति होती रही है। यह भी देरी का कारण रहा। इसे राजनीतिक हत्या बताया जाता है। इस केस की जांच का भार पहले बिहार पुलिस की सी.आई.डी. और बाद में सी.बी.आई. को सांैपा गया। बिहार की अदालत में इस केस से संबंधित आरोप पत्र दाखिल किया गया था। पर बाद में सी.बी.आई. ने सुप्रीम कोर्ट से गुजारिश की थी कि वह इस केस को बिहार से बाहर सुनवाई के लिए भेजने का आदेश दे। क्यांेकि इस केस से संबंधित कागजात नष्ट किए जाने का खतरा है और गवाह विक्रम की जान पर भी खतरा है। विक्रम इस केस का इकबालिया गवाह बन गया था। 

सी.बी.आई. ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि विक्रम को बिहार की जेल में जान से मार देने की धमकी मिल रही है। संभवतः यह पहला केस था जिसकी सुनवाई संबंधित राज्य से बाहर करने का सुप्रीम कोर्ट ने 17 दिसंबर 1979 को आदेश दिया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की त्वरित सुनवाई का आदेश भी निचली अदालत को दिया था। इसके बावजूद कई कारणों से यह केस लंबा खिंचता चला गया।
    
22 मई 1980 को यह केस सेशन ट्रायल के लिए भेज दिया गया था। याद रहे कि इकबाली गवाह यानी एप्रूवर विक्रम ने 7 मई 1980 को दिल्ली के चीफ मेट्रोपाॅलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष यह बयान दिया था कि अक्तूबर 1978 में बिहार सरकार के तत्कालीन मुख्य सचिव ने उससे कहा था कि राज्य सरकार इस केस को वापस कराना चाहती है। विक्रम ने यह भी कहा था कि बिहार सरकार चाहती है कि उसके कहने के अनुसार ही वह कोर्ट में गवाही दे। 

  याद रहे कि जब ललित नारायण मिश्र की हत्या हुई थी तब कांग्रेस के अब्दुल गफूर बिहार के मुख्यमंत्री थे। बाद में उसी दल के डा. जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री बना दिए गए। कांग्रेस हाई कमान के इस फैसले को स्वीकार कर लेने के कारण ललित बाबू की विधवा डा. मिश्र से नाराज हो गई थीं। डा. मिश्र ललित बाबू के भाई हैं। इस नाराजगी को लेकर तरह- तरह की चर्चाएं थीं। आपातकाल की समाप्ति के बाद जनता पार्टी के कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री बने। सन् 1980 में इंदिरा गांधी फिर कें्रद्र में सत्ता में आ गईं। 1980 में ही डा.जगन्नाथ मिश्र एक बार फिर मुख्य मंत्री बने। 

  कर्पूरी ठाकुर जब मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने प्रसिद्ध न्यायविद् वी.एम.तारकुंडे से कहा था कि वे इस बात की समीक्षा करें कि सी.बी.आई.इस केस कीं जांच सही दिशा में कर रही है या नहीं। तारकुंडे ने फरवरी, 1979 में प्रस्तुत अपनी रपट में साफ -साफ कह दिया था कि सी.बी.आई. इस केस में आनंद मार्गियों को गलत ढंग से फंसा रही है। इस रपट को बिहार सरकार ने केंद्र सरकार को भेज दिया था। 

  पहले दिल्ली के पाटियाला हाउस कोर्ट में यह केस गया। फिर इसे तीस हजारी कोर्ट में भेज दिया गया। इस लंबे खिंचते मुकदमे की सुनवाई बारी- बारी से करीब दो दर्जन जज कर चुके हैं। कुछ समय पहले तक प्राप्त सूचना के अनुसार बचाव पक्ष के चार वकीलों का सुनवाई के बीच ही देहांत हो चुका है। एक अभियुक्त की भी मृत्यु हो चुकी है। सन 2011 में यह सूचना मिली थी कि बचाव पक्ष के कुल 39 गवाहों में से 31 की इस बीच मृत्यु हो चुकी है।


   इस केस के दस्तावेज 11 हजार पन्नों में हैं। सी.बी.आई. ने आनंद मार्ग से जुड़े 10 प्रमुख लोगों के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया। आनंद मार्ग के जिन लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया, उनमें संतोषानंद, सुदेवानंद, गोपाल जी, रंजन द्विवेदी, दीनानंद, राम कुमार, रामाश्रय और अर्थानंद शामिल हैं। इनमें से कुछ व्यक्तियों का निधन हो चुका है। राम कुमार तथा रामाश्रय को गिरफ्तार नहीं किया जा सका। कई सौ गवाहों की गवाहियां गुजर चुकी हैं। कई साल साल पहले एल.एन.मिश्र के पुत्र विजय कुमार मिश्र की गवाही हो चुकी है। विजय मिश्र बिहार में विधायक हैं।

    यह हत्याकांड जब हुआ था तब आनंद मार्ग के संस्थापक प्रभात रंजन सरकार उर्फ आनंदमूर्ति जी पटना के केंद्रीय कारा में बंद थे। उन पर अपने ही संगठन के बागी संन्यासियों की हत्या का आरोप था। यह बात और है कि वे बाद में उन आरोपों से बरी हो गए थे। पर आनंदमूर्ति के जेल में रहने के कारण देश-विदेश में फैले उनके कट्टर अनुयायियों में बड़ा रोष था। सी.बी.आई. का आरोप है कि आनंदमार्गियों ने अपने गुरू की रिहाई के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए ललित नारायण मिश्र की हत्या कर दी। 

हालांकि बिहार पुलिस की सी.आई.डी. द्वारा प्रारंभिक जांच के सिलसिले में जो बातें सामने आई थीं, वे बातें किन्हीं अन्य प्रभावशाली लोगों की तरफ इशारा करती थीं। इस हत्याकांड के मुख्य सूत्रधार दिल्ली के एक अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति बताये जाते हैं जिनका सत्ता के शीर्ष से सीधा संबंध था। आनंदमार्गी इस हत्याकांड में कहीं नहीं थे।

ललित बाबू के एक परिजन ने भी इन पंक्तियों के लेखक से व्यक्तिगत बातचीत में इस बात की पुष्टि की थी कि दिल्ली के उस प्रभावशाली व्यक्ति का ही हत्या में हाथ था। 

    इस केस में पूर्व मुख्यमंत्री डा.जगन्नाथ मिश्र पहले ही गवाही दे चुके हैं। इस केस के मुतल्लिक ललित बाबू के परिजन भी यह मानते हैं कि जिन आनंदमार्गियों को आरोपित किया गया है, उनसे ललित बाबू की कोई दुश्मनी नहीं थी। आनंद मार्ग से भी उनकी कोई दुश्मनी नहीं थी। दिल्ली से गवाही देकर पटना लौटे विजय कुमार मिश्र ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया था कि मैंने अदालत को कह दिया है कि मेरे पिता की हत्या में उन लोगों का हाथ नहीं है जिनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया है। 

इससे पहले ललित नारायण मिश्र की विधवा कामेश्वरी देवी ने मई 1977 में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री चरण सिंह को पत्र लिखकर उनसे मांग की थी कि वे मेरे पति की हत्या के मामले की फिर से जांच कराएं। उन्होंने यह भी लिखा था कि जिन आनंदमार्गियों को इस कांड में गिरफ्तार किया गया है, वे निर्दोष हैं। याद रहे कि कामेश्वरी देवी का सन् 2001 में निधन हो गया।
    आश्चर्यजनक ढंग से यह बात सी.बी.आई. की कहानी से मेल नहीं खाती। अब कोर्ट को फैसला करना है कि वह सी.बी.आई की बातों पर भरोसा करती है कि ललित बाबू के परिजनों की गवाही पर। इस केस में फैसला कुछ भी हो, कोई न कोई पक्ष अपील में ऊपरी अदालत में जाएगा ही। क्योंकि मामला न सिर्फ विवादास्पद है बल्कि इसमें राजनीतिक पुट भी है। उनकी हत्या के बाद से ही यह सवाल पूछा जाता रहा है कि क्या उनकी हत्या के पीछे उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा थी ?ं 

   दरअसल इस केस के प्रारंभिक दिनों से ही इस हत्याकांड की जांच प्रक्रिया को लेकर कई तरह की आशंकाएं जाहिर की जाती रही हंै। इस केस की सुनवाई में विलंब होने का यह भी एक कारण रहा। 21 जनवरी 2001 को ही अदालत इस केस में अभियुक्तों के खिलाफ आरोप गठित कर पाई। इस बीच किसी न किसी बहाने सुनवाई टलती रही। 

केस की गति यही थी कि सुनवाई शुरू होने के बाद दस साल में यानी सन् 2001 तक अदालत सात में से सिर्फ दो आरोपितों के बयान ही दर्ज करा पाई थी। ऐसा इस देश के अनेक मुकदमों के सिलसिले में आए दिन होता रहता है। सरकारें अभियोजन पक्ष को चुस्त बनाने की दिशा में काम नहीं करती।

बाद में रोज ब रोज सुनवाई करने का तय हुआ तो केस कुछ तेजी से  आगे बढ़ने लगा। लगा था कि सन् 2009 में किसी समय इस केस का कुछ न कुछ फैसला हो जाएगा। पर ऐसा नहीं हो सका है।

    उत्तर बिहार के समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर 2 जनवरी 1975 को समस्तीपुर-मुजफ्फरपुर बड़ी लाइन का उद्घाटन समारोह था। समारोह चल ही रहा था कि सभा स्थल पर ग्रेनेड से हमला कर दिया गया। इस हमले में रेलमंत्री सहित कई लोग घायल हो गए। 
आरोप है कि इस विस्फोट के बाद से ही इस बात का षड्यंत्र शुरू हो गया कि कैसे ललित नारायण मिश्र का जल्दी से जल्दी और ठीक- ठाक इलाज नहीं होने दिया जाए। ऐसे कुछ नेता लोग भी घटनास्थल पर थे जिनका नाम इस कांड में षड्यंत्रकारी के रूप में बाद में आया था। दरअसल वे ललित बाबू के पहले करीबी ही माने जाते थे, पर वे बाद में भीतर ही भीतर दुश्मन हो चुके थे। षड्यंत्र के तार दिल्ली तक जुड़े बताए गये।

  2 जनवरी 1975 को शाम 5 बज कर 50 मिनट पर हैंड ग्रेनेड से हमला किया गया। घायल ललित बाबू को बगल के शहर दरभंगा के किसी निजी अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचाया जा सकता था। पर उन्हें विशेष ट्रेन से समस्तीपुर से काफी दूर दानापुर लाया गया। वह विशेष ट्रेन जिससे घायल को दानापुर लाया गया, वह समस्तीपुर से रात आठ बजे ही खुल सकी। 

बताया गया कि तकनीकी कारणों से ट्रेन जल्दी नहीं खुल सकी। उस ट्रेन को जानबूझ कर बीच में भी रोका गया। उन दिनों बिहार के सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की हड़ताल थी, किंतु निजी चिकित्सकों से ललित बाबू का इलाज करवाया जा सकता था। समस्तीपुर से घंटों यात्रा करके दानापुर के मामूली रेलवे अस्पताल में लाने के पीछे कई लोगों को तब षड्यंत्र ही लगा था। जाहिर है कि इस बीच उनकी हालत बिगड़ गई और अगले दिन उनकी मृत्यु हो गई।

   इस हत्याकांड की कहानी सिर्फ इसलिए ही अजूबी नहीं है कि इसकी जांच और सुनवाई में रिकाॅर्ड समय लग रहा है, बल्कि इसलिए भी अजीब है क्योंकि इसमें काफी गुत्थियां हैं। इस केस को लेकर ललित बाबू के शुभचिंतकों व उनको जानने वाले लोगों में उलझन बरकरार है।
     इस केस के अनुसंधान के दौरान कई मोड़ आए। घटना के बाद की शुरुआती जांच के दौरान अरुण कुमार ठाकुर और अरुण मिश्र के सनसनीखेज बयान सामने आए थे। इन लोगों ने समस्तीपुर के एक न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष सी.आर.पी.सी. की धारा -164 के तहत यह बयान दिया था कि किसी के कहने पर उन लोगों ने ही हत्या की योजना बनाई थी और उस काम को अंजाम दिया था। बिहार पुलिस की सी.आई.डी. ने मिश्र और ठाकुर के बयान दर्ज करवाए थे।

  पर, इस बयान के आने के तत्काल बाद सी.बी.आई. के निदेशक डी.सेन ने समस्तीपुर का दौरा किया और कह दिया कि मिश्र और ठाकुर निर्दोष हैं। दरअसल ललित नारायण मिश्र की हत्या में आनंदमार्गियों के हाथ हैं। दरअसल अरुण मिश्र और अरुण ठाकुर के बयानों से यह बात भी सामने आ रही थी कि इस हत्याकांड में बिहार के एक एम.एल.सी., मुजफ्फरपुर के एक कांग्रेसी नेता और दिल्ली के एक चर्चित कांग्रेसी नेता शमिल हैं।

    जो लोग आनंदमार्गियों को निर्दोष मानते हैं, उन्हें इस मिश्र-ठाकुर की कहानी पर भरोसा है। पर पता नहीं असलियत क्या है। अदालत के सामने सारे तथ्य दोनों ंपक्ष रख रहे हैं। अदालती निर्णय से दूध का दूध और पानी का पानी होने की उम्मीद की जानी चाहिए। अदालत देखेगी कि सी.बी.आई. के आरोप पत्र में कितना दम है। वह यह भी देखेगी कि जो लोग आरोपित हैं, उनकी कहानी में कितना दम है।

      इस मुकदमे के अलावा ललितनारायण मिश्र हत्याकांड की जांच के लिए मैथ्यू आयोग भी बना था। मैथ्यू आयोग के समक्ष समस्तीपुर रेल पुलिस के अधीक्षक सरयुग राय और अतिरिक्त कलक्टर आर.वी. शुक्ल ने कहा था कि ललित नारायण मिश्र को घायलावस्था में समस्तीपुर से दानापुर ले जाने वाली गाड़ी को समस्तीपुर स्टेशन पर शंटिंग में ही एक घंटा दस मिनट लग गये। 

दरभंगा के कमिश्नर जे.सी. कुंद्रा ने 16 अप्रैल 1975 को आयोग से  कहा कि मैंने उद्घाटन के अवसर पर दो हजार लोगों को निमंत्रित करने के रेल अधिकारियों के प्रस्ताव पर कभी सहमति नहीं दी थी। पर सुरक्षा व्यवस्था पूरी थी। बम विस्फोट के कारण उत्पन्न विभ्रम के कारण भी घायल को लेकर जा रही रेलगाड़ी के छूटने में देर हुई होगी। साथ ही इसका यह भी कारण था कि स्टीम इंजन को बदल कर रेल अफसर उस ट्रेन में डीजल इंजन लगाना चाहते थे ताकि ट्रेन की गति अधिक हो।

 (22 फरवरी 2014)