ईश्वर उसी की मदद करता है जो
अपनी मदद खुद करता है
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सुरेंद्र किशोर
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1.-मोतियाबिंद का आॅपरेशन अब तक तो मुझे करवाना नहीं पड़ा है।
2.-एक को छोड़कर मेरे सारे दांत अब भी सही सलामत हैं।
(वह एक भी मेरा साथ नहीं छोड़ता,यदि ‘उपाय’ का पता मुझे उससे पहले चल गया होता !)
3.-मेरे बाल भी अधिकतर सम वयस्कों की अपेक्षा कम पके हैं।
4.-नौकरी के दौर में जितने घंटे मैं काम करता था,उसकी अपेक्षा आज कुछ अधिक ही काम कर रहा हूं।
फिर भी थकावट नाम की चीज नहीं है।आदि आदि
मैं पूरी अवधि सेवा करने के बाद आज से बीस साल पहले रिटायर कर गया था।
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शरीर के सारे महत्वपूर्ण अंग अभी काम कर रहे हैं।स्वास्थ्य संबंधी एक -दो समस्याएं जरूर हैं,पर उनका प्रबंधन संभव है।
इस उपलब्धि में ईश्वर,चिकित्सक और मेरे अपने अनुशासन का योगदान रहा है।
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सन 1966-67 से लेकर 1976-77 तक अपने शरीर को एक तरह से मैंने जर्जर बना लिया था।
राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर समाजवाद लाने की भोली मृगतृष्णा में दस साल तक भटकता रहा।
न खाने का ठीक, न सोने का।मान-सम्मान ताखे पर।
साठ के दशक में पटना के विधायक फ्लैट इलाके की झोपडियों में 10 आने में भरपेट भोजन मिलता था।
पर हमेशा उतने पैसे मेरे पास होते नहीं थे।छह आने में एक प्लेट पकौड़ी से काम चला लेता था।वैसे में पाचन क्रिया का कचूमर निकल चुका था।
पर जब संभला तो कठोरता से कई तरह के संयम बरतने लगा।
उसका नतीजा है --आज की उपलब्धि।
गांधी जी की जो थोड़ी सी बातें मैं मानता हूं ,उनमें एक यह भी ़है कि ‘‘बीमारी मनुष्य के पाप का फल है।’’
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मैंने यह पोस्ट इसलिए लिखा ताकि मैं यह बता सकूं कि यदि आप संयम बरतंेगे तो इस शरीर से अधिक दिनों तक काम लेते रहंेगे।साथ ही,यदि परिवार आप पर निर्भर है तो उसे आपके असमय उठ जाने की पीड़ा नहीं सहनी पड़ेगी।
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यह पढ़कर मुझसे उपाय मत पूछने लगिएगा।क्योंकि मैं कोई लाइसेंसधारी चिकित्सक नहीं हूं।
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20 जनवरी 25
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