शनिवार, 19 मई 2018

50 करोड़ रुपए से अधिक के सारे कर्जों का बैंकों ने फारेंसिक आॅडिट कराना शुरू कर दिया है।
यदि इस तरह के आॅडिट में  इस बात की आशंका दिखी कि कर्ज की वापसी की संभावना कम है तो वैसे मामलों को जांच एजेंसियों को सांैप दिया जाएगा।
 साथ ही 250 करोड़ रुपए से अधिक के कर्जों पर अलग से नजर रखी जा रहा है।
देखा जा रहा है कि कहीं कर्ज देने की नियम को तोड़ा तो नहीं गया है।
 यानी आने वाले दिनों में ऐसे कर्जखारों की नींद हराम हो सकती है जिनका इरादा कर्ज वापस करने का कभी नहीं रहा। 
साथ ही ऐसे मामलों में वैसे वी.वी.आई.पी.भी बेनकाब हो सकते हैं जिन लोगों ने अपने प्रभाव का दुरुपयोग करके ऐसे लोगों को भारी कर्ज दिलवाए जिनकी कर्ज वापसी की क्षमता काफी कम है।

शुक्रवार, 18 मई 2018

  महाराष्ट्र सरकार ने इस साल जनवरी में ही उन लोगों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दे दिया  जो लोग इमरजेंसी में जेलों में थे।वे इंदिरा सरकार से राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे थे।
साथ ही, वहां  उन्हें हर माह दस हजार रुपए पेंशन देने का निर्णय किया गया।साल में एक बार 10 हजार रुपए  मेडिकल भत्ता  देने का भी निर्णय हुआ।
बिहार सहित कुछ  राज्य सरकारों ने भी पेंशन का प्रावधान किया है।
 इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार पर गत दिसंबर में ही एक प्रमुख भाजपा नेता ने कहा था कि जहां भी भाजपा सरकार में है,वहां पेंशन का प्रावधान किया जाएगा।पता नहीं उसका क्या हुआ ?
इधर बिहार के जेपी सेनानियों ने उनके लिए भी कुछ करने की राज्य सरकार से मांग की है जो भूमिगत थे।
आजादी की लड़ाई के सेनानियों और उनके परिजन को केंद्र सरकार पेंशन देती है।यह भी मांग उठ रही है कि केंद्र सरकार अलग से जेपी सेनानियों व इमरजेंसी के भुक्तभोगियों को पेंशन दे।
इससे 1975 -77 में लोकतंत्र के लिए लड़ने वालों की याद भी बनी रहेगी।


दाना पुर-दिघवारा प्रस्तावित पुल सारण को बनाएगा मिनी ‘नोयडा’



पटना के पास गंगा नदी पर एक और पुल के निर्माण की योजना है।उस पर शुरूआती प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है।
इस पुल के बन कर तैयार हो जाने के बाद आर्थिक रूप से पिछड़े जिले सारण के विकास की प्रक्रिया तेज हो जाने की संभावना है।
  वैसे भी जेपी सेतु के चालू हो जाने के बाद सारण के एक बड़े इलाके में बिल्डर्स और डेवलपर्स सक्रिय हो चुके हैं।
दाना पुर -दिघवारा प्रस्तावित पुल के बन जाने के बाद उन इलाकों में कृषि उद्योग की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।सारण मुख्यत एक कृषि प्रधान जिला है।
पर वहां आबादी अधिक व खेती का रकबा कम है।
नतीजतन बड़ी संख्या में लोग राज्य के बाहर जाकर नौकरी करते हैं या छोटा-मोटा रोजगार ।

1972 से पहले अविभाजित सारण जिले को मनीआर्डर इकोनाॅमी का जिला कहा जाता था।कमोवेश अब भी यही स्थिति है।
 पटना से करीब होने के बावजूद सारण का समुचित विकास नहीं हो सका है।पर अब स्थिति धीरे -धीरे बदल रही है।हाल के वर्षों में सड़क-बिजली ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
 पटना और हाजी पुर के बीच के गांधी सेतु के 1982 में चालू हो जाने के बाद वैशाली जिले का विकास तो हुआ,पर सारण के विकास की प्रक्रिया जेपी सेतु ही तेज कर सका।
  अब नये प्रस्तावित पुल से दाना पुर दियारे का भी विकास तेज हो सकता है यदि वह पुल दियारे से होकर गुजरे और दियारे के लोगों को भी पुल तक पहुंचने का आसान मौका मिले।
  जानकार सूत्रों के अनुसार प्रस्तावित पुल को लेकर अभी दो   वैकल्पिक संरेखनों यानी एलाइनमेंट पर विचार किया जा रहा है।
 पुल को सगुना मोड़ से शुरू करके उसे गंगा के उस पार सोन पुर -छपरा एन.एच. से मिला दिया जाए।
या फिर दाना पुर से ही शुरू करके दियारा होते हुए उस पार दिघवारा से मिला दिया जाए।
 दूसरे विकल्प से सारण के अपेक्षाकृत अधिक इलाकों को लाभ पहुंच सकेगा।
अधिक लाभ यानी अपेक्षाकृत सारण के अधिक भूभाग का विकास।सोन पुर से दिघवारा तक गंगा के किनारे दिल्ली के यमुना पार वाली स्थिति बन सकती है।
जाहिर है कि ऐसे विकास में गैर सरकारी एजेंसियां भी  भूमिका निभाती हैं।
सारण के विकास होने पर पटना पर से आबादी का बोझ घटेगा।
 इससे प्रादेशिक राजधानी पर प्रदूषण व भू जल संकट की मार भी कम होगी।
साथ ही पटना और  उत्तर बिहार के बीच आना -जाना और सुगम हो जाएगा।
 अब देखना है कि इस प्रस्तावित पुल का निर्माण कार्य कब शुरू होता है।   
   कितनी महंगी हो गयी राजनीति !--
कर्नाटका एक यह खबर आई कि प्रत्येक विधायक को खरीदने के लिए इस बार 100 करोड़ रुपए का आॅफर दिया गया।
पता नहीं, यह आरोप सही है या गलत  ! पर एक बात तो  पक्की है कि आज की राजनीति बहुत  महंगी हो चुकी है।
 अपवादों को छोड़ दें तो आम लोग तो चुनाव लड़ ही नहीं सकते।
 2013 में एक सांसद ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि उन्हें  2009 के अपने चुनाव क्षेत्र में 8 करोड़ रुपए खर्च करने पड़े थे।
नब्बे के दशक में यह खबर आई थी कि कुछ सांसदों को 50 -50 लाख रुपए देकर ‘प्रभावित’ किया गया था।इतने रुपए उनके बैंक खातों में पाए भी गए थे।
ऐसा एक दिन में नहीं हुआ है। राजनीति व शासन में बढ़ते भष्टाचार के साथ साथ धीरे -धीरे चुनावी खर्च भी बढत़ा चला 
गया।जिस तबके ने यह खर्च बढ़ाया है,जिम्मेदारी उसी की है कि वह उसे कम करे। 
 एक बार पूर्व केंद्रीय मंत्री एल.पी.शाही ने बताया था कि 1952 के विधान सभा चुनाव  में उनका  सिर्फ 11 हजार रुपए खर्च हुआ था।
1972 में 30 हजार रुपए और 1980 में 35 हजार ।पर 1991 में मुजफ्फर पुर लोक सभा चुनाव क्षेत्र में उनके 11 लाख रुपए खर्च हुए।
 कर्ज दबाने वालों के लिए बुरी खबर---
50 करोड़ रुपए से अधिक के सारे कर्जों का बैंकों ने फारेंसिक आॅडिट कराना शुरू कर दिया है।
यदि इस तरह के आॅडिट में  इस बात की आशंका दिखी कि कर्ज की वापसी की संभावना कम है तो वैसे मामलों को जांच एजेंसियों को सांैप दिया जाएगा।
 साथ ही 250 करोड़ रुपए से अधिक के कर्जों पर अलग से नजर रखी जा रहा है।
देखा जा रहा है कि कहीं कर्ज देने की नियम को तोड़ा तो नहीं गया है।
 यानी आने वाले दिनों में ऐसे कर्जखारों की नींद हराम हो सकती है जिनका इरादा कर्ज वापस करने का कभी नहीं रहा। 
साथ ही ऐसे मामलों में वैसे वी.वी.आई.पी.भी बेनकाब हो सकते हैं जिन लोगों ने अपने प्रभाव का दुरुपयोग करके ऐसे लोगों को भारी कर्ज दिलवाए जिनकी कर्ज वापसी की क्षमता काफी कम है।

एक भूूली बिसरी याद----
जून 2011 में पूर्व कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए मन मोहन सिंह सरकार को कुछ ठोस सुझाव दिए थे।
इस सुझाव पर पी.एम.के सलाहकार सैम पित्रोदा और योजना आयोग के सलाहकार अरूण मायरा के साथ मोइली की बातचीत भी हुई थी।पर सवाल है कि इन सुझावों पर कितना कुछ हुआ ?
उन  सुझावों  का विवरण इस प्रकार है।
1-किसी भी सेवा निवृत नौकरशाह को नियामक@रेगुलेटर@ न बनाया जाए।ऐसे पदों पर सिर्फ सेवारत अफसर ही तैनात हों।
रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले पद के लालच में सेवारत अफसर भ्रष्टाचार में मदद करते हैं।
2-जो अधिकारी  सरकार में अभी कार्यरत हैं,सिर्फ उन्हें ही 
रेगुलेटरी दायित्व दिए जाने चहिए।इसके लिए प्रशासनिक तंत्र को जिला,राज्य व केंद्र स्तर पर अपने अधिकारियों को प्रशिक्षित करना चाहिए।सेवारत अधिकारियों व जजों को रेगुलेटर बनाने से उन्हें सफलता-असफलता या सही गलत काम के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा।
3-ऐसा कानून बने जिससे सरकार के खिलाफ झूठे आरोप लगाने वाले किसी व्यक्ति या स्वयंसेवी संगठनों को भी दंडित किया जा सके।
4-पूरे देश में जहां भी माइनिंग हो रही है या खानें लीज पर हैं,उन सारे मामलों की विस्तार से जांच हो और उनकी लीज को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए।
ऐसा देखा जा रहा है कि माइनिंग कराने वाले स्थानीय स्तर पर अनेक किस्म के भ्रष्टाचार को जन्म और प्रश्रय दे रहे हैं।
5.-सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को उनके प्रदर्शन के आधार पर कोई सेवा विस्तार दिया जाए ताकि वे ज्यादा जिम्मेदारी से कार्य कर सकें और इसके लिए नौकरी से संबंधित कानूनों में आवश्यक संशोधन किए जाएं।
6.-लोकपाल और लोकायुक्त जैसी संस्थाओं  को सक्रिय किया जाये।
7-जिन लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गयी हो, उन्हें सरकारी पदों पर नियुक्त न किया जाए और यही नियम चुनाव के समय राजनैॅतिक उम्मीदवारों के मामले में भी लागू किया जाए।
 मतदान का प्रतिशत बढ़ने का  लाभ--- 
कर्नाटका मेें इस बार 72 दशमलव 36  प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है। वहां 2013 के विधान सभा चुनाव में 71 दशमलव 45 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया था।
  2015 में हुए बिहार विधान सभा  चुनाव में 56 दशमलव 8 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान किया था।उससे पहले 2010 में 52 दशमलव 7 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट डाले थे।
  जानकार लोग बताते हैं कि यदि देश में हर राज्य में कम से कम 80 -85 प्रतिशत मतदातागण मतदान केंद्रों पर पहुंचने लगें तो जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक का महत्व व दबाव घट जाएगा।
      और अंत में--
  उत्तर प्रदेश के पिछड़ा कल्याण मंत्री ओम प्रकाश भर के अनुसार ‘भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मुझे आश्वासन दिया है कि 2019 के लोक सभा चुनाव से ठीक छह माह पहले 27 प्रतिशत पिछड़ा आरक्षण को तीन हिस्सों में बांट दिया जाएगा।’ 
@--18 मई 2018 को प्रभात खबर -बिहार-में प्रकाशित मेरा काॅलम ‘कानोंकान’@






गुरुवार, 17 मई 2018

ब्रिटिश प्रधान मंत्री के पोते बटे्र्रंड रसेल ने बोअर युद्ध में अपने ही देश का किया था विरोध




         
सन 1899 में दक्षिण अफ्रीका में बोअर-ब्रिटिश युद्ध हुआ था।ब्रिटिश प्रधान मंत्री अर्ल रसेल के पोता औन नोबेल पुरस्कार विजेता बर्टेंड  रसेल  तब बोअर स्वतंत्रता का समर्थक बन गये थे।
  इतना ही नहीं,  बट्र्रेंड उर्फ बर्टी युद्ध विरोध व साम्राज्यवाद विरोधी अभियान के एक प्रमुख कार्यकत्र्ता भी थे।
   ब्रिटेन जैसे अमीर और साम्राज्यवादी देश के 
दार्शनिक,गणितज्ञ व तर्क शास्त्री  बर्टी दुनिया की गरीबों की पीड़ा से दग्ध होते रहते थे।
साठ के दशक की  हिंदी फिल्म ‘अमन’ में शांतिदूत बट्र्रेंड रसेल से अभिनेता राजेंद्र कुमार को  बातचीत करते हुए देखा जा सकता है--अमन व शांति का संदेश देते हुए।
फिल्म में राजेंद्र कुमार डाॅक्टर बने थे जो युद्धपीडि़तों की सेवा के लिए जापान जाना चाहते थे।वे रसेल का आशीर्वाद लेने उनके पास गए थे।
   सत्तर के दशक में जब रसेल की जीवनी छपकर आई तो लोगों ने इस अनूठे व्यक्तित्व स्वामी के कई अनजाने पहलुओं को जाना।
  रसेल ने  लिखा  कि उन्होंने अनेक बार अपने जीवन का अंत करना चाहा ,किंतु ज्ञान की पिपासा ने उन्हें जीने की प्रेरणा दी।
  अत्यंत बेबाक तरीके से लिखी गई  चर्चित  आत्म कथा में उन्होंने यह भी लिखा कि मेरे जीवन को जिन तीन बड़ी ही नैसर्गिक किंतु दुर्दम्य वासनाओं ने  अनुप्राणित किया ,वे हैं प्रेम की लालसा,सत्य की खोज तथा मानव वेदना के प्रति गहन सहानुभूति ।युद्ध और परमाणु हथियारों के सख्त विरोधी रसेल ने लिखा कि वे अभी सोलह साल के भी नहीं हुए थे कि उनकी इच्छा अनेक बार आत्म हत्या करने की हुई।पर गणित के प्यार ने उन्हंे ऐसा करने से रोक दिया।
       18 मई ,1872 को  जन्मे रसेल का 2 फरवरी  1970 को  निधन हो गया।उनके दादा अर्ल रसेल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रह चुके थे।बचपन में ही रसेल के माता-पिता का निधन हो चुका था।उनकी दादी ने उन्हें पाला।रसेल  युद्ध के इतने खिलाफ थे कि उन्होंने बोअर युद्ध के भी खिलाफ
विचार प्रकट किया था।याद रहे कि दक्षिण अफ्रीका में बोअर-ब्रिटिश युद्ध चल रहा था।इस संबंध में ‘धर्मयुग’ ने तब लिखा था कि यह एक ऐतिहासिक बिडंबना ही है कि रसेल जब बोअर स्वतंत्रता के समर्थक बन गये तब गांधी जी ने ब्रिटिश पक्ष का सक्रिय समर्थन किया था।   
  बर्टी कभी लोकप्रिय नहीं बन सके,हालांकि वे हमेशा जनहित कार्यों में सक्रिय रहे।वैसे भी किसी भी समाज में सच बोलने वाला भला लोकप्रिय कैसे बन सकता है !
  सबसे अनोखी बात  बर्टी ने अपनी माता के बारे लिखी ।वैसी  बात लिखने की हिम्मत शायद ही किसी अन्य जीवनी लेखक ने कभी की हो।
बर्टी की आत्म कथा के अनुसार ‘बर्टी के बड़े भाई को पढ़ाने के लिए एक विद्वान ट्यूटर रखे गये थे,जो अविवाहित और दुर्बल थे।राजयक्ष्मा के कारण ,जो उन दिनों असाध्य रोग माना जाता था,इस विद्वान का विवाह अवांछनीय था।इस प्रकार वे बेचारे विवशता से ब्रह्मचारी रह गये थे। रसेल के माता-पिता बड़े भावुक मानवतावादी थे।और केवल सैद्धांतिक दष्टि से उन्हें यह बात बड़ी निष्ठुरतापूर्ण लगी कि कोई बेचारा सहज यौन संबंध सुख से वंचित रहे।रोग के कारण उसका संतानहीन होना तो अभीष्ट था,किंतु ब्रह्मचर्य आचरण की अपेक्षा करना क्रूरता।बर्टी लिखते हैं कि उदार दृष्टि अपनाते हुए उनके पिता ने उनकी माता से उनके भाई के टयूटर के सहवास की अनुमति दे दी। उन्हें इसका पता बाद में पिता के कागज पत्रों,डायरी आदि से लगा ।यह तो वास्तव में एक विवश मानव के प्रति सहानुभूतिपरक कत्र्तव्यात्मक कर्म मात्र था।
  रसेल ने इस घटना का वर्णन बड़े ही निर्लिप्त भाव से एक तटस्थ पर्यवेक्षक के रूप में किया है।किसमें साहस है कि अपनी जननी के ऐसे रहस्य का दार्शनिक विश्लेषण दुनिया के सामने इस सहज भाव से लिख डाले ? लेकिन बर्टेंड रसेल तो हमारी धरती की लोकलाज के मापदंडों से परे थे।
    आज जब आधुनिक राजनीति में अपनी चमड़ी बचाने के लिए अधिकतर नेता रोज -रोज  मीडिया के सामने सफेद झूठ बेशर्मी से उगलते रहते है,ऐसे में स्पष्टवादी रसेल याद आते हैं।रसेल ने सत्य को देशहित और परिवारहित से भी ऊपर रखा।
  बर्टेंड रसेल ने प्यार,करूणा और गणित के बारे में कुछ अदभुत बातें लिखी हैं।उन्होंने लिखा कि मैंने प्यार चाहा है क्योंकि वह उल्लास देता है।इतना महान उल्लास कि कभी- कभी मुझे लगा कि उस आनंद की चंद घडि़यों के लिए मैं अपना शेष सारा जीवन न्योछावर कर सकता हूं।
  उन्होंने लिखा कि उतने ही मनोवेग के साथ मैंने ज्ञान की खोज की है।मैंने लोगों के हदय में पैठकर उन्हें जानना चाहा है।मैंने जानना चाहा है कि सितारे क्यों चमकते हैं और गणित के ब्रहमांण्डीय रहस्य भी जानना चाहा है।
  प्यार और गणित जहां तक मुझे प्राप्य थे,मुझे हमेशा धरती से ऊपर सितारों की ओर ले जाते रहे।लेकिन करूणा मुझे सदा धरती पर वापस ले आती थी। 
जहां कहीं भी पीड़ा की चीत्कार थी,उसकी गूंज मेरे मन में उठने लगती थी।अकाल में दम तोड़ते बच्चे ,अत्याचारी के अत्याचार से पिसते निर्बल,गरीबी और अकेलेपन ।मैं चाहता हूं कि सारी बुराई मिटा दूं।पर मिटा नहीं सकता,इसलिए खुद पीड़ा से दग्ध होता रहता हूं।’
  ब्रिटेन जैसे अमीर और साम्राज्यवादी देश के रसेल दुनिया की गरीबों की पीड़ा से दग्ध होते रहते थे।पर हमारे ही देश के मौजूदा अधिकतर नेतागण ! ?----Surendra kishore .
@ द राइटर डाॅट इन से साभार@

पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव में हुई हिंसा पर 
राजनीतिक दलों में एक खास तरह की होड़ मची है।
एक दल कह रहा है कि हमने कम मारे तो दूसरा दल कह 
रहा है कि हमने तुमसे कम मारे।
  यानी कम मरें या ज्यादा, लोग तो  मर ही रहे हैं।
पर शीर्ष नेताओं को ऐसी मौतों पर कोई चिंता भी है ?
इन्हें रोकने का कोई उपाय भी वे कर रहे हैं ?
कत्तई नहीं।ंं
क्योंकि मर तो  रही है पैदल सेना ! बड़े नेता मर रहे होते तो शायद उस पर रोक लगाने के लिए सर्वदलीय बैठकें होने लगतीं।
   हां, नेताओं से अलग बंगाल और देश की शांतिप्रिय जनता बंगाल के नेताओं से एक उम्मीद तो कर ही रही है।
अब तो बंद करो हिंसा-प्रतिहिंसा !
बहुत हो गया।वहां के अधिकतर दलों को अपनी हिंसा का जवाब, प्रति हिंसा से मिल चुका है।मिल रहा है।
इस पर मिल बैठकर तय करो कि हमारे दलों  में गुंडों, हत्यारों और आतंकवादियों के लिए कोई जगह नहीं रहेगी।
पहल कांग्रेसी करेंं।क्योंकि सत्तर के दशक में कांग्रेसी सरकार ने ही पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर हिंसा शुरू करवाई थी - हिंसक नक्सलियों के सफाये के लिए।
  जब 1977 में वाम मोर्चा सत्ता में आया तो कांग्रेस की उस हिंसक वाहिनी के अनेक सदस्यों ने वाम  में शरण ले ली।
याद है न कि  सत्ता में आने से पहले किस तरह तृणमूल कांग्रेस के लोग वाम बाहुबलियों की हिंसा के शिकार होते थे ?
ममता बनर्जी पर भी अनेक बार हमले हुए थे।
पर तृणमूल के सत्ता में आते ही वाम के साथ ‘काम’ कर रहे अनेक बाहुबली तृणमूल के सिपाही बन गए।
अब मार खाने की बारी ममता विरोधियों की है।
यदि अगली बार कोई अन्य दल सत्ता में आ गया तो जो बाहुबली आज तृणमूल की सेवा में हैं,वे नये सत्ताधारी दल में शामिल हो जाएंगे।
आखिर कब तक यह धारावाहिक  चलता रहेगा ? देश को कभी दिशा देने वाला बंगाल कब तक एक अराजक प्रदेश बना रहेगा ? क्या अब भी वहां के राजनीतिक दल खुद को बाहुबलियों से मुक्त नहीं करेंगे ?
मैं जानता हूं कि वे नहीं करेंगे।फिर भी हमारे जैसे अहिंसक लोगों का यह कत्र्तव्य है कि उनसे ऐसा आग्रह किया जाए।

 क्या मल्लिकार्जुन खगड़े को लोक सभा में प्रतिपक्ष के नेता 
का दर्जा इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि वे अनुसूचित 
जाति के हैं ?
  यह आरोप सच नहीं है।सच यह है कि दर्जा पाने की कानूनी शर्त वे पूरी नहीं करते।
फिर भी कांग्रेस प्रवक्ता आनंद शर्मा ने यही आरोप लगाया है।
 शर्मा को लगता है कि जातीय आधार वाले आरोप से कर्नाटका के चुनाव में कांग्रेस को लाभ मिलेगा।
  क्या झूठे आरोप से भी लाभ मिलता है ?
जो व्यक्ति कम से कम 55 सांसदों वाले दल  का नेता होगा,उसे ही वह पद मिलेगा।यानी सदन के सदस्यों की कुल संख्या के दसवंें हिस्से का नेता।
पर कांग्रेस यह शत्र्त पूरी नहीं करती।उसके पास उससे कम सदस्य हैं।फिर भी उसे वह पद चाहिए।
क्योंकि उस पद को कई तरह की सुविधाएं हासिल हैं।
  तत्संबंधी कानून 1977 में बना था।उसके बाद कई बार कांग्रेस सत्ता मंे आई।उसे उस कानून को बदलवा देना चाहिए था।
ताकि, कम सदस्यों वालों को भी दर्जा मिल सके।पर उसे तो लगता था कि वह कभी कम सीटें जीतेगी ही नहीं।इसलिए प्रतिपक्ष को लाभ पहुंचाने के लिए क्यों कानून बदला जाए।
पर जब गत चुनाव में कांग्रेस 44 सीटों पर ही सिमट गयी तो उसने दलित कार्ड खेलना शुरू कर दिया।
  सोनिया गांधी ने हाल में यह आरोप लगाया कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी गलत ऐतिहासिक तथ्य पेश कर रहे हैं।
सोनिया गांधी के आरोप में दम है।
पर स्वस्थ राजनीति के हक में  खुद कांग्रेस भी तो गलत आरोप न लगाए।  

पाकिस्तान के पूर्व प्रधान मंत्री नवाज शरीफ ने अब यह स्वीकार किया  है कि 2008 मेें हुए मुम्बई हमले में पाक आतंकियों के हाथ थे।उस हमले में करीब डेढ़ सौ लोग मारे गए थे।
पर उस हमले के तत्काल बाद कांग्रेस महा सचिव दिग्विजय सिंह व पूर्व मुख्य मंत्री अब्दुल रहमान अंतुले ने क्या -क्या बयान दिए थे ? कुछ याद है ?