पटना के पास गंगा नदी पर गांधी सेतु 1982 से स्थित है।
यह पुल पटना के पूर्वी हिस्से में है।
उस सेतु से बिलकुल सटे यानी कुछ ही मीटर की दूरी पर एक और पुल बनने जा रहा है।
आज सुना कि प्रस्तावित पटना रिंग रोड़ से जुड़ा
प्रस्तावित गंगा पुल जेपी सेतु के ठीक बगल में बनने जा रहा है।
नया जेपी सेतु हाल में चालू हुआ है।यह पश्चिमी पटना में है।
यानी, कुछ वर्षों के बाद पटना को उत्तर बिहार से जोड़ने लिए कुल चार पुल गंगा नदी पर हो जाएंगे।दो पहले से और दो नए।
पर जानकारों के अनुसार इसमें भारी गड़बड़ी हो रही है।
दो -दो पुल इतने पास -पास ? !
पास- पास पुल सुरक्षा की दृष्टि से कत्तई ठीक नहीं।
यदि चारों पुलों की आपस में दूरी अधिक होती तो अधिक क्षेत्र भी विकसित होते।सड़क और पुल तो विकास के इंजन हैं।
पर, पता नहीं, नीति निर्धारकों को यह बात क्यों समझ में नहीं आई !
बिहार में कहा जाता है कि ‘दूध का जला मट्ठा फूंक कर पीता है।’
लगता है कि यह कहावत न तो नरेंद्र मोदी ने सुनी है और न ही अमित शाह ने।शायद गुजरात में ऐसा नहीं कहा जाता होगा !
संभवतः इसलिए भाजपा नेतृत्व इस बार 2004 दुहराने पर आमादा लगता है।
1999 में राम विलास पासवान राजग में थे।
उस साल के चुनाव में राजग को अविभाजित बिहार की 54 में से 41 सीटें मिली थीं।
बाद में राम विलास पासवान राजग से निकल गए या निकल जाने के लिए बाध्य कर दिए गए।मलाईदार मंत्रालय छीन कर।
2004 के लोक सभा चुनाव में पासवान लालू के साथ मिल कर चुनाव लड़े।
लालू गठबंधन को 2004 में बिहार की 40 सीटों में से 29 सीटें मिलीं।
जबकि पासवान सहित राजग को 1999 में अविभाजित बिहार में 54 में से 41 सीटें मिली थीं।
यदि 1999 के अनुपात में ही राजग को सीटें मिली होती तो
2004 में भी अटल जी की सरकार केंद्र में बन गयी होती।
लगता है कि 2004 में दूध का जला 2019 में मट्ठा फूंक कर पीने की जरूरत भाजपा महसूस नहीं कर रही है।भाजपा ने पहले कुशवाहा की परवाह नहीं की और अब पासवान की भी चिंता नहीं करती नजर आ रही है।
क्या इन दलों के न रहने के कारण होने वाले नुकसान की क्षतिपूर्ति के लिए भाजपा के पास कोई ब्रह्मास्त्र तैयार है ?
राम मंदिर ब्रह्मास्त्र या ओबीसी वर्गीकरण
का दांव ? पता नहीं !
ड्रायवर रखने में सावधानी बरतें नेतागण
-----------------------
पूर्व रेल मंत्री सी.के.जाफर शरीफ के बारे मंे यह कहानी मैंने
तभी सुनी थी।
पर, मैंने उस पर पूरा विश्वास नहीं किया था।
पर, जब कर्नाटका के पत्रकार मनोहर यडवट्टि ने पाक्षिक पत्रिका ‘यथावत’ के ताजा अंक में वही बात लिख दी तो मुझे लग गया कि अन्य लोगों को भी यह कहानी बतानी चाहिए ।ताकि, कम से कम बड़े नेतागण व महत्वपूर्ण लोग अपना ड्रायवर रखने में सावधानी बरतें।
हाल में जाफर शरीफ के निधन के बाद मनोहर यडवट्टि ने उस किस्से को कुछ इस तरह लिपिबद्ध किया,
‘गरीब परिवार में जन्मे और अल्प शिक्षित जाफर शरीफ जवानी के दिनों में कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर के नेता एस.निजलिंगप्पा के संपर्क में आए।उनके निजी सहायक और ड्रायवर के रूप में अपने कैरियर की शुरूआत की।’
@ यह बात उस समय की है जब
निजलिंगप्पा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे।@
‘इस कारण जाफर शरीफ को बड़े नेताओं के बीच होने वाली बातचीत और राजनीतिक योजनाओं आदि के बारे में भी जानकारी रहती थी।
जब कांग्रेस में इंदिरा गांधी के नेतृत्व को लेकर विवाद की शुरूआत हुई ,उस समय निजलिंगप्पा इंदिरा गांधी के खिलाफ हो गए।
एक दिन कार में कहीं जाते वक्त निजलिंगप्पा अपने कुछ अन्य सहयोगियों के साथ इंदिरा गांधी को सबक सिखाने की योजना पर बातचीत कर रहे थे।
इस बातचीत को जाफर शरीफ ने ध्यान से सुना और उसके तुरंत बाद वे राजधानी दिल्ली के लिए रवाना हो गए।
प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को सारी बातें विस्तार से बतार्इं।
उससे इंदिरा गांधी को अपने खिलाफ बनाई जा रही सारी योजनाओं की जानकारी मिल गई।
हालांकि इसके लिए जाफर शरीफ को विश्वासघाती तक की संज्ञा दी गयी।
लेकिन इंदिरा गांधी उनकी निष्ठा से काफी प्रभावित हुईं।1969 में कांग्रेस का विभाजन हो गया।
1971 में जब संसदीय चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी ने जाफर शरीफ को कनक पुरा संसदीय क्षेत्र से पार्टी का टिकट दिया।
वह जीते भी।
इंदिरा गांधी ने उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया।
इंदिरा गांधी के रहते उनका कद हर समय ऊंचा बना रहा।’
लोक सभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने कल सदन में हंगामा कर रहे सांसदों को फटकारा और पूछा कि ‘क्या हम स्कूल के बच्चों से भी गए -गुजरे हैं ?’
ऐसा कह कर स्पीकर ने स्कूली बच्चों और उनके शिक्षकों का अपमान किया है।
स्कूली बच्चे तो भोले और नादान होते हैं।ऐसा भोलापन उन सांसदों में कहां ?
दूसरी ओर टीचर जब चाहते हैं,बच्चे शांत भी हो जाते हैं।
आप महोदया तो चाहती भी नहीं हैं।सिर्फ लोगों की सहानुभूति पाने के लिए कुछ ऐसे वाक्यों का यदाकदा उच्चारण कर देती हैं ।हाल के दशकों के अन्य स्पीकर भी यही काम करते रहे हैं।यह लोकतंत्र का दुर्भाग्य है।
मेरी सहानुभति तो ऐसे स्पीकरों के प्रति कत्तई नहीं रही है।क्योंकि अनुशासन कायम करने वाले पहले के स्पीकरों को देखा- जाना है।
आपके टेबल पर जो कार्य संचालन नियमावली रखी रहती है,उसे मैंने भी थोड़ा- बहुत पढ़ा है।आपके पास इतने अधिक अधिकार हैं कि कोई सांसद आपकी अनुमति के बिना चूं तक न करे।
राजनारायण जैसे अदमनीय जन प्रतिनिधि अपने संसदीय जीवन में 9 बार मार्शल आउट हो चुके थे।आपके पास भी हट्ठे -कट्ठे मार्शल व संतरी हैें।जरूरत पड़े तो सेना बुला लीजिए जिस तरह बाढ़ और भूकम्प के समय सेना बुलाई जाती है।लोकतंत्र को बाढ़ -भूकम्प जैसा ही खतरा मैं देख रहा हूं।
हां, स्पीकर महोदया, सदन में सदाचरण लाने के लिए आप
प्रधान मंत्री से सहमति हासिल कीजिए।यदि वे सहमत न हों तो आप इस्तीफा दे दीजिए और देश को यह बताइए कि ‘मैं सदन यानी लोकतंत्र की गरिमा गिराने में सहायक नहीं बन सकती।
मैं इसे चंडूखाना बनने नहीं दूंगी।यह कोई टी.वी.चैनल का डीबेट -शो नहीं है।’आपका नाम इतिहास में दर्ज हो जाएगा।
पर उसके लिए पहले अरूण जेटली और सुषमा स्वराज को सदन में खड़ा करा कर उनसे माफी मंगवानी पड़ेगी।इन दोनों ने उस समय अपने हंगामे को सही ठहराया था जब वे प्रतिपक्ष में थे।
एक बात और कह दूं।
चूंकि किसी एक राज्य के कुछ सांसदों ने संसद की गरिमा
को गिराने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है,वह बिहार ही है।उसका विवरण मैं बाद में लिखूंगा।पर, अभी प्रायश्चित के रूप में बिहार से ही कोई बेहतर सलाह जाए तो अच्छा माना जाएगा।इसीलिए मैंने यह सब लिखा।
यदि बिहार-उत्तर प्रदेश के लोगों से शिवसेना-मनसे को
कोई शिकायत हो तो बात समझ में आती है।
क्योंकि उनकी कोई अखिल भारतीय दृष्टि नहीं है।
पर किसी कांग्रेसी को तो शिकायत नहीं होनी चाहिए।
क्योंकि बिहार को पिछड़ा बनाए रखने में उनकी ही केंद्र सरकारों की ही तो मुख्य भूमिका रही है।
कल्पना कीजिए कि अंग्रेजों के जमाने में रेल भाड़ा समानीकरण नियम रहा होता तो क्या अविभाजित बिहार में टाटा नगर बस पाता ?
चूंकि खनिज पदार्थों को बिहार से समुद्र तट तक ढो कर ले जाना जमशेद जी नौसरवान जी टाटा के लिए आसान हो जाता।
क्योंकि तब समुद्र तट तक खनिज पहुंचाने में रेल भाड़ा उतना ही लगता जितना धनबाद से जमशेद पुर ले जाने में लगता।
पर अंग्रेजों ने यह सुविधा नहीं दी थी।
याद रहे कि निर्यात को ध्यान में रखते हुए अधिक उद्योग समुद्र किनारे वाले राज्यों में लगे।
आजादी के बाद केंद्र सरकार ने रेल भाड़ा समानीकरण नियम लागू करके बिहार का विकास मद्धिम कर दिया।बिहार के खनिज पर दूसरे राज्य फले- फूले।बिहार की क्षति की पूत्र्ति नहीं दी गयी।यहां तक कि खनिज राॅयल्टी का रेट भी कम रखा गया।
याद रहे कि उस समय पूरे देश में जितना खनिज पाया जाता था,उसका 48 प्रतिशत बिहार मेें पाया जाता था।
लंबे संघर्ष के बाद रेल भाड़ा समानीकरण नब्बे के दशक में ही समाप्त हो सका।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार तब तक अविभाजित बिहार को 10 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका था।
ऐसे में बिहार के लोग रोजी -रोटी के लिए राज्य के बाहर जाएंगे ही।
वैसे भी इस आने -जाने में कोई नियम बाधक है नहीं।
बिहार के लोगों का यदि देश के अन्य राज्यों के कांग्रेसी सरकारें स्वागत करंेगी तो वे रेल भाड़ा समानीकरण लागू करने की गलती का प्रायश्चित मात्र ही करेगी।
कमलनाथ जी ने यदि यह रेल भाड़ा समानीकरण का यह इतिहास न पढ़ा हो तो अब से भी पढ़ लें ।वैसे बिहार के प्रति के सौतेलेपन के अन्य उदाहरण भी हैं।
तेलांगना के मुख्य मंत्री के.चंद्रशेखर राव ने अपने पुत्र रामाराव को अपनी पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया है।
इस देश में मुख्यतः कम्युनिस्ट पार्टियांे और भाजपा को छोड़कर लगभग सभी दलों के सुप्रीमो अपने वंशजों व परिजनों को अपना उत्तराधिकारी बनाते जा रहे हैं।
अत्यंत थोड़े दल ही अपवाद रहे गए हैं।
इस बार के राज्य विधान सभा चुनाव में
भी अनेक नेताओं के वंशज टिकट पा गए।कई जीते भी।
कई भाजपा नेताओं के वंशज भी टिकट पाए,पर अभी ऐसी स्थिति नहीं बनी है कि भाजपा का कोई नेता भाजपा को अपने बाद या जीवनकाल में ही अपने पुत्र के हवाले कर दे।कम्युनिस्ट पाटियों में तो इसका सवाल ही नहीं उठता।
यानी देश की राजनीति में वंशवाद-परिवारवाद-जातिवाद की होड़ मची हुई है।
दस-बीस साल तक यदि यह जारी रहा तो हमारे देश में फिर नए ढंग के रजवाड़ों का तानाबाना तैयार हो जाएगा जिस तरह आजादी से पहले 565 रजवाड़े राज कर रहे थे।
यानी वह डायनेस्टिक डेमोक्रेसी होगी।
यदि अधिकतर छोटे -बड़े नेताओं के वंशजों को ही उनकी सीटों से चुनाव लड़ना है तो फिर राजनीतिक कार्यकत्र्ता गण किस उम्मीद में राजनीति में बने रहेंगे या आएंगे ?
राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं की प्रजाति जब लुप्त हो जाएगी तो सवाल यह भी है कि राजनीतिक कर्म करेगा कौन ?
लगता है कि उसका उपाय भी इस देश के अधिकतर नेताओं ने खोज लिया है।
एम.पी.-एम.एल.ए.फंड के ठेकेदार ही राजनीतिक कार्यत्र्ता बन गए हैं और बन रहे हंै।उनमें से अधिकतर बाहुबली होते हैं या रखते हैं।
यदि फंड की राशि कम पड़ रही होगी तो उसे बढ़ा दिया जाएगा,ऐसे भी संकेत हंै।
एक संसदीय समिति ने सांसद फंड की राशि 5 करोड़ रुपए से बढ़ाकर सालाना 25 करोड़ रुपए कर देने की सिफारिश कर रखी है।
पर मोदी सरकार ने अभी तक इसे नहीं माना है।पर कब तक टालेंगे ?
पर यदि अगली बार किसी मिलीजुली सरकार की सदारत करनी पड़ेगी तो अटल जी और मनमोहन जी की तरह फंड
उन्हें भी बढ़ाना ही पड़ेगा।
अगली सरकार चाहे जिस गठबंधन की बने, कुछ लोग उम्मीद कर रहे हैं कि वह मिली -जुली सरकार ही होगी।मिलीजुली सरकारों से फंड बढ़वाना आसान होता है।
कल्पना कीजिए कि पांच करोड़ बढ़कर कम से कम 10 करोड़ रुपए सालाना हो गया तो कार्यकत्र्ताओं की भला कहां कमी रहेगी ?
उस पैसों में से तो सुरक्षा के लिए गोली-बंदूक के लिए पैसे भी निकल आएंगे।दूसरे दलों के गुंडों से अपनी रक्षा के नाम पर !
याद रहे कि हर देश के फौजी मंत्रालय का नाम रक्षा मंत्रालय ही तो होता है।
एक नेता कहा भी करते हैं कि हम किसी बाघ के खिलाफ किसी बकरी को तो चुनाव में खड़ा नहीं कर सकते !
जब बाघ सड़कों पर निकलेगा तो उसके नख -दंत भी उसके साथ ही होंगे।
रिजर्व बैंक के कुछ गवर्नरों के संक्षिप्त कार्यकाल
’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’
गवर्नर तीन साल के लिए बहाल होते हैं।
----------
पर,
जो 1957 में बने ,वे 45 दिन रहे।
जो 1970 में बने, वे 42 दिन रहेे।
जो 1975 में बने ,वे 92 दिन रहे।
1975 में जो दूसरे बने वे 621 दिन रहे।
जो 1977 में बने वे 211 दिन रहे।
जो 1982 में बने ,वे 851 दिन रहे।
जो 1985 में बने,वे 20 दिन रहे।
जो 1990 में बने वे 730 दिन रहे।
--------------------------
मेरे जनरल नाॅलेज की वृद्धि के लिए आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ यह बता सकेंगे कि ये लोग अपना कार्यकाल पूरा
क्यों नहीं कर सके थे ?