गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

 मेरा मानना है कि गुजरात में कांग्रेस के बेहतर चुनावी 
रिजल्ट के पीछे मुख्यतः पाटीदार नेता हार्दिक पटेल हैं।
जो लोग कांग्रेस की लोकप्रियता बढ़ने का दावा कर रहे हैं,उन्हें हिमाचल प्रदेश का रिजल्ट देखना चाहिए।
कांग्रेस को इस बार 2007 की अपेक्षा वहां 2 सीटें कम ही आई हैं।
  अब इस बात पर गौर करें कि कांग्रेस ने किस कीमत पर हार्दिक का साथ लिया  ? पाटीदारों यानी पटेलों के लिए आरक्षण देने के वायदे की कीमत पर।क्या यह संभव भी है ?
थोड़ी देर के लिए मान लीजिए कि 2019 में केंद्र में कांग्रेस या उसके गठबंधन की सरकार बन जाए।तो क्या वह सरकार हार्दिक पटेल की मांग को लागू कर देगी  ? क्या वह पाटीदारों के लिए आरक्षण का प्रावधान कर सकती है ?
 अभी तो मौजूदा स्थिति में इस काम को मैं लगभग असंभव ही मानता हूं।
क्योंकि पाटीदारों को आरक्षण देेने की राह में कई बाधाएं हैं।
संविधान के अनुच्छेद -340 में यह प्रावधान है कि ‘जो आबादी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी है ,उनकी दशा सुधारने के लिए सरकार उपाय करेगी।’
मंडल आयोग उसी अनुच्छेद को ध्यान में रखते हुए बना था।
सामाजिक और शैक्षणिक रूप से कौन सी जातियां पिछड़ी हैं, इसके सर्वेक्षण के लिए एक और आयोग बन सकता है।
क्या पाटीदार शैक्षणिक रूप से गुर्जर, जाट और मराठा तथ कुछ अन्य से पिछड़ा है ? यदि नहीं तो सबके लिए आरक्षण करना पड़ेगा।
यह भी हो सकता है कि  बिहार -उत्तर प्रदेश की कोई सवर्ण जाति भी पाटीदार से शैक्षणिक रूप से पीछे हो।
उत्तर भारत की भी कोई एक सवर्ण जाति कह सकती है कि वह एक दूसरी सवर्ण जाति की अपेक्षा सामाजिक रूप से पिछड़ी है।
एक को आरक्षण देने पर देश भर की ऐसी ही दूसरी जातियां उद्वेलित हो जाएंगी।फिर सरकारें उनको कैसे संभालेंगी ?
 इस देश की अनेक मजबूत जातियों में तोड़फोड करने की क्षमता पाटीदारों से भी अधिक है।
 फिर क्या होगा ? किसे आरक्षण मिलेगा,किसे नहीं मिलेगा ?क्या सत्ताधारी दल को संविधान संशोधन लायक बहुमत मिल पाएगा ?
उधर 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है कि 50 प्रतिशत से अधिक सीटें आरक्षित हो ही नहीं सकतीं।उस समस्या से कपिल सिबल की पार्टी सत्ता में आने के बावजूद कैसे पार पाएगी ? क्या सुप्रीम कोर्ट उनके वश में है ? क्या इस या उस संबंध में किसी संविधान संशोधन को अदालत रद नहीं कर देगी ?
याद रहे कि कपिल सिबल ने ही गत माह हार्दिक पटेल को आरक्षण का भरोसा दिया ।इस पर भाजपा ने कहा था कि दोनों ने एक दूसरे को ठगा।
 दरअसल पाटीदारों और इस तरह  देश  की कुछ अन्य जातियों की मुख्य समस्या कृषि संकट है।कृषि संकट के कारण खेतिहर मजदूरों को भी उचित मजदूरी नहीं मिल पाती है।
उससे उबारने के लिए केंद्र सरकार को कड़े और बड़े कदम उठाने पड़ेंगे।उसी से समस्या के मूल पर प्रहार हो सकेगा।
 पिछले उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अमेरिकी सरकार अपने  किसानों को हर साल नकद 2000 करोड़ डालर सब्सिडी देती थी।शायद अब बढ़ भी गया होगा।जबकि वहां 2 प्रतिशत लोग ही खेती पर निर्भर हैं।
 ऐसी सब्सिडी या किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए दूसरे उपायों पर जो भी खर्च आए, भारत सरकार को वे पैसे जुटाने ही होंगे।
  यदि इस देश में ईमानदारी से टैक्स वसूली हो और सरकारी 
योजनाओं और कल्याण के पैसों की बंदरबांट बंद हो तो देश के किसानों को संतुष्ट किया जा सकेगा।पर इसके लिए किसी सरकार के पास सचमुच 56 इंच का
सीना होना जरूरी है।क्योंकि इस देश के टैक्स चोर, भ्रष्ट नेता व्यापारी और अफसर बहुत ताकतवर हो चुके हैं।
  यदि ऐसा कुछ जल्द नहीं हुआ तो आर्थिक संकट राजनीतिक संकट पैदा करता रहेगा।
कभी वह संकट चुनाव की दृष्टि से एक सत्ता पार्टी पर भारी पड़ेगा तो कभी दूसरी सत्ता पार्टी पर।
  हमारे देश में साधन कितने हैं, इसका अनुमान एक आंकड़े से लग सकता है।1985 में राजीव गांधी ने कहा था कि ‘हम दिल्ली से 100 पैसे भेजते हैं और उसमें से मात्र 15 पैसे जनता तक पहुंचते हैं।’
इस भारी लूट के बावजूद 1985 तक देश में कुछ विकास तो हुआ ही था।
यदि कोई सरकार इस अनुपात को उलट दे तो किसानों के
लिए भी समुचित पैसे नहीं निकल जाएंगे ? 



  

बुधवार, 20 दिसंबर 2017


 मेरा डा.शिव नारायण सिंह  से कभी व्यक्तिगत परिचय नहीं हो सका।
पर, एक सामान्य मरीज के रूप में मैं उनसे 1972 में मिला था।तब वे पटना के राजेंद्र नगर में बैठते थे।
मुझे देखते ही वे समझ गए कि मुझे कोई खास  बीमारी नहीं है।उन्होंने आई.डी.पी.एल.निर्मित  सस्ती गोलियां लिख दीं।
मैंने जिद की कि सर, जांच लिख दीजिए।उन्होंने कहा कि क्यों बेकार पैसे खर्च करोगे ?
तुम्हारे पास बहुत पैसे हैं क्या ?
मैंने कहा कि मैं अपनी शंका दूर करना चाहता हूंं।फिर भी नहीं मान रहे थे।बहुत जिद करने पर उन्होंने जांच लिख दी।
जांच रपट में कोई खराबी नहीं आई।मैंने रपट दिखाई तो उन्होंने कहा कि मैं कह रहा था न !
जाहिर है कि उन्होंने दवा बदलने की जरूरत नहीं समझी।
बाद में मुझे किसी जानकार व्यक्ति ने बताया कि  शिव नारायण बाबू कई  कारणों से आई.डी.पी.एल निर्मित दवाएं लिखते थे।दवाएं अत्यंत सस्ती होती थीं।वे गरीबों का खयाल रखते थे।उन्हें निजी दवा कंपनियों से तो कमीशन लेनी नहीं थी।साथ ही दस पैसे के टेबलेट में कोई क्यों मिलावट करेगा ? उससे वह कितना लाभ कमाएगा ? उससे अधिक रिस्क है। वे यह बात जानते थे।इसलिए डा.सिंह की लिखी दवाएं भी कारगर होती थीं।
 बाद के वर्षों में भी  वे दस रुपए फीस लेते थे जबकि उन दिनों उनके स्तर के डाक्टर 40 रुपए लेते थे।बेटी की शादी में जब कुछ ज्यादा खर्च करना पड़ा तो शिव नारायण बाबू ने अपनी फीस थोड़ी सी बढ़ा दी थी।यह मैंने सुना था।पता नहीं कितना सच है यह।
  उनके शिष्य  डा.अरूण तिवारी आज भी अपने गुरू शिव नारायण बाबू के पद चिन्हों पर चल रहे हैं।तिवारी जी पटना के महेंद्रू मुहल्ले में प्रैक्टिस करते हैं।उनसे भी मैं कभी नहीं मिला।पर सुनता हूं  कि मरीज उन्हें भी धरती का भगवान मानते हैं।आज भी शायद तिवारी जी की फीस मात्र 50 रुपए ही है।सुनते हैं कि मर्ज की पहचान की उनकी क्षमता अद्भुत है।

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

  कांग्रेस जब भी कहीं चुनाव जीत कर सत्ता में आती है तो 
उसका पूरा श्रेय तुरंत उसके सर्वोच्च नेता को दे दिया जाता है।
पर जहां कहीं भी हार जाती है, तो वहां के बारे में कह दिया जाता है कि वहां संगठन कमजोर था।इस बार भी पूर्व केंद्रीय मंत्री कमल नाथ ने कह दिया है कि कांग्रेस का संगठन कमजोर था। 
पर, इस संबंध में दो सवाल उठते हैं।
1.-1969 में कांग्रेस का महा विभाजन हुआ।
  कांग्रेस @आर@ और कांग्रेस @संगठन@बने।
यानी संगठन का अधिकांश, कांग्रेस@संगठन @के पास था।
फिर भी 1971 में लोक सभा चुनाव भारी बहुमत से इंदिरा गांधी जीत गयीं।कांग्रेस @संगठन@का संगठन धरा का धरा रह गया।क्योंकि इंदिरा जी के पास गरीब पक्षी नारे और उस दिशा में  उनके कुछ काम थे।उन दिनों सरकार में उतने बड़े घोटाले और महा घोटाले भी नहीं हो रहे थे जितने बड़े -बड़े महा घोटाले मन मोहन सिंह के कार्यकाल में हुए।
  2.- यदि गुजरात या कहीं और कांग्रेस का संगठन कमजोर था तो उसके लिए कौन जिम्मेदार रहा है ?
 संगठन की याद सिर्फ चुनाव हारने के बाद ही क्यों आती है ?
चार साल कांग्रेस का शीर्ष या राज्य नेतृत्व आखिर क्या करता है ? संगठन मजबूत क्यों नहीं करता  ?
इंदिरा गांधी ने अपने गरीबपक्षी नारों और कामों से जब पार्टी को चुनाव जीतने का उपकरण बना दिया तो संगठन भी बन गया।
  दरअसल जिस पार्टी के बारे में यह धारणा हो कि उसके  चुनाव
जीतने की कम ही गुंजाइश है, तो उस पार्टी के प्रति बहुत अधिक  संख्या में राजनीतिक कार्यकत्र्ता भी आकर्षित व उत्साहित भी नहीं होते।
आजादी के बाद के बड़े कांग्रेसी नेता अपने कार्यकत्र्ताओं के सुख- दुख का भी खयाल रखते थे।
अब क्या रखते हैं ? अब तो अधिकतर दलों के अनेक  छोटे- बड़े नेता अपने वंश व परिजन को टिकट दिलाने के ही फेर में रहते हैं।
फिर राजनीतिक कार्यकत्र्ता कहां से आएंगे और क्यों आएंगे।किस उम्मीद में आएंगे ?
 हां इन दिनों अधिकतर दलों के कार्यकत्र्ताओं की भूमिका सांसद -विधायक फंड के ठेकेदार निभा देते हैं।
 उनकी संख्या सीमित होती है।यह किसी एक दल की बात नहीं है।आम बीमारी बनती जा रही है।इस समस्या पर  कोई कभी सोचेगा ?
@ 19 दिसंबर 2017@


  गुजरात में कांग्रेस को इस बार विधान सभा की 80 सीटें मिलीं।
बिहार में 2015 के  बिहार विधान सभा चुनाव में राजद को 80 सीटें मिली थीं।
इन दोनों में एक और समानता है।
2015 की लालू प्रसाद की जीत , राजद-जदयू-कांग्रेस महा गठबंधन की जीत थी।
उसी तरह गुजरात में राहुल गांधी की जीत कांग्रेस-हार्दिक-अल्पेश -जिग्नेश गठबंधन की जीत लग रही है।
  2010 के बिहार विधान सभा चुनाव में राजद -लोजपा गठबंधन को कुल 243 में से सिर्फ 25 सीटें मिली  थीं।इससे उनकी अपनी खुद की वास्तविक चुनावी  ताकत का पता चला।
हिमाचल में इस बार कांग्रेस की  खुद की असली ताकत का पता चला।कांग्रेस को 2007 में वहां 23 सीटें मिली थीं।इस बार 21 मिली।
 अगले किसी चुनाव में लालू प्रसाद और राहुल गांधी अपने बल पर इन प्रदेशों में 80 सीटें ला पाते हैं या नहीं, यह देखना दिलचस्प होगा।लालू-राहुल को ऐसा प्रयास करना चाहिए ताकि वे अगली बार भी कम से कम इतनी  सीटें ला सकें। क्या वे यह काम कर पाएंगे ?



सोमवार, 18 दिसंबर 2017



 भाजपा विरोधी पार्टियां खास कर कांग्रेस यदि एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर प्रासंगिक व कारगर बनना चाहती  हैं तो उसे  कम से कम दो एजेंडा पर तो तुरंत काम शुरू कर देना पड़ेगा।
1.-वह  अपने आसपास  घोटालेबाजों और महा घोटालेबाजों को  अब फटकने न दे। चाहे वे नेता हों या कोई घोटालेबाज संगठन। ऐसे लोग अपने दल के हों या दूसरे दलों के।
जिस दल को आप पराजित करना चाहते हैं ,आपको खुद जनता की नजर में  उस दल की अपेक्षा कम भ्रष्ट दिखना पड़ेगा।
2.- अल्पसंख्यक तुष्टिकरण को लेकर ए.के.एंटोनी कमेटी की 
  रपट पर कांग्रेस को अब गंभीरतापूर्वक ध्यान देना होगा।
याद रहे कि 2014 के लोक सभा चुनाव में अपनी करारी हार के बाद कांग्रेस ने एंटोनी कमेटी गठित की थी।कांग्रेस की हार के कारणों की चर्चा करते हुए  उस कमेटी ने अन्य बातों के अलावा यह भी कहा था कि ‘अल्पसंख्यकों से कांग्रेस की निकटता से आम लोगों को कांग्रेस की धर्म निरपेक्षता की प्रामाणिकता को लेकर शंका हुई।’
  एंटोनी ने बड़े शालीन शब्दों में उपर्युक्त बात कही है।
इस मामले में बात अधिक गंभीर रही है जिसका फायदा भाजपा को मिलता रहा है।
  कांग्रेस एक बात और समझ ले ।नरेंद्र मोदी न तो मोरार जी 
देसाई हैं और न ही अटल बिहारी वाजपेयी।इसलिए मोदी को सत्ताच्युत करना आसान काम नहीं है।किसी कठिन काम के लिए कठिन तपस्या करनी पड़ती है।पुरानी राजनीतिक शैली से काम नहीं चलता।
जो गुजरात जैसा कठिन चुनाव जीत सकता है,वह 2019 का लोक सभा भी जीत सकता है।
फिर तो हाथ मलते रहने के सिवा प्रतिपक्ष के पास कुछ बचेगा नहीं।
@ 18 दिसंबर 2017@


रविवार, 17 दिसंबर 2017

बदजुबान नेताओं पर लगाम लगाने का कोई है उपाय ?


         
 सत्तर के दशक की बात है।एक चर्चित व दबंग समाजवादी नेता तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ कड़ी -कड़ी बातें अक्सर बोलते रहते थे।
एक बार किसी ने उनसे कहा कि इंदिरा जी औरत हैं,आपको उनके खिलाफ इतनी कड़ी बातें नहीं बोलनी चाहिए।
इस पर नेता जी शुरू हो गए, ‘क्या कहा ? इंदिरा जी औरत हैं ? अरे भई , पूतना भी तो औरत थी।सूपनखा भी तो औरत ही थी।’
और न जाने क्या -क्या कह दिया उस नेता जी ने !
बेचारा कहने वाला चुप रह गया।
  इंदिरा जी एकाधिकारवादी जरूर थीं, पर उनकी तुलना पूतना से करना ज्यादती थी।
  पर, इसके साथ ही लोगों ने देखा की किस तरह इस देश की राजनीति से गांधी युग की  शालीनता समय के साथ धीरे -धीरे समाप्त होने लगी ।
पर अब ? आज तो  राजनीति में कलयुग आ चुका है।
अब कौन सी मर्यादा और कौन सी सीमा ?
 कुछ साल पहले वरूण गांधी ने अपनी एक जन सभा में अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्यंत आपत्तिजनक बात कह दी थी।
फिर क्या था ! भला इस पर लालू प्रसाद कैसे चुप रहते !
उन्होंने कह दिया कि यदि वरूण बिहार में होता तो मैं उस पर 
बुल डोजर चलवा देता।
जब इस टिप्पणी पर  हंगामा हुआ तो कांग्रेस लालू के बचाव में आ गयी।कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि लालू जी के शब्दों पर ध्यान पर दीजिए,उनकी भावना पर ध्यान दीजिए।
  पर कांग्रेस कभी ऐसी छूट प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी तक को नहीं देती।
  उधर नरेंद्र मोदी भी कभी- कभी अपने पद की गरिमा से बाहर चले जाते हैं।
एक बार उन्होंने सुनंदा पुष्कर और शशि थरूर की चर्चा करते हुए कह दिया था कि ‘ वह क्या गर्ल फे्रंड हैं ? क्या 50 करोड़ का गर्ल फंे्रंड कभी देखा है ?’
  अदमनीय कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कभी कहा था कि ‘अरविंद केजरीवाल राखी सावंत की तरह हैं।’
सन  2014 में सहारन पुर लोक सभा चुनाव क्षेत्र से कांग्रेसी उम्मीदवार इमरान मसूद ने कह दिया कि उत्तर प्रदेश गुजरात नहीं है।यहां नरेंद्र मोदी को बोटी -बोटी काट देंगे।इसको लेकर उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था।पता नहीं ,उस केस में क्या हुआ।
दरअसल ऐसे बयानों को लेकर आम तौर पर  कोई सजा नहीं होती,इसलिए भी बदजुबानी बढ़ती जा रही है।
  गत लोक सभा चुनाव से ठीक पहले दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मुलाकात की थी।इस मुलाकात पर   शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा कि यह लोमड़ी और भेडि़ए के अहिंसा और शाकाहार पर बात करने जैसा है।
सन 2014 में राम पुर की एक चुनावी सभा में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मंत्री आजम खान ने नरेंद्र मोदी को कुत्ते के बच्चे का बड़ा भाई कह दिया था।
तब यू.पी. के गोंडा में कांग्रेस के लोक सभा उम्मीदवार बेनी प्रसाद वर्मा ने कहा था कि नरेंद्र मोदी आर.एस.एस.का सबसे बड़ा गुंडा है और राज नाथ सिंह उसका गुलाम है।
   कांग्रेस नेता विवादास्पद नेता मणि शंकर अययर तो कभी -कभी हद ही कर देते हैं।
अययर ने हाल ही में नरेंद्र मोदी के बारे में कह दिया कि ‘ये आदमी बहुत नीच किस्म का है।इसमें कोई सभ्यता नहीं है।’
 मणि शंकर अययर की इस टिप्पणी को गुजरात चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा ने खूब भंजाया।
अनेक लोग नरेंद्र मोदी पर  जनवरी, 2014 में की गयी  मणि शंकर अययर की  एक टिप्पणी के कारण पहले से ही अययर पर नाराज थे।तब प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार मोदी के बारे में अययर ने कह दिया था कि ‘मैं वादा करता हूं कि मोदी 21 वीं सदी में तो प्रधान मंत्री नहीं बन सकते।
हां, यदि वे चाहें तो उनके लिए मैं चाय के स्टाल की व्यवस्था  करा सकता हूं।’
उसके जवाब में गोवा के एक भाजपा नेता ने कहा कि यदि अययर चाहें तो हम उनके लिए गोवा में शराब के व्यापार का प्रबंध करा देंगे।  
 जब मणि शंकर अययर की पहली टिप्पणी हास्यास्पद साबित हो चुकी थी, फिर भी अययर ने नीच वाली टिपपणी हाल में कर दी।
 कांग्रेस ने उन्हें भले पार्टी से निलंबित कर दिया,पर उस टिप्पणी से  कांग्रेस को चुनावी नुकसान हो ही गया।
  लगता है कि अनेक दल में ऐसे बड़बोले, मुंहफट और तमीजरहित
नेता पाले -पोसे जाते हैं।कुछ ऐसे नेता भाजपा की  भी शोभा बढ़ाते हैं।भाजपा सांसद साक्षी महाराज उनमें प्रमुख हैं।
  इस साल के प्रारंभ में कुछ अन्य राज्यों के साथ -साथ उत्तर प्रदेश में भी विधान सभा के चुनाव हुए थे।
 चुनाव प्रचार के दौरान नेताओं ने जम कर शब्दों के तीर चलाए।
तत्कालीन मुख्य मंत्री अखिलेश यादव ने नरेंद्र मोदी की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि इतना बड़ा झूठ बोलने वाला प्रधान मंत्री मैंने नहीं देखा।
राहुल गांधी ने कहा कि प्रधान मंत्री झूठ की ही राजनीति करते हैं।
याद रहे कि झूठ शब्द असंसदीय है।विधायिकों में कोई सदस्य झूठ शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता।करेगा तो उसे सदन की कार्यवाही से बाहर कर दिया जाएगा।
 जहां मायावती चुनाव प्रचार कर रही हों ,वहां कहना ही क्या ?
उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान कहा कि मोदी घुसपैठिए हैं और मैं प्रदेश की बेटी हूं। 
 भाजपा नेता अमित शाह ने कहा कि उत्तर प्रदेश में दो भ्रष्टाचारी कुनबों का मिलन हुआ है।एक दल के नेता से उनकी मां और दूसरे दल के नेता से उनके पिता परेशान हैं।
 नब्बे के दशक की बात है।तब राबड़ी देवी बिहार की मुख्य मंत्री थीं।उन्होंने राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी के बारे में जन सभा में कह दिया था कि इस एक पैर के लंगड़ा का दूसरा पैर भी तुड़वा कर दिल्ली वापस भिजवा दूंगी।उन्होंने तो एक बार जार्ज फर्नांडिस को भठियारा तक कह दिया था।
कुछ सत्ताधारी  नेता कई बार मन की भंड़ास निकालने के लिए 
विधायिका के सदन का इस्तेमाल करते रहे हैं।
 चूंकि उसमें कही गयी बातों पर केस  नहीं हो सकता।
वे वहां अश्लील बातेंं भी बोल देते हैं।मीडिया के जरिए बातें प्रचारित हो जाती हैं और बाद में पीठासीन अधिकारी उन आपतितजनक बातों को सदन की कार्यवाही से निकाल भी देते हैं।
यानी नेता का काम भी हो गया और नियम  भी नहीं टूटा।
इसलिए अब यह सलाह दी जाती रही है कि सदन की कार्यवाही का सीधा प्रसारण नहीं होना चाहिए क्योंकि कुछ बेलगाम जन प्रतिनिधि इस सुविधा का दुरूपयोग करते हैं।
पर क्या बेलगाम नेता ऐसा होने देंगे ?
   @मेरा यह लेख ‘हस्तक्षेप’ - राष्ट्रीय सहारा -16 दिसंबर 2017- में प्रकाशित@

    


  अब जबकि लालू परिवार इन दिनों कुछ अधिक ही कानूनी परेशानियों में है और उन पर आरोप लग रहे हैंं,मुझे उनके दो ऐतिहासिक और अच्छे काम याद आतेे हैं।
 पहला काम अपने मुख्य मंत्रित्व काल में लालू प्रसाद ने किया और दूसरा काम राबड़ी देवी ने।
   लालू प्रसाद ने 1990 में मंडल आरक्षण का पूरी ताकत के साथ बचाव किया।
उससे पिछड़ों और कमजोर वर्ग के लोगों का सशक्तीकरण हुआ।
वैसे तो मैं आरक्षण के दायरे में आने वाले समुदाय से नहीं हूं, फिर भी मेरा हमेशा यह मानना रहा है कि पूरे देश के सम्यक विकास के लिए समाज का समावेशी विकास जरूरी है।
अपने मुख्य मंत्रित्व काल में राबड़ी देवी ने महिला सरकारी कर्मियों के लिए हर माह दो दिनों के लिए विशेष अवकाश का प्रावधान किया।
 उससे महिला कर्मियों को बहुत बड़ी राहत मिली।मुझे आश्चर्य है कि राबड़ी देवी से पहले यह बात किसी अन्य सत्ताधारी को सूझी क्यों नहीं थी ?
याद रहे कि हर माह कम से कम दो दिनों के लिए महिलाएं बहुत कष्ट में रहती हैं।