सन 1957 की नम्बूदरीपाद सरकार में मंत्री रहे
कृष्णा अय्यर के सुप्रीम कोर्ट जज बनने की कहानी
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बिशन टंडन
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आज (यानी 20 जून 1975 को)सुप्रीम कोर्ट में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के वकील ने कहा कि प्रधान मंत्री की अपील सोमवार को लेने के लिए समय निर्धारित कर दिया जाये।
उनकी विनती जज ने स्वीकार कर ली।
राज नारायण के वकील ने कोई आपत्ति नहीं की।
सुप्रीम कोर्ट की छुट्टियां हैं।
आजकल जस्टिस वी.आर.कृष्णा अय्यर छुट्टी के जज के रूप में काम कर रहे हैं।
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सुप्रीम कोर्ट में उनकी नियुक्ति सहज में नहीं हुई थी।
कृष्णा अय्यर किसी समय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे।
सत्रह-अठारह साल पहले केरल में नम्बूदरीपाद के मंत्रिमंडल के सदस्य थे।
इस मंत्रिमंडल को जनान्दोलन के आग्रह पर बर्खास्त कराने में प्रधान मंत्री का (तब इंदिरा गांधी कांग्रेस अध्यक्ष थीं।)बड़ा हाथ था।
1973 में जब सुप्रीम कोर्ट में कई स्थान खाली हुए तो गोखले व कुमारमंगलम के कहने पर नये मुख्य न्यायाधीश ए.एन.राय ने कृष्णा अय्यर का नाम भी भेजा।
नम्बूदरीपाद मंत्रिमंडल छोड़ने के बाद वे फिर वकालत करने लगे थे।
और, बाद में केरल हाईकोर्ट के जज हो गये थे।
वहां से विधि आयोग के सदस्य होकर दिल्ली आ गये थे।
प्रो.धर और मैंने (कृष्णा अय्यर को जज बनाने के )प्रस्ताव का विरोध किया था।
हमारा कहना था कि हाल ही में तीन जजों को सुपरसीड करने से हलचल मच गयी है।
इसके शीघ्र बाद एक जाने माने कम्युनिस्ट को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाना ,जबकि उनसे वरिष्ठ जज व मुख्य न्यायाधीश मौजूद हैं,ठीक नहीं लगेगा।
बड़ी कटु आलोचना हुई।कई दिनों तक प्रधान मंत्री ने कोई आदेश नहीं दिया।
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फिर मंत्रिपरिषद की राजनीतिक कार्यसमिति के सम्मुख मामले को रखा गया।
वहां गोखले व कुमार मंगलम ने इस प्रस्ताव की विशेष सिफारिश की और इसे स्वीकार कर लिया गया।
प्रधान मंत्री भी यही चाहती थीं।
पर वे अकले निर्णय नहीं करना चाहती थीं।
वैसे सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की नियुक्तियों पर प्रधान मंत्री स्वयं आदेश देती हैं,मंत्रिपरिषद या उसकी किसी समिति के समक्ष मामला नहीं जाता।
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प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के संयुक्त सचिव(1969-76)
रहे बिशन टंडन की चचर््िात डायरी से
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आपात काल: डायरी -भाग-एक
20 जून 1975
पेज-386
वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली
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