Sunday, February 1, 2009

नकली दवाओं का समंदर



युद्ध, आपसी झगड़े और आतंकी हमलों में कुल मिलाकर जितनी जानें जाती हैं, एक मोटे अनुमान के अनुसार उससे कहीं काफी अधिक जानें नकली और घटिया दवाओं के इस्तेमाल से जा रही हैं। नकली और घटिया दवाओं का मानव शरीर पर परोक्ष व प्रत्यक्ष असर पड़ता है। कुछ मामलों में असर देर से होता है और कुछ मामलों में जल्दी ही । अमेरिका और ब्रिटेन जैसे कुछ देश जरूर अपवाद हैं, पर नकली दवाओं की यह बीमारी, तो लगभग पूरे विश्व में फैल चुकी है। सर्वाधिक खराब हालत भारत की है। इस मामले में भी बिहार इस देश में सर्वाधिक पीडि़त राज्य है। अमेरिका और ब्रिटेन सहित कुछ थोड़े से देशों ने नकली दवाओं के खिलाफ जरूर कारगर कार्रवाई की है, पर अन्य अनेक देशों के तो भगवान ही मालिक हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सन् 2007 में ही कहा था कि भारत के प्रमुख नगरों में जो दवाएं बिक रही हैं, उनमें से हर पांच दवा में एक दवा नकली है। गत दो साल में हालात और भी खराब हो चुके हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन्हें रोकने की प्रशासनिक कोशिश समस्या के अनुपात में ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है। रही-सही कसर व्यापक सरकारी भ्रष्टाचार पूरी कर देता है। इस सिलसिले में कुछ आंकड़े यहां पेश हैं। देश की राजधानी यानी नेशनल कैपिटल रिजन में हर साल करीब तीन सौ करोड़ रुपये की नकली दवाओं की बिक्री हो रही है। पूरी दुनिया में 32 बिलियन डालर की नकली दवाएं हर साल बिकती हैं। पूरे भारत की बात करें, तो किसी प्रदेश में यदि सर्वाधिक नकली दवाओं का इस्तेमाल कहीं होता है, तो वह बिहार ही है। वैसे भी दुनिया में जितनी भी नकली दवाओं की आपूर्ति होती है, उनमें से 75 प्रतिशत नकली दवाओं की आपूर्ति भारत, चीन और पाकिस्तान से ही की जाती है। अब भला बिहार में कौन नहीं जानता कि नकली दवाएं किन स्थानों में बनती हैं। हां, सिर्फ प्रशासन को पता नहीं होता। धांधलीबाज पकड़े भी जाते हैं, पर रिश्वत ले देकर छोड़ दिए जाते हैं। या फिर गवाहों को खरीद लिया जाता है। एन।सी.आर. के गाजियाबाद और चांदनी चैक इलाकों से कई बार नकली दवाएं बरामद की जा चुकी हैं, पर उन काले धंधों पर कारगर रोक नहीं लगती। वैसे भी नकली दवाओं की जांच के लिए भारत में सिर्फ सात ही प्रयोगशालाएं हैं। नकली दवाओं के कारोबारियों के खिलाफ पहले से मौजूद सन् 1940 के कानून में संशोधन करके उसे और कड़ा बनाने की केंद्र सरकार गंभीर कोशिश कर रही है, पर तत्संबंधी कानूनों को लागू करने की दिशा में सरकारी मंशा, समस्या के अनुपात में काफी लचर है। क्योंकि सरकारी मशीनरी में भ्रष्टाचार और काहिली की जंग लगी हुई है। नकली दवाएं चूंकि देर-सवेर मरीजों के प्राण हर लेती हैं, इसलिए इसके लिए कसूरवारों को फांसी की सजा तो मिलनी ही चाहिए। ऐसा कानूनी प्रावधान होना चाहिए।नकली व घटिया दवाओं के निर्माता तो सामूहिक नरसंहार के दोषी होते हैं। नकली दवाओं के कारण मरनेवालों का सही आंकड़ा यदि मिल जाए, तो वह सचमुच चैंकाने वाला ही होगा। क्योंकि नकली दवाएं कई तरह से मरीजों को मौत तक पहुंचाती हैं। एक चिकित्सक के अनुसार लगातार नकली दवाएं लेते रहनेवाले मरीजों के शरीर पर कुछ दिनों के बाद असली दवाएं भी काम करना बंद कर देती हैं। यदि कोई पूछे कि बिहार सरकार को कौन सा काम सबसे पहले करना चाहिए, तो उसका सटीक जवाब यही होगा कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के तर्ज पर ही नकली दवाओं की समस्या से निपटने के लिए भी राज्य सरकार को कोई कार्यनीति जल्दी बनानी चाहिए। क्योेंकि यह एक बहुत बड़ी आपदा है, जो भीतर- ही -भीतर बिना किसी शोर के बड़ी संख्या में जानें ले रही है। सड़क, पुल, स्कूल तथा विकास कार्य भी जरूरी है, पर मनुष्य यदि जिंदा रहेगा तभी तो वह उसका उपभोग कर पाएगा। जिस तरह कोई भी संवेदनशील सरकार कोसी जैसी बाढ़ के पानी में जनता के डूबने से बचाने के लिए भरसक कोशिश करती है, उसी तरह नकली दवाओं के समंदर में लाखों लोगों के डूब जाने से बचाने के लिए भी उसे कोशिश करनी चाहिए।


राष्ट्रीय सहारा, पटना (29 जनवरी, 2009)

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