यदि अय्यर कमीशन द्वारा 1970 में दोषी करार दिए गए बिहार के कांग्रेसी नेताओं को सजा मिल गई होती तो शायद नेताओं की अगली पीढि़यों को सबक मिलता और बिहार को बर्बाद होने से बचा लिया गया होता।पर उन्हें सजा देने -दिलाने में गैर कांग्रेसी दलों और आम मतदाताओं ने भी बाद में कोई खास रूचि नहीं दिखाई।क्योंकि बाद के वर्षों में तो अनेक गैरकांग्रेसी नेतागण भी समय समय पर दागी होने से नहीं बचे। लंबे समय तक सरकार में रह कर भ्रष्टाचार,अनियमितता और भाई भतीजावाद करने के आरोपों की जांच के लिए 1967 में अय्यर आयोग बना था।जिन नेताओं के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए यह आयोग बना था,उनके नाम हैं कृष्ण बल्लभ सहाय,महेश प्रसाद सिंहा,सत्येंद्र नारायण सिंहा,राम लखन सिंह यादव,राघवेंद्र नारायण सिंह और अम्बिका शरण सिंह।ये नेतागण 1946 और 1966 के बीच बिहार मंत्रि परिषद के सदस्य रह चुके थे।के।बी।सहाय तो मुख्य मंत्री भी रह चुके थे। के।बी।सहाय 16 अप्रैल 1946 से 5 मई 1957 तक राजस्व मंत्री थे। फिर वे 29 जून 1962 से 2 अक्तूबर 1963 तक मंत्री रहे।वे 2 अक्तूबर 1963 से 5 मार्च 1967 तक मुख्य मंत्री रहे। महेश प्रसाद सिंहा 29 अप्रैल 1952 से 5 मई 1957 तक मंत्री रहे। वे 15 मार्च 1962 से 5 मार्च 1967 तक सिंचाई मंत्री रहे।सत्येंद्र नारायण सिंहा 18 फरवरी 1961 से 5 मार्च 1967 तक शिक्षा मंत्री रहे।राम लखन सिंह यादव 2 अक्तूबर 1963 से 5 मार्च 1967 तक लोक निर्माण मंत्री रहे।राघवेंद्र नारायण सिंह 2 अक्तूबर 1963 से 5 मार्च 1967 तक परिवहन राज्य मंत्री रहे। अम्बिका शरण सिंह 6 मई 1957 से 2 अक्तूबर 1963 तक उप मंत्री रहे। 2 अक्तूबर 1963 से 5 मार्च 1967 तक राज्य मंत्री रहे। आयोग ने इन सारे नेताओं को किसी न किसी मामले में दोषी करार दिया था।राज्य का भला होता और भविष्य में सत्ताधारियों और प्रतिपक्षी नेताओं को भी सीख मिलती,यदि इन नेताओं को सार्वजनिक जीवन से दूर ही कर दिया गया होता।पर ऐसा नहीं हो सका तो इसके लिए न सिर्फ प्रतिपक्ष,बल्कि मतदाताओं का एक वर्ग भी जिम्मेदार रहा जिसने इनमें से अधिकतर नेताओं को अय्यर कमीशन की रपट आ जाने के बाद भी कहीं न कहंीं से चुनाव जितवा दिया। 1967 में बिहार में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी तो उसके मुख्य मंत्री बने महा माया प्रसाद सिंहा।उप मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर थे और उस मंत्रिमंडल में एक साथ सी.पी.आई.और जनसंघ के मंत्री शामिल थे।इन नेताओं के दिलों में तब तक सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ काफी रोष था और वे चाहते थे कि उन नेताओं को सबक सिखाया जाए जिन्होंने आजादी के बाद बिहार में सत्ता में आने के बाद न सिर्फ खुद कई तरह के भ्रष्टाचार किए बल्कि उन्हें बढ़ावा भी दिया।बिहार सरकार के तत्कालीन मुख्य सचिव एस.वी.सोहोनी ने 1 अक्तूबर,1967 को एक अधिसूचना जारी की।अधियूचना में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज टी.एल.वेंकटराम अय्यर की अध्यक्षता में जांच आयोग का गठन किया जा रहा है जो कृष्ण बल्लभ सहाय,महेश प्रसाद सिंहा,सत्येंद्र नारायण सिंहा,राम लखन सिंह यादव,राघवेंद्र नारायण सिंह और अम्बिका शरण सिंह के खिलाफ आरोपों की जांच करेगा।आरोपों की फेहरिस्त लंबी थी। इस आयोग के गठन से संबंधित अधिसूचना को अभियुक्तों ने अदालत में चुनौती दी।पर अदालत ने आयोग के काम नहीं रोके।आयोग ने आरोपों की जांच की।करीब करीब सभी अभियुक्तों के खिलाफ आयोग ने कोई न कोई आरोप सही पाए। हालांकि कई आरोप गलत भी पाए गए।के.बी.सहाय के खिलाफ अपने ही पुत्र को अपनी ही कलम से खान का पट्टा गलत तरीके से देने का आरोप था।इस आरोप को आयोग ने भी सही माना।कई अन्य मामलों में आयोग ने सहाय को दोषी माना।उनके बैंक में 1946 में मात्र 600 रुपए थे जो 1966 में बढ़कर 6 लाख 32 हजार हो गए थे।इसके अलावा करीब 12 भूखंडों के कागजात भी मिले जो उन्होंने मंत्री बनने के बाद खरीदे थे। महेश प्रसाद सिंहा पर गंडक योजना के ठेकेदार रमैया के मैनेजर से 75 हजार रुपए घूस लेने का आरोप सही पाया गया।सत्येंद्र नारायण सिंहा पर जातिवाद का आरोप आयोग ने सही पाया।राम लखन सिंह यादव पर तो कई आरोप सही पाए गए। पर उन पर एक आरोप दिलचस्प किंतु शर्मनाक था।उनका पटना के किदवई पुरी मुहल्ले के उनके एक पड़ोसी व्यापारी से जमीन को लेकर विवाद था।व्यापारी का आरोप था कि श्री यादव उनकी जमीन पर कब्जा करना चाहते हैं।उनसे उसकी जान पर खतरा है।दीघा थाने के दारोगा ने उस व्यापारी की सुरक्षा के लिए उसके घर के आगे एक लाठीधारी सिपाही तैनात कर दी।उस समय लाठीधारी सिपाही की भी बड़ी धाक थी।इस पर श्री यादव आग बबूला हो गए।उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके न सिर्फ उस दारोगा का तबादला करवा दिया बल्कि उसका डिमोशन भी करवा दिया।यह मामला भी अय्यर आयोग के पास गया था। आयोग ने इसके लिए भी राम लखन सिेह यादव को दोषी पाया।राघवेंद्र नारायण सिंह और अम्बिका शरण सिंह भी आयोग से दागी होने से नहीं बच सके। आयोग की रपट 5 फरवरी,1970 को बिहार सरकार को सौंप दी गई।पर तब तक बिहार में राजनीतिक अस्थिरता का दौर शुरू हो चुका था जो 1972 तक चला।अस्थिरता का कारण था कांग्रेस और गैरकांग्रेसी दलों में सत्तालोलुपता और अवसरवादिता में अचानक भारी बढ़ोत्तरी। गैरकांग्रेसी दलों में भी भ्रष्टाचार के बीज पड़ चुके थे।इस तरह नेताओं के स्वार्थ के लिए दल बदल हुए और 1967 और 1972 के बीच कई मंत्रिमंडल बने और बिगड़े।ऐसे में न तो गैर कांग्रेसी दलों में वह नैतिक बल रहा कि वह अय्यर आयोग द्वारा दोषी पाए गए नेताओं को सजा दिलवाते ,उनके खिलाफ जन मानस को शिक्षित करते और न ही इन दागी कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ जनता में भी पहले जैसा गुस्सा रह गया था।क्योंकि जनता ने इन कांग्रेसियों को सत्ता से हटाकर जिन प्रतिपक्षी नेताओं को सत्ता में लाया था,वे भी कोई आदर्श स्थापित नहीं कर सके। हद तो तब हो गई जब 1970 में कर्पूरी ठाकुर के मुख्य मंत्रित्व में जो संविद सरकार बिहार में बनी उसने अम्बिका शरण सिंह को बिहार राज्य वित्तीय निगम का अध्यक्ष बना दिया।संविद की सरकार संसोपा,जनसंघ,संगठन कांग्रेस और स्वतंत्र पार्टी ने मिलकर बनाई थी।के.बी.सहाय,महेश प्रसाद सिंहा,सत्येंद्र नारायण सिंह और अम्बिका शरण सिंह तब तक संगठन कांगेस के नेता बन चुके थे।याद रहे कि अय्यर कमीशन बनाने में कर्पूरी ठाकुर और भोला प्रसाद सिंह जैसे समाजवादी नेताओं का बड़ा योगदान था।पर सत्ता का मोह जो न कराए।प्रतिपक्षी दलों के पतन की यह संभवतः शुरूआत थी।इसी के साथ बिहार के प्रमुख गैर कांग्रेसी दलों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने का नैतिक अधिकार भी खो दिया। बिहार में राजनीतिक कार्यपालिका के पतन की वह शुरूआत थी जिसका असर कार्यपालिका तथा दूसरे क्षेत्रों परं भी पड़ा। पर एक बात माननी पड़ेगी कि आज के नेताओं पर भ्रष्टाचार के जितने गंभीर आरोप लग रहे हैं,उसके अनुपात में अय्यर आयोग के सामने लगे आरोप कुछ भी नहीं थे।आखिर अय्यर आयोग के आरोपी स्तंत्रता सेनानी रह चुके थे और उनमें लोक लाज बची हुई थी। पर यह बात भी सच है कि उन पूर्वजों से थोड़ी और संयम की उम्मीद थी।याद रहे कि अय्यर आयोग के सभी आरोपियों का अब निधन हो चुका है।पर यह कहावत भी निर्विवाद रुप से सच है कि महाजनो जो न गता सो पंथा। अय्यर आयोग के कम से कम एक आरोपी के सचमुच जेल जाने की नौबत आ गई थी।पर जब उनका निधन हुआ तो यह अफवाह फैली कि जेल जाने से बचने के लिए ही उन्होंने जहर खा लिया था।स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान तो वे कई बार गर्व के साथ जेल गए थे।पर उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाना गंंंंवारा न था। तब के और आज के नेताओं में यह भी एक फर्क आया है।अब तो आज के नेता जब भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भी जाते हें तो उन्हें कोई शर्म नहीं आती।अब तो जेल कुछ नेताओं के लिए गुरूद्वारा बन चुकी है। अय्यर कमीशन के गठन के कारण भी महामाया प्रसाद सिंहा की सरकार एक साल के भीतर ही गिर गई।वह सरकार कुल मिलाकर पहले की सरकार की अपेक्षा अच्छा काम कर रही थी।उस सरकार के अधिकतर मंत्री जन सेवा की भावना से ओतप्रोत लगे।पर मिली जुली सरकार को समर्थन देने वाले दलों के कई विधायक मंत्री बनने के लिए उतावले थे।फिर बी.पी.मंडल बिहार मंत्रिमंडल में बने रहना चाहते थे।वे संसोपा के टिकट पर लोक सभा के लिए 1967 में चुने गए थे।पर उन्हें बिहार में कैबिनेट मंत्री बना दिया गया था।बाद में जब डा.राम मनोहर लोहिया ने उन पर ं मंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए दबाव डाला तो उन्होंने शोषित दल बना कर महामाया सरकार ही गिरवा दी।उन्हें मदद मिली अय्यर आयोग के आरेपियों से जो उन दिनों कांग्रेस में ही थे।1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद ये आरोपी संगठन कांग्रेस के नेता बने। यानी कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि अय्यर आयोग के गठन के जरिए बिहार की राजनीति की सफाई की पहली ठोस कोशिश की गई थी जो पक्ष विपक्ष के कई नेताओं ,लोगों और तत्वों की गलतियों ओर बेईमानियों के कारण विफल हो गई।इसका खामियाजा बिहार को आज तक भुगतना पड़ रहा है।अब बिहार में राजनीति और प्रशासन की सफाई करना काफी कठिन काम हो गया है।
प्रकाशित
शुक्रवार, 23 जनवरी 2009
बुधवार, 21 जनवरी 2009
गणतंत्र दिवस पर लोकतंत्र बचाने की चिंता

भारतीय गणतंत्र के 59 साल में हमने क्या खोया और क्या पाया ? इस सवाल से जूझते हुए किसी निष्पक्ष व्यक्ति के दिमाग में पहली नजर में मुख्यतः कम से कम दो बातें कौंधती हैंं। हमारे देश के 80 करोड़ लोगों की रोज की आय सिर्फ बीस रुपए है।दूसरी ओर, इस देश के 36 उद्योगपतियों की कुल संपत्ति 191 अरब अमेरिकी डालर है।यह राशि भारत की 20 प्रतिशत आबादी की कुल आमदनी के बराबर है।इन 36 में से तीन लोग तो दुनिया के सर्वाधिक बीस अमीरों में शामिल हंै।बीस में सिर्फ पांच ही अमेरिका के हैं।यानी भारत में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ रही है।असमानता से असंतोष पैदा हो रहा है।असंतोष जहां तहां विद्रोह को जन्म दे रहा है।विद्रोह कहीं हिंसक है तो कहीं अहिंसक। संविधान लागू होने के 58 साल बाद यह स्थिति है।जिस तरह औने पौने दाम पर जमीन व प्राकृतिक साधनों पर निजी कंपनियां कब्जा करती जा रही हैं,उससे यह संकेत है कि यह विषमता अभी और भी बढ़ेगी।विषमता बढ़ने के साथ साथ माओवादियों का प्रभाव क्षेत्र भी बढ़ता जा रहा है।लगता तो यह है कि इस देश के अधिकतर हुक्मरान स्वार्थ में अंधे होकर देश को दोनोें हाथों से लूट रहे हैं और अंततः देर सवेर माओवादियों के हाथों इस देश को सौंप कर विदेश पलायन कर जाना चाहते हैं।यह संयोग नहीं है कि इस देश के तीन प्रतिशत अमीर लोगों ने नाजायज तरीके से अब तक विदेशों में 30 से 40 बिलियन डालर जमा कर रखा है।इस देश के अनेक अमीर व प्रभावशाली लोगों को हर साल नौ लाख करोड़ रुपए की कर-चोरी की छूट मिली हुई है। यह सब भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्व को नजरअंदाज करके हो रहा है।या यूं कहिए कि होने दिया जा रहा है। जतन से बनाए गए अपने संविधान के भाग - चार में राज्य के लिए कुछ नीति निदेशक तत्व दिए हुए हैं।एक तत्व भारत में संपत्ति के कुछ ही हाथों में संके्रद्रण को रोकने का उपाय बताता है।संविधान के अनुच्छेद - 39 @ग@ में लिखा हुआ है कि ‘आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले कि जिससे धन और उत्पादन के साधनों का अहितकारी संकेंंद्रण नहीं हो।’यानी,धन इस तरह कुछ लोगों की मुट्ठी में न चला जाए जिससे सर्व साधारण का अहित हो।पर संविधान के इस प्रावधान का इस देश में खुलेआम उलंघन हो रहा है।ऐसा उलंघन शायद ही किसी अन्य देश में हो रहा हो।सर्वाधिक शर्मनाक बात यह है कि गरीबों के हित साधन को मुद्दा बनाकर सत्ता में आई सी.पी.एम. सरकार बंगाल में पूंजीपतियों को जमीन दिलाने के लिए गरीब किसानों का दमन कर रही है।वह भी छोटी कार बनाने के लिए।यदि आरामदायक बसें या बेहतर तकनीकी की साइकिलें या बेहतर लालटेन बनाने वाले उद्योगपतियों को सी.पी.एम.सरकार बढ़ावा देती तो बात समझ में आ सकती थी।पर, इन दिनों तो लगता है कि अधिकतर लोगों की मति ही मारी गई है। इस युग के अधिकतर नेताओं की मेहरबानी से यही सब 58 साल की उपलब्धियां हैं। जिस देश के 80 करोड़ लोगों की रोज की आय सिर्फ 20 रुपए मात्र हो,उस देश के सांसद पर हर माह करीब ढाई लाख रुपए खर्च हो,उसका कुछ ‘नतीजा’ ता देर सवेर निकलेगा ही। 58 साल की ‘उपलब्धि’ यह है कि आज देश की लोकतांत्रिक सिस्टम में एक भी राज नेता ऐसा नहीं है जो युवाओं के लिए आदर्श हो। संभवतः इसीलिए आज के युवा फिल्म व क्रिकेट में अपना आदर्श ढ़ंूढ़ने को मजबूर हैं। आज अधिकतर नेता देश के बारे में नहीं,बल्कि अपने पद,परिवार और पार्टी के बारे में ही चिंता करने में मगन हैं। देश कहां जा रहा है,इसकी चिंता मुख्य धारा की राजनीति करने वाले कितने लोगों में है ? थोड़े से लोगों की बढ़ती अमीरी को बेशर्मीपूर्वक पूरे देश की अमीरी का प्रतीक बताया जा रहा है।जबकि देश के सामान्य लोगों में व्यापक कुपोषण है।प्राथमिक शिक्षा उपेक्षित है।25 प्रतिशत लोग इस देश में अब भी निरक्षर हैं। इतने ही लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं।50 प्रतिशत महिलाएं निरक्षर हैं।कृषि पर काफी कम कम ध्यान दिया जा रहा है।बड़े शहरों को चमकाया जा रहा है। बच्चों और महिलाओं के कुपोषण को समाप्त करने के लिए भारत सरकार हर साल 4400 करोड़ रुपए आंगनबाडि़यों पर खर्च करती हैं।पर उनमें से अधिकांश राशि बीच में ही लूट ली जाती है।ऐसी लूट अन्य विकास व कल्याण योजनाओं में जारी है।गत दिसंबर तक के आकड़े के अनुसार भारत के हर व्यक्ति पर 6085 रुपए का विदेशी कर्ज है।यह संयोग नहीं है कि बिहार में लघु सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता के आवासों पर जब छापामारी होती है तो नकद 49 लाख रुपए पाए जाते हैं।इस तरह के कितने लोगों के यहां छापे पड़ेंगे तो इससे कम पेसे मिलेंगे ? हाल में किसी ने एक बैठकखाने की गपशप में कहा कि इस देश में किसी पार्टी या किसी नेता का शासन नहीं है बल्कि यहां तो ‘भ्रष्टाचार का शासन है।’ संभवतः उसने ठीक ही कहा। 58 साल के गणतंत्र और साढ़े साठ साल की आजादी के बाद हमें अक्सर यह सुनने को मिल जाता है कि रिश्वत के बल पर यहां कुछ भी कराया जा सकता है।जिसके पास पैसे हैं,वे हर तरह से निश्चिंत है।हो सकता है कि यह बात अक्षरशः सही नहीं हो,पर काफी हद तक सही है। गत आधी सदी में इस देश में एक और महत्वपूर्ण फर्क आया है।पहले भी थोड़ा-बहुत भ्रष्टाचार था।पर,भ्रष्ट लोग पहले शर्माते थे।वे ईमानदार लोगों से दबते थे।कुछ भ्रष्ट तत्व ईमानदार लोगों की इज्जत भी करते थे।पर अब आम तौर पर हर क्षेत्र में ईमानदार लोग ही दबते नजर आते हैं और हर क्षेत्र का भ्रष्ट तत्व सांड़ की तरह समाज में ऐंठ कर चलता है।सबसे बुरी बात है कि यह राजनीति में सबसे अधिक है।अब तो अनेक नेता खुलेआम यह कहते हैं कि भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं है।यह साढ़े साठ साल की आजादी व 58 साल के गणतंत्र का ‘विकास’ है।हालांकि सभी नेता भ्रष्ट ही नहीं हैं।पर ईमानदार नेता कमजोर पड़ते नजर आ रहे हैं।इतना कमजोर वे पहले कभी नहीं थे। मेरे सपनों का भारत नामक किताब में महात्मा गांधी ने लिखा था कि ‘मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूंगा जिसमें गरीब से गरीब लोग भी यह महसूस करेंगे कि वह उनका देश है-जिसके निर्माण में उनकी आवाज का महत्व है।मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूंगा जिसमें उंचे और नीचे वर्गों का भेद नहीं होगा और जिसमें विभिन्न संप्रदायों में पूरा मेलजोल होगा।ऐसे भारत में अस्पृश्यता या शराब और दूसरी नशीली चीजों के अभिशाप के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता।’ पर आज तो केंद्र सरकार के नागरिक उड्डयन मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति एक स्वर से यह सिफारिश करती है कि घरेलू उड़ानों में भी शराब परोसी जाए।सिगरेट व बीड़ी के पाकेटों पर उनसे होने वाले नुकसानों को दर्शाते हुए जब चित्र छापने के लिए उत्पादकों को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय निदेश देता है तो देश के अनेक मुख्य मंत्री व सांसद उसका विरोध करते हैं।यहां तक आ पहुंचे हैं हम।भ्रष्टाचार के आरोप में फंसी किसी बड़ी राजनीतिक,प्रशासनिक या अन्य क्षेत्रों की हस्तियों को ऐन केन प्रकारेण सजा से बचा लिया जाता है।यह है हमारे गणतंत्र का हाल।आज तो गणतंत्र दिवस पर इस बात पर चिंतन करने की जरूरत है कि बड़ी कुर्बानी से मिले इस देश के लोकतंत्र व आजादी को कैसे बचाया जाए ! यह बात समझ में आनी चाहिए कि सरकारी व गैर सरकारी भ्रष्टाचार ही इस देश की सबसे बड़ी व्याधि है।इसी व्याधि से अन्य अधिकतर समस्याएं पैदा हो रही हैं। चाहे वह गरीबी की समस्या हो या आतंकवाद की या फिर उग्रवाद की। अधिकतर नेताओं और अंततः लोकतंत्र के प्रति आम लोगों में विश्वास डिगना शुरू होने का सबसे बड़ा कारण भी भ्रष्टाचार ही है।
राष्ट्रीय सहारा, पटना (26-1-2008)
अल्पसंख्यकवाद बनाम अनिवार्य मतदान
यदि अगले लोक सभा चुनाव के बाद राजग को केंद्र में सत्ता मिल गई तो वह मतदान की अनिवार्यता के लिए कानून बना सकता है।भाजपा के नेताओं ने ऐसा संकेत दिया है। दुनिया के कई देशों में मतदान करना अनिवार्य है।जो नागरिक मतदान नहीं करते उनके लिए वहां सजा का प्रावधान है। कैसा रहेगा यदि एक दिन भारत में यह कानून बने कि जो मतदाता मतदान नहीं करेगा , उसे कुछ खास सरकारी सुविधाओं से वंचित कर दिया जाएगा ?और, यदि इस कानून को कड़ाई से लागू किया जाए तो कितने प्रतिशत मतदाता मतदान केंद्रों पर जाने को मजबूर हो जाएंगे ? फिर भी सब तो नहीं किंतु करीब अस्सी -नब्बे प्रतिशत मतदाता मतदान जरूर करने लगेंगे। आज तो औसतन 50 से 60 प्रतिशत मतदाता ही इस देश में मतदान करते हैं और मतों के भारी बंटवारे के कारण 20 -25 प्रतिशत या उससे से भी कम मत पाने वाले लोग भी कई बार चुनाव जीत जाते हैं।कई बार तो ऐसा भी होता है कि जिस उम्मीदवार की जमानत जब्त हो जाती है,वह भी चुन लिया जाता है। यदि अस्सी -नब्बे प्रतिशत मतदाता मतदान करने लगे तो जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंकों के सौदागर अत्यंत कम वोट पाकर भी चुनाव नहीं जीत पाएंगे।भारत में आम तौर पर किसी चुनाव क्षेत्र में किसी धार्मिक या जातीय समूह की आबादी 20-25 प्रतिशत से अधिक नहीं है।अपवादस्वरूप कुछ ही क्षेत्र ऐसे हैं जहां बात इसके विपरीत है। यदि कोई जातीय या धार्मिक समूह अधिकतर चुनाव क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं होंगे तो नेतागण भी सिर्फ सांप्रदायिक या जातीय आधारपर ही अपनी पूरी राजनीति और रणनीति तय नहीं करेंगे।इससे देश का भी भला होगा।आज तो जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक की खातिर अनेक नेता इस देश को तोड़ने पर भी अमादा हैं।
सड़क किनारे नाला भी
कई दशक पहले की बात है।बिहार के एक शहरी इलाके वाले विधान सभा क्षेत्र से एक ईमानदार नेता किसी तरह चुनाव जीत गया। उसने अपने क्षेत्र में सरकार से कह कर सीमेंटी सड़कें बनवा दीं। अगली बार वह बेचारा चुनाव हार गया। जीत हुई एक भ्रष्ट नेता की जिनका ‘पेट’ कुछ ज्यादा ही बड़ा था।उन्होंने उस सीमेंटी सड़क को तोड़वा कर फिर से अलकतरायुक्त सड़क बनवा दी। पूछने पर उन्होंने कहा कि पिछले विधायक मूर्ख थे।उन्होंने ठेकेदारों के पेट पर लात मार दी थी।इसीलिए वे हार भी गए।हर साल सड़क नहीं टूटेगी तो हमारा ठेकेदार तो बेरोजगार हो ही जाएगा, हमें चंदे के भी लाले पड़ जाएंगे ? अब इस बात को आज के संदर्भ में फिट कीजिए। नीतीश कुमार की सरकार पटना में सड़कों ंका बड़े पैमाने पर पुनरूद्धार करा रही है।साथ ही, सड़कों के किनारे नालियां भी बनवाई जा रही हैं। अब बरसात में सड़कों पर जल -जमाव के कारण अलकतरायुक्त सड़कें नहीं टूटंेगीं।कोसी के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में भी सड़कों का जो पुनरूद्धार होगा, उन सड़कों के किनारे भी नालियां बनाने का निर्णय बिहार सरकार ने किया है।देखना है कि टिकाउ सड़कों के कारण सत्ताधारी दलों को अगले चुनाव में कोई नुकसान होता है या नहीं ! वैसे भी बिहार में अब ‘बात’ थोड़ी बदली लगती है।
कम होती दुल्हनें
अभी पंजाब जैसी स्थिति तो नहीं है, पर शिशु कन्या भ्रूण हत्या का कुपरिणाम बिहार में भी अब धीरे -धीरे परिलक्षित होने लगा है। इन दिनों मध्यम वर्ग के कई अभिभावक यह रोना रोते हैं कि उनके कुंवारे पुत्र की शादी के लिए बहुत ही कम आॅफर आ रहे हंै।‘हमारे जमाने’ में तो काफी आते थे। पर सवाल है कि ऐसी स्थिति क्यों आ गई है कि योग्य वरों के लिए भी कन्याओं के अभिभावकों की पहले जैसी भीड़ अब नहीं लग रही है ? पहले तो ऐसा नहीं था।दरअसल इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हाल ही में गांवों से निकल कर शहरों में बसे अनेकानेक परिवारों के संपर्क सूत्र अब कम हो गए है।शहरों का जीवन वैसी सामाजिकता वाली नहीं रह गई है कि एक व्यक्ति दूसरे के यहां कन्या के पिता को भेजे।भेजने वालों की कमी है।उधर गांवों से पुश्तैनी संबंध लगभग टूट ही चुका है।कई नव शहरी परिवारों की स्थिति त्रिशंकु जैसी हो चुकी है। पर, दूसरा कारण भी कम दमदार नहीं है। मध्यम वर्ग के परिवारों में शिशु कन्या भ्रूण हत्याओं का चलन बढ़ा है।वर पक्षों के हाथों बधू पक्षों के अमानवीय व्यवहारों के कारण भी शिशु कन्या हत्याओं की घटनाएं बढ़ी हैं।सास-बहू संबंधों को बेहतर बनाए बिना इस समस्या का हल फिलहाल दिखाई नहीं पड़ रहा है। यदि ससुरालों में बधुओं की स्थिति नहीं सुधरी तो कुछ वर्षों के बाद तो वर पक्षों को शादी के प्रस्ताव का और भी अधिक इंतजार करना पड़ेगा।
आरोप-प्रत्यारोपों के बीच सच्चाई का कत्ल
जो समस्या आतंकवाद से निपटने को लेकर इस देश में आ रही है, कुछ वैसी ही समस्या ठाकरे बनाम उत्तर भारतीयों के बीच तनाव को समाप्त करने को लेकर आ रही है। जब कोई व्यक्ति ‘मुस्लिम आतंकवाद’ का सवाल उठाता है तो दूसरा ‘हिंदू आतंकवाद’ का मुद्दा खड़ा कर बराबरी कर देता है और आतंकवाद की समस्या ज्यों की त्यों बनी रह जाती है। आज जब देश के पिछड़े राज्यों के पिछड़ेपन से पीडि़त लोग रोजी रोटी के लिए महाराष्ट्र जाते हैं तो राज ठाकरे जैसे नेता मराठियों के लिए रेलवे में नौकरियों का सवाल खड़ा कर देते हैं। समस्य ज्यों की त्यों बनी रह जाती है। आजादी के बाद बने रेल भाड़ा समानीकरण नियम का लाभ महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने उठाया।उन राज्यों ने तरक्की कर ली । और अब, जब इस कारण बिहार जैसे राज्य पिछड़ गए और बिहारी मानुष नौकरी और रोजगार के लिए महाराष्ट जा रहे हैं तो उनके साथ हिंसा हो रही है।कल्पना कीजिए कि रेल भाड़ा समानीकरण नियम नहीं होता तो अविभाजित बिहार का कितना अधिक औद्योगिक विकास हो चुका होता !आजादी के बाद जब केंद्र सरकार के नए शासकों ने यह देखा कि अविभाजित बिहार में देश के कुल खनिज पदार्थों का करीब आधा पाया जाता है तो उसने रेल भाड़ा समानीकरण नियम बना दिया । केंद्र सरकार ने अन्य राज्यों में उद्योग लगाने के लिए सुविधा प्रदान कर दी।समानीकरण का मतलब यह था कि झरिया से जितने रेल भाड़ा में पटना कोयला जा सकता था,उतने ही भाड़ा में बंबई पहुंच सकता था। नतीजतन आजादी के बाद बिहार का विकास नहीं हुआ तो यहां के बेरोजगार लोग अन्य राज्यों में जाएंगे ही। हालांकि अब समानीकरण नियम नहीं है। एक और बात हुई। कुछ बड़ी कंपनियां ने अपने कारखाने तो झारखंड में लगाए, पर अपना मुख्यालय बंबई में रखा।फिर तो उस कंपनी से मिले सरकार को टैक्स का लाभ महाराष्ट्र को मिला।उस लाभ का कुछ हिस्सा झारखंड के बेरोजगार मांग रहे हैं तो यह ठाकरे को नागवार क्यों लग रहा है ?
सड़क किनारे नाला भी
कई दशक पहले की बात है।बिहार के एक शहरी इलाके वाले विधान सभा क्षेत्र से एक ईमानदार नेता किसी तरह चुनाव जीत गया। उसने अपने क्षेत्र में सरकार से कह कर सीमेंटी सड़कें बनवा दीं। अगली बार वह बेचारा चुनाव हार गया। जीत हुई एक भ्रष्ट नेता की जिनका ‘पेट’ कुछ ज्यादा ही बड़ा था।उन्होंने उस सीमेंटी सड़क को तोड़वा कर फिर से अलकतरायुक्त सड़क बनवा दी। पूछने पर उन्होंने कहा कि पिछले विधायक मूर्ख थे।उन्होंने ठेकेदारों के पेट पर लात मार दी थी।इसीलिए वे हार भी गए।हर साल सड़क नहीं टूटेगी तो हमारा ठेकेदार तो बेरोजगार हो ही जाएगा, हमें चंदे के भी लाले पड़ जाएंगे ? अब इस बात को आज के संदर्भ में फिट कीजिए। नीतीश कुमार की सरकार पटना में सड़कों ंका बड़े पैमाने पर पुनरूद्धार करा रही है।साथ ही, सड़कों के किनारे नालियां भी बनवाई जा रही हैं। अब बरसात में सड़कों पर जल -जमाव के कारण अलकतरायुक्त सड़कें नहीं टूटंेगीं।कोसी के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में भी सड़कों का जो पुनरूद्धार होगा, उन सड़कों के किनारे भी नालियां बनाने का निर्णय बिहार सरकार ने किया है।देखना है कि टिकाउ सड़कों के कारण सत्ताधारी दलों को अगले चुनाव में कोई नुकसान होता है या नहीं ! वैसे भी बिहार में अब ‘बात’ थोड़ी बदली लगती है।
कम होती दुल्हनें
अभी पंजाब जैसी स्थिति तो नहीं है, पर शिशु कन्या भ्रूण हत्या का कुपरिणाम बिहार में भी अब धीरे -धीरे परिलक्षित होने लगा है। इन दिनों मध्यम वर्ग के कई अभिभावक यह रोना रोते हैं कि उनके कुंवारे पुत्र की शादी के लिए बहुत ही कम आॅफर आ रहे हंै।‘हमारे जमाने’ में तो काफी आते थे। पर सवाल है कि ऐसी स्थिति क्यों आ गई है कि योग्य वरों के लिए भी कन्याओं के अभिभावकों की पहले जैसी भीड़ अब नहीं लग रही है ? पहले तो ऐसा नहीं था।दरअसल इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हाल ही में गांवों से निकल कर शहरों में बसे अनेकानेक परिवारों के संपर्क सूत्र अब कम हो गए है।शहरों का जीवन वैसी सामाजिकता वाली नहीं रह गई है कि एक व्यक्ति दूसरे के यहां कन्या के पिता को भेजे।भेजने वालों की कमी है।उधर गांवों से पुश्तैनी संबंध लगभग टूट ही चुका है।कई नव शहरी परिवारों की स्थिति त्रिशंकु जैसी हो चुकी है। पर, दूसरा कारण भी कम दमदार नहीं है। मध्यम वर्ग के परिवारों में शिशु कन्या भ्रूण हत्याओं का चलन बढ़ा है।वर पक्षों के हाथों बधू पक्षों के अमानवीय व्यवहारों के कारण भी शिशु कन्या हत्याओं की घटनाएं बढ़ी हैं।सास-बहू संबंधों को बेहतर बनाए बिना इस समस्या का हल फिलहाल दिखाई नहीं पड़ रहा है। यदि ससुरालों में बधुओं की स्थिति नहीं सुधरी तो कुछ वर्षों के बाद तो वर पक्षों को शादी के प्रस्ताव का और भी अधिक इंतजार करना पड़ेगा।
आरोप-प्रत्यारोपों के बीच सच्चाई का कत्ल
जो समस्या आतंकवाद से निपटने को लेकर इस देश में आ रही है, कुछ वैसी ही समस्या ठाकरे बनाम उत्तर भारतीयों के बीच तनाव को समाप्त करने को लेकर आ रही है। जब कोई व्यक्ति ‘मुस्लिम आतंकवाद’ का सवाल उठाता है तो दूसरा ‘हिंदू आतंकवाद’ का मुद्दा खड़ा कर बराबरी कर देता है और आतंकवाद की समस्या ज्यों की त्यों बनी रह जाती है। आज जब देश के पिछड़े राज्यों के पिछड़ेपन से पीडि़त लोग रोजी रोटी के लिए महाराष्ट्र जाते हैं तो राज ठाकरे जैसे नेता मराठियों के लिए रेलवे में नौकरियों का सवाल खड़ा कर देते हैं। समस्य ज्यों की त्यों बनी रह जाती है। आजादी के बाद बने रेल भाड़ा समानीकरण नियम का लाभ महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने उठाया।उन राज्यों ने तरक्की कर ली । और अब, जब इस कारण बिहार जैसे राज्य पिछड़ गए और बिहारी मानुष नौकरी और रोजगार के लिए महाराष्ट जा रहे हैं तो उनके साथ हिंसा हो रही है।कल्पना कीजिए कि रेल भाड़ा समानीकरण नियम नहीं होता तो अविभाजित बिहार का कितना अधिक औद्योगिक विकास हो चुका होता !आजादी के बाद जब केंद्र सरकार के नए शासकों ने यह देखा कि अविभाजित बिहार में देश के कुल खनिज पदार्थों का करीब आधा पाया जाता है तो उसने रेल भाड़ा समानीकरण नियम बना दिया । केंद्र सरकार ने अन्य राज्यों में उद्योग लगाने के लिए सुविधा प्रदान कर दी।समानीकरण का मतलब यह था कि झरिया से जितने रेल भाड़ा में पटना कोयला जा सकता था,उतने ही भाड़ा में बंबई पहुंच सकता था। नतीजतन आजादी के बाद बिहार का विकास नहीं हुआ तो यहां के बेरोजगार लोग अन्य राज्यों में जाएंगे ही। हालांकि अब समानीकरण नियम नहीं है। एक और बात हुई। कुछ बड़ी कंपनियां ने अपने कारखाने तो झारखंड में लगाए, पर अपना मुख्यालय बंबई में रखा।फिर तो उस कंपनी से मिले सरकार को टैक्स का लाभ महाराष्ट्र को मिला।उस लाभ का कुछ हिस्सा झारखंड के बेरोजगार मांग रहे हैं तो यह ठाकरे को नागवार क्यों लग रहा है ?
तापमान (नवंबर, 2008)
कोसी की धार में भारत-नेपाल की बंधी तकदीर

चाहे दोनों देशों की ‘राजनीति’ की अलग-अलग जो भी तात्कालिक मांग हो, पर कोसी की धार के धागे ने भारत और नेपाल की तकदीरों को आपस में मजबूती से बांध दिया है। संभवतः इसी को ध्यान में रखते हुए अन्य संधियों के साथ-साथ पचास के दशक में इस नदी के बारे में भी भारत और नेपाल के बीच संधि हुई थी और कोसी योजना की नींव रखी गई थी। तब 1950 में नेपाल में 104 साल पुरानी राणाशाही की समाप्ति हुई थी और महाराजा ने गद्दी संभाली थी। भारत से महाराजा का संबंध अच्छा था और दोनों देशों के बीच आपसी हित में कई तरह की संधियां हुईं।इसकी पृष्ठभूमि बताते हुए पूर्व सांसद डाॅ गौरीशंकर राजहंस लिखते हैं कि वर्षों से कोसी नदी नेपाल और उत्तर बिहार में प्रलय मचा रही थी। आजादी के ठीक बाद कोसी क्षेत्र के नेता ललित नारायण मिश्र ने गुलजारी लाल नंदा केे साथ तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू से मुलाकात की। ललित नारायण मिश्र ने पंडित नेहरू से कहा था कि कोसी को बांधने का यदि उपाय नहीं होगा, तो नेपाल और बिहार धीरे -धीरे पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे। वहां की उपजाऊ जमीन में केवल बालू ही रह जाएगा। उन दिनों नेपाल के महाराजा महेंद्र भारत के प्रति अत्यंत मित्रता का रूख रखते थे। पंडित नेहरू और महाराजा महेंद्र ने सम्मिलित रूप से कोसी योजना की नींव रखी। ’इस समझौते के तहत कोसी नदी पर भारत व नेपाल के हिस्सों में तटबंध बने और वीरपुर में बराज बना। याद रहे कि सन् 1954 में कोसी नदी में भीषण बाढ़ आई थी, जिससे नेपाल व भारत में भारी तबाही हुई थी। इस बार भी जब कोसी का तटबंध कुशहा के पास टूटा, तो नेपाल के भी एक बड़े क्षेत्र में तबाही और बर्बादी हुई है। यह बात और है कि नेपाल के कुछ लोग इस बर्बादी के लिए भारत सरकार से मुआवजा की मांग कर रहे हैं, जबकि बिहार सरकार कह रही है कि कुशहा के पास कोसी तटबंध की मरम्मत के काम में नेपाल सरकार ने सहयोग दिया होता, तो तटबंध नहीं टूटता। नेपाली मीडिया के एक हिस्से ने भी यह बात लिखी है कि नेपाल सरकार से सहयोग नहीं मिलने के कारण ही तटबंध टूटा। हालांकि बिहार सरकार कह रही है कि तब नेपाल में राजनीतिक माहौल ऐसा था कि सहयोग नहीं मिल सका। पर बाद में यह भी खबर आई कि जैसे ही नए प्रधान मंत्री प्रचंड को खबर मिली कि कोसी तटबंध पर खतरा है, तो उन्होंने तुरंत उसकी मरममत में सहयोग के लिए प्रशासन को लगा दिया। हालांकि तब तक देर हो चुकी थी और तटबंध को टूटने से नहीं बचाया जा सका। नेपाल में यह बात कहने वाले लोग भी हैं कि भारत-नेपाल कोसी समझौता एक भूल थी, पर सरजमीन की स्थिति यह बताती है कि कोसी नदी से होने वाले नुकसानों से यदि दोनों देशों को बचना है, तो दोनों को मिलजुल कर इसका उपाय खोजना और उसे कार्यरूप देना होगा। यदि पुराने समझौते में कोई कमी रह गई है, तो उसमें संशोधन तो किया ही जा सकता है। पर कोसी को एक बड़ी आबादी के लिए अभिशाप तो नहीं रहने दिया जा सकता है। यह बात भी पक्की है कि बांध विरोधियों के तर्कों को मान कर कोसी पर निर्मित बांधों को अब तोड़ा भी नहीं जा सकता। हां, इस अभिशाप को वरदान में बदलने का उपाय जरूर किया जा सकता है। कोसी नदी पर नेपाल क्षेत्र में ऊंचे डैम और बड़े जलाशय के निर्माण की जरूरत महसूस की जाती रही है। अधिकतर नेताओं व विशेषज्ञों ने इसके पक्ष में ही राय दी है। हां, कुछ विशेषज्ञ कुछ कारणवश ऊंचे डैम के विरोधी रहे हैं। हालांकि डैम और जलाशय के समर्थक इसे बिजली उत्पादन व सिंचाई जल की उपलब्धता के लिए जरूरी बताते हैं। नेपाल को भी जल मार्ग मिल जाएगा। वर्षों बाद नेपाल में एक मजबूत और निर्णयकारी सरकार के सत्ता में आने के बाद यह उम्मीद की जानी चाहिए कि पुराने नेपाल-भारत समझौते में यदि जरूरत हो, तो समुचित संशोधन करके कोसी की बाढ़ से साल-दर-साल हो रही बर्बादी-तबाही से मुक्ति दिलाने का काम अब हो जाएगा। भारत -नेपाल के बीच कुछ अन्य तरह के पुराने समझौतों पर भी नेपाल की नई सरकार एक नई नजर डालना चाहती है, पर बिहार और नेपाल के बाढ़पीडि़त लोग दोनों देशों की सरकारों से यह उम्मीद करेंगे कि सबसे पहले वे बाढ़ की समस्या का ही कोई हल निकालें। यह अच्छी खबर है कि प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह ने कहा है कि नेपाल के प्रधान मंत्री प्रचंड जब दिल्ली आएंगे, तो उनसे कोसी की समस्या पर बातचीत करेंगे। वे जल्दी ही आने वाले हैं। इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार रेल मंत्री लालू प्रसाद प्रचंड से मिलने के लिए नेपाल जाना चाहते थे, पर भारत सरकार को यह आशंका थी कि शायद नेपाल की धरती पर भी लालू प्रसाद कोसी की बाढ़ के लिए बिहार सरकार को दोषी ठहरा दें, फिर तो नेपाल सरकार को भी यह अवसर मिल जाएगा कि वह द्विपक्षीय बातचीत में यह मसला उठाए कि भारतीय पक्ष की कुव्यवस्था के कारण ही कुशहा में तटबंध टूटा। इसलिए भारत सरकार ने लालू प्रसाद की प्रस्तावित यात्रा को टाल दिया है। हालांकि लालू प्रसाद तथा भारत के कुछ दूसरे नेता लगातार मीडिया के माध्यम से यह आरोप लगाते रहे हैं कि कुशहा में तटबंध बिहार सरकार की कुव्यवस्था के कारण ही टूटा। इन बयानों को आधार बना कर नेपाल में भारत से 250 करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति की मांग भी शुरू हो चुकी है। जो भी हो, यह उम्मीद की जा रही है कि नेपाल के प्रधान मंत्री पुष्प कमल दहाल ‘प्रचंड’ की अगली भारत यात्रा में कोसी को लेकर जल्दी ही कोई रास्ता निकल आएगा और इस विपदा पर समय -समय पर होने वाली ‘राजनीति’ का अंत हो जाएगा।
पब्लिक एजेंडा (09-09-2008)
पूरा नहीं हुआ अम्बेडकर - लोहिया - एका का सपना
डा।राम मनोहर लोहिया ने लिखा था कि ‘ मेरी बराबर आकांक्षा थी कि वे (डा.बी.आर.अम्बेडकर) हमारे साथ आएं, केवल संगठन में ही नहीं, बल्कि पूरी तौर से सिद्धांत में भी, और वह मौका करीब मालूम होता था।’ डा.अम्बेडकर के निधन के बाद डा.लोहिया ने मधु लिमये को 1 जुलाई 1957 को हैदराबाद से लिखा कि ‘ तुम समझ सकते हो कि डा.अम्बेडकर की अचानक मौत का दुःख मेरे लिए थोड़ा व्यक्तिगत रहा है, और अब भी है। मेरे लिए अम्बेडकर हिंदुस्तान की राजनीति के महान आदमी थे और गांधी को छोड़कर , बड़े से बड़े सवर्ण हिंदुओं के बराबर। इससे मुझे बराबर संतोष और विश्वास मिला है कि हिंदू धर्म की जाति प्रथा एक न एक दिन खतम की जा सकती है। ’ लोहिया ने अम्बेेडकर के बारे में और क्या कहा, उसे जानने से पहले यह जान लेना ठीक रहेगा कि खुद अम्बेडकर ने लोहिया के बारे में क्या कहा था।यह बात लिखी है, बुद्धप्रिय मौर्य ने । मौर्य न सिर्फ केंद्रीय मंत्री थे बल्कि एक चर्चित दलित नेता भी थे।मौर्य ने लिखा कि ‘ सन् 1951 में अम्बेडकर ने पूछा कि तुम डा.राम मनोहर लोहिया को जानते हो ? मैंने डा.लोहिया का नाम तो सुना था लेकिन जानने का मतलब है नजदीक से जानना, इसलिए मैं चुप रहा। बाबा साहेब ने कहा कि तुम क्या खाक पालिटिक्स करोगे, जब तुम डा.लोहिया को नहीं जानते। हिंदुओं के एक ही तो नेता हैं जो ईमानदारी से जात-पांत तोड़कर जातिविहीन समाज की स्थापना करना चाहते हैं। बाबा साहेब कभी किसी की प्रशंसा नहीं करते थे। इस मामले में वे बड़े कंजूस थे।जब उन्होंने डा.लोहिया की प्रशंसा की तो मैंने सोचा कि उनसे मिलना चाहिए।’ अब अम्बेडकर के बारे में डा.लोहिया की कुछ बातें। डा.लोहिया ने लिखा है कि ‘ मैं बराबर कोशिश करता रहा हूं कि हिंदुस्तान के हरिजनों के सामने एक विचार रखूं। मेरे लिए यह बुनियादी बात है। हिंदुस्तान के आधुनिक हरिजनों के दो प्रकार हैं,एक डा.अम्बेडकर और दूसरे जग जीवन राम।डा.अम्बेडकर विद्वान थे,उनमें स्थिरता,साहस और स्वतंत्रता थी।वे बाहरी दुनिया को हिंदुस्तान की मजबूती के प्रतीक के रूप में दिखाए जा सकते थे।लेकिन उनमें कटुता थी और वे अलग रहना चाहते थे।गैर हरिजनों के नेता बनने से उन्होंने इनकार किया।पिछले पांच हजार बरस की तकलीफ और हरिजनों पर उसका असर मैं भली प्रकार समझ सकता हूं।लेकिन वास्तव में तो यही बात थी।मुझे आशा थी कि डा.अम्बेडकर जैसे महान भारतीय किसी दिन इससे उपर उठ सकेंगे।लेकिन इस बीच मौत आ गई।श्री जग जीवन राम उपरी तौर पर हर हिंदुस्तानी और हिंदू के लिए सद्भावना रखते हैं। हालांकि सवर्ण हिंदुओं से बातचीत में उनकी तारीफ और चापलूसी करते हैं।पर यह कहा जाता है कि केवल हरिजनों की सभाओं में घृणा की कटु ध्वनि फैलाते रहते हैं।इस बुनियाद पर न तो हरिजन और न हिंदुस्तान उठ सकता है।लेकिन डा.अम्बेडकर जैसे लोगों में भी सुधार की जरूरत है।’ ‘परिगणित जाति संघ को चलाने वालों को मैं अब नहीं जानता।लेकिन मैं चाहता हूं कि हिंदुस्तान की परिगणित जाति के लोग देश की पिछले चालीस साल की राजनीति के बारे में विवेक से सोचें।मैं चाहूंगा कि श्रद्वा और सीख के लिए वे डा.अम्बेडकर को प्रतीक मानें,डा.अम्बेडकर की कटुता को छोड़कर उनकी स्वतंत्रता को लें।एक ऐसे अम्बेडकर को देखें जो केवल हरिजनों के नहीं ,बल्कि पूरे हिंदुस्तान के नेता बनें।’ इससे पहले 24 सितंबर 1956 को डा.बी.आर.अम्बेडकर ने डा.लोहिया को लिखा कि ‘ आपके दो मित्र मुझसे मिलने आए थे।मैंने उनसे काफी देर तक बातचीत की।हालांकि हमलोगों में आपके चुनाव कार्यक्रम के बारे में कोई बात नहीं हुई। अखिल भारतीय परिगणित जाति संघ की कार्य समिति की बैठक 30 सितंबर 1956 को होगी और मैं समिति के सामने आपके मित्रों का प्रस्ताव रख दूंगा।कार्य समिति की बैठक के बाद मैं चाहूंगा कि आपकी पार्टी के प्रमुख लोगों से बातचीत हो ताकि हमलोग अंतिम रूप से तय कर सकें कि साथ होने के लिए हमलोग क्या कर सकते हैं। मुझे बहुत खुशी होगी अगर आप दिल्ली में मंगलवार 2 अक्तूबर 1956 को मेरे यहां आ सकें।अगर आप आ रहे हों तो कृपया तार से सूचित करें ताकि मैं कार्य समिति के कुछ लोगों को भी आपसे मिलने के लिए रोक लूंं। ’ इस पत्र के जवाब में 1 अक्तूबर 1956 को लोहिया ने अम्बेडकर को लिखा कि ‘आपके 24 सितंबर के कृपापत्र के लिए बहुत धन्यवाद। हैदराबाद लौटने पर मैंने आज आपका पत्र पढ़ा और इसलिए आपके सुझाए समय पर दिल्ली पहुंच सकने में बिलकुल असमर्थ हूं। फिर भी जल्दी से जल्दी आपसे मिलना चाहूंगा। मैं उत्तर प्रदेश में अक्तूबर के बीच में रहूंगा और आपसे दिल्ली में 19 या 20 अक्तूबर को मिल सकूंगा ।अगर आप 29 अक्तूबर को बम्बई में हों तो वहां आपसे मिल सकता हंू।कृपया मुझे तार से सूचित करंे कि इन दो तारीखों में कौन सी आपको ठीक रहेगी।’ ‘ अन्य मित्रों से आपकी सेहत के बारे में जानकर चिंता हुई। आशा है कि आप आवश्यक सावधानी बरत रहे होंगे। मैं अलग से मैनकाइंड के तीन अंक आपको भिजवा रहा हूं। विषय का सुझाव देने का मेरा विचार हो रहा था लेकिन मैं ऐसा नहीं करूंगा। ‘मैनकाइंड’ (पत्रिका) के तीन अंक आपको विषय चुनने में मदद करेंगे। मैं केवल इतना ही कहूंगा कि हमारे देश में बौद्धिकता निढाल हो चुकी है।मैं आशा करता हूं कि यह वक्ती है।इसलिए आप जैसे लोगों का बिना रोक के बोलना बहुत जरूरी है।’ इससे पहले डा.लोहिया ने 10 दिसंबर 1955 को डा.अम्बेडकर को लिखा था कि ‘मैनकाइंड’ पूरे मन से जाति-समस्या को अपनी संपूर्णता में खोल कर रखने का प्रयास करेगा।इसलिए यदि आप कोई अपना लेख भेज सकें तो प्रसन्नता होगी। लेख 2500 और 4000 शब्दों के बीच हो तो अच्छा।आप जिस विषय पर चाहिए, लिखिए।हमारे देश में प्रचलित जाति प्रथा के किसी पहलू पर अगर आप लिखना पसंंद करें तो मैं चाहूंगा कि आप कुछ ऐसा लिखें कि हिंदुस्तान की जनता न सिर्फ क्रोधित हो,बल्कि आश्चर्य भी करे।मैं नहीं जानता कि मध्य प्रदेश के लोक सभा के चुनाव भाषणों में आपके बारे में मैंने जो कहा, उसे आपके अनुयायी ने जो मेरे साथ रहा, आपको बतलाया या नहीं।अब भी मैं बहुत चाहता हूं कि क्रोध के साथ दया भी जोड़नी चाहिए और आप न सिर्फ अनुसूचित जातियों के नेता बनें,बल्कि पूरी हिंदुस्तानी जनता के भी नेता बनें।’ लोहिया ने लिखा कि ‘ हमारे क्षेत्रीय शिक्षण शिविर में यदि आप आ सके तो हमें बड़ी खुशी होगी।आप अपने भाषण का सार पहले भेज दें तो बाद में उसे प्रकाशित करना अच्छा होगा।हम चाहते हैं कि एक घंटे के भाषण के बाद उस पर एक घंटे तक चर्चा भी हो। मैं नहीं जानता कि समाजवादी दल के स्थापना सम्मेलन में आपको कोई दिलचस्पी होगी या नहीं।आप सम्मेलन में विशेष आमंत्रित होकर आ सकते हैं।अन्य विषयों के अलावा सम्मेलन में खेत मजदूरों, कारीगरों, औरतों और संसदीय काम से संबंधित समस्याओं पर भी विचार होगा और इनमें से किसी एक पर आपको कुछ महत्वपूर्ण बात कहनी ही है।किसी बात को बतलाने के लिए यदि आप सम्मेलन की कार्यवाही में हिस्सा लेना चाहें तो मैं समझता हूं कि सम्मेलन और विशेष रूप से अनुमति देगा।’ इस संबंध में कान पुर के विमल मेहरोत्रा और धर्मवीर गोस्वामी ने 27 सितंबर 1956 को डा.लोहिया को लिखा कि ‘ एक दोस्त के जरिए हमलोगों को दिल्ली जाकर डा.अम्बेडकर से मिलने का न्योता मिला।हमलोग दिल्ली जाकर उनसे मिले और 75 मिनट तक बातचीत हुई।यह साफ कर दिया गया था कि हमलोग बिलकुल व्यक्तिगत रूप में आए हैं।’ मेहरोत्रा और गोस्वामी डा.लोहिया के मित्र थे। इन लोगों ने लोहिया को लिखा कि ‘जब आप दिल्ली में हों तो डा.अम्बेडकर आपसे जरूर मिलना चाहेंगे।वे बूढ़े हैं और उनकी तबीयत ठीक नहीं है। वे सहारा लेकर चलते फिरते हैं।वे पार्टी का पूरा साहित्य चाहते हैं और मैनकाइंड के सभी अंक।वे इसका पैसा देंगे।वे हमारी राय से सहमत थे कि श्री नेहरू हर एक दल को तोड़ना चाहते हैं और कि विरोधी पक्ष को मजबूत होना चाहिए।वे मजबूत जड़ों वाले एक नए राजनीतिक दल के पक्ष में हैं।वे नहीं समझते कि माक्र्सवादी ढंग का साम्यवाद या समाजवाद हिंदुस्तान के लिए लाभदायक होगा।लेकिन जब हमलोगों ने अपना दृष्टिकोण रखा तो उनकी दिलचस्पी बढ़ी।’ ‘ हमलोगों ने उन्हें कान पुर के आम क्षेत्र से लोक सभा का चुनाव लड़ने का न्योता दिया।इस ख्याल को उन्होंने नापंसद नहीं किया,लेकिन कहा कि वे आपसे पूरे हिंदुस्तान के पैमाने पर बात करना चाहते हैं।हमलोगों ने यह साफ कर दिया कि हमलोग अपनी नीति के कारण कोई समझौता नहीं कर सकते।ऐसा लगा कि वे अनुसूचित जाति संघ से बहुत मोह नहीं रखते।कार्य कारिणी की बैठक दिल्ली में 30 को हो रही है।श्री नेहरू के बारे में जानकारी करने पर उन्हें बहुत दिलचस्पी थी। (सिनेमा आउटफिट आदि की मैनकाइंड वाली चर्चा) उन्होंने कहा कि इन बातों का यथेष्ट प्रचार होना चाहिए।वे दिल्ली से एक अंग्रेजी दैनिक भी निकालना चाहते हैं।’ ‘ वे हम लोगों के दृष्टिकोण को बहुत सहानुभूति,तबियत और उत्सुकता के साथ पूरे विस्तार में समझना चाहते थे। उन्होंने थोड़े विस्तार में इंगलैंड की प्रजातांत्रिक प्रणाली की चर्चा की जिससे उम्मीदवार चुने जाते हैं और लगता है कि जनतंत्र में उनका दृढ़ विश्वास है। यह सार है। हमलोग खुद नहीं आ सके क्योंकि यह पता नहीं था कि आप कहां हैं और हमारे पास पैसा नहीं था। 23 सितंबर 1956 को हैदरा बाद दफ्तर में टेलीफोन से बात करने की कोशिश की, कोई जवाब नहीं मिला,क्योंकि वहां पर किसी ने टेलीफोन नहीं उठाया। डा.अम्बेडकर का पता ः 26 अली पुर रोड, नई दिल्ली।’ इस पत्र के जवाब में लोहिया ने 1 अक्तूबर 1956 को विमल और धर्मवीर को हैदरा बाद से लिखा कि ‘ तुम्हारी चिट्ठी मिली। मैं चाहूंगा कि तुम लोग डा.अम्बेडकर से बातचीत जारी रखो लेकिन याद रखना कि जिस दिशा का तुम लोगों ने खुद अपनी चिट्ठी में उल्लेख किया है,उससे इधर- उधर नहीं होना।डा.अम्बेडकर की सबसे बड़ी दिक्कत रही है कि वे सिद्धांत में अटलांटिक गुट से नजदीक महसूस करते हैं। मैं नहीं समझता कि इस निकटता के पीछे सिद्धांत के अलावा और भी कोई बात है।लेकिन इसमें हम लोगों को बहुत सतर्क रहना चाहिए।मैं चाहता हूं कि डा.अम्बेडकर समान दूरी के खेमे की स्थिति में आ जाएं।तुम लोग अपने मित्र के जरिए सिद्धांत की थोड़ी बहुत बहस भी चलाओ।’ ‘ डा.अम्बेडकर की लिखी चिट्ठी की एक नकल भिजवा रहा हूं। अगर वे चाहते हैं कि मैं उनसे दिल्ली में मिलूं,तो तुम लोग भी वहां रह सकते हो।‘ विमल मेहरोत्ऱा ने 15 अक्तूबर 1956 को डा.अम्बेडकर को लिखा कि ‘ पिछले महीने मैं और मेरे मित्र श्री धर्मवीर गोस्वामी आपसे दिल्ली में मिले थे।उसके बाद अपनी बातचीत की खबर हमने डा.लोहिया को दी।मैंने बहुत ध्यान से परिगणित जाति संघ की कार्य समिति के फैसलों का अध्ययन किया है।उसमें से देश की जनता के लिए विशेष दिलचस्पी की तीन चीजें निकलती हैं।़........मुझ जैसे आदमी का आपको कोई सलाह देना धृष्टता होगी,लेकिन देश के लिए अच्छा होता कि देश के मौजूदा राजनीतिक दलों के नीति और कार्यक्रम को आप देख लेते और इनकी कथनी और करनी के बारे में अपनी राय देते।’ ‘ चुनाव समझौते के बारे में।हमलोग अपने को लगभग तीन हजार क्षेत्रों से अलग रखेंगे।पांच सौ या छह सौ क्षेत्रों से चुनाव लड़ेंगे।इसलिए चुनाव समझौते का रास्ता निकल आता है।सोशलिस्ट पार्टी ने अपनी नीति में तय किया है कि वहीं से चुनाव लड़ेंगे जहां कुल मतदाताओं के एक प्रतिशत पार्टी सदस्य हैं और एक तिहाई मतदान केंद्रों में फैले हों।’ ‘स्वेज के बारे में आपकी समिति का प्रस्ताव राष्ट्रीय स्वार्थ की दृष्टि से भले सोचा गया हो,लेकिन मुझे बहुत शक है कि दूर की दृष्टि से यह हिंदुस्तान के लोगों के सचमुच स्वार्थ में होगा।इसका मतलब यह होगा कि हिंदुस्तान में लगी विदेशी पूंजी का राष्ट्रीयकरण बिना उन देशोें की सहमति के नहीं किया जाएगा जिनके पूंजीपतियों का पैसा लगा हो।मैं अनुरोध करूंगा कि परिगणित जाति संघ के दफ्तर को कृपया इन प्रस्तावों को हमें भेजने के लिए कहें।मुझे पता चला है कि डा.लोहिया आपसे मिलने वाले हैं।लेकिन मैं समझता हूं कि निकट भविष्य में उनके लिए यह संभव नहीं होगा।अगर आप अपना कुछ कीमती समय दे सकें तो मैं आकर आपसे सारी बातें कर सकूं।’ पब्लिक एजेंडा (31-10-2008)
मात्र 12 हजार होते तो नहीं जाती लोहिया की जान

क्या 12 हजार रुपए का इंतजाम नहीं होने के कारण डा.राम मनोहर लोहिया को बचाया नहीं जा सका ? मशहूर स्वतंत्रता सेनानी व समाजवादी विचारक डा.राम मनोहर लोहिया का पौरूष ग्रंथि के आपरेशन के बाद अस्पताल की बदइंतजामी के कारण 12 अक्तूबर 1967 को दिल्ली के विलिंग्टन अस्पताल में उनका निधन हो गया। उस अस्पताल का नाम अब डा.राम मनोहर लोहिया अस्पताल है। डा.लोहिया के एक करीबी सहकर्मी व नेता ने कुछ साल पहले इन पंक्तियों के लेखक को बताया था कि डा.लोहिया आपरेशन के लिए विदेश जाना चाहते थे।पर उसके लिए उन्हें बारह हजार रुपए की जरूरत थी।उन्होंने बंबई के एक मजदूर नेता से जो लोहिया के दल के ही थे, डाक्टर साहब ने कहा था कि वह रुपए का इंतजाम कर दे।पर वह मजदूर नेता समय पर पैसे का बंदोबस्त नहीं कर सका।इस कारण जल्दीबाजी में दिल्ली के ही विलिग्टन अस्पताल में उन्हें भर्ती कराना पड़ा।डा.एल.आर.पाठक ने 30 सितंबर को उनका आपरेशन किया,पर डाक्टर व अस्पताल की लापारवाही के कारण डा.लोहिया की मौत हो गई। आपरेशन और बाद की देखभाल में लापारवाही को लेकर लंबे समय तक विवाद चलता रहा।पर इसमें यह बात तय थी कि विदेश के किसी अच्छे अस्पताल में यदि आपरेशन हुआ होता तो शायद ऐसी नौबत नहीं आई।आज जब मामूली -मामूली नेता व अफसर भी सरकारी खर्चे पर विदेश में अच्छी से अच्छी चिकित्सा करवा रहे हैं,वहीं लोक सभा के सदस्य डा.लोहिया बेहतर इलाज के बिना कम ही उम्र में चल बसे।जब उनका निधन हुआ,तब तक वे अपने साठ साल भी पूरा नहीं कर पाए थे।पर उतनी ही उम्र में उन्होंने भारतीय राजनीति व समाज में युगांतरकरी परिवत्र्तन के नेता बन चुके थे। जब उनका निधन हुआ तो वे ऐसी पार्टी यानी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के एकछत्र नेता थे जिसके दो दर्जन सदस्य लोक सभा में थे।उस समय एक दर्जन प्रदेशों में ऐसी गैर सरकारी सरकारें बन चुकी थीं जिनमें लोहिया के दल के मंत्री थे।बिहार में तो उस दल के कर्पूरी ठाकुर तो उप मुख्य मंत्री भी थे।डा.लोहिया के गैर कांग्रेस वाद के नारे के कारण ही कई राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनी थीं।पर डा.लोहिया आज के अधिकतर नेताओं की तरह नहीं थे जो सरकार के धन को अपना ही माल समझते हैं।डा.लोहिया ने अपने दल द्वारा शासित प्रदेशों के अपने दल के नेताओं से कह रखा था कि वे मेरे इलाज के लिए कोई चंदा वसूली का काम नहीं करें।इसमें सरकारी पद के दुरूपयोग का खतरा है। मेरे इलाज के लिए बंबई के मजदूर चंदा देंगे जो आम भारतीय मजदूरों व किसानों की अपेक्षा थोड़े बेहतर आर्थिक स्थिति में हैं।पर इस काम में उस मजदूर नेता ने लोहिया की मदद नहीं की।लोहिया चाहते थे तो इस देश का कोई भी पूंजीपति उन्हें अपने खर्चे से विदेश भेज कर उनका समुचित इलाज करवा सकता था।उन दिनों संसद में लोहिया की तूती बोलती थी।जब वे बोलने को खड़े होते थे तो सरकार सहम जाती थी।पर लोहिया अपने उसूलों के पक्के थे।वे कहते थे कि काले धन का उपयोग करने वाला नेता गरीबों का भला नहीं कर सकता।वे यह भी कहा करते थे कि यह मत देखो ंकि कोई नेता संसद में क्या बोलता है।बल्कि इसे देखो कि वह संसद में बोलने के बाद खुद शाम में कहां उठता बैठता है। यह इस देश की विडंबना ही रही कि उसी लोहिया का नाम लेकर बाद में इस देश व प्रदेश में राजनीति करने वाले अधिकतर नेता सत्ता में आने के बाद इतने भ्रष्ट हो गए कि उनको देखकर लगने लगा कि भ्रष्टाचार के मामले में तो कांग्रेसी बच्चे है। लोहिया के इलाज की चर्चा के क्रम में यह याद दिलाना जरूरी है कि नब्बे के दशक में बिहार का एक भ्रष्ट पशुपालन अफसर जब अपने इलाज के लिए आस्ट्रेलिया जा रहा था तो वह अपनी तिमारदारी में अपने खर्चे से 75 लोगों को अपने साथ ले गया। पब्लिक एजेंडा (22-09-2008)
विश्वनाथ प्रताप सिंह यानी एक सार्थक राजनीतिक जीवन

बोफर्स घोटाले के खिलाफ अभियान चला कर जिस राजा मांडा ने प्रधान मंत्री की कुर्सी पाई,उसी वी.पी. सिंह ने न जाने क्यों अपने जीवन के आखिरी दिनों में यह कह दिया कि उन्होंने तो बोफर्स घोटाले को लेकर राजीव गांधी पर कोई आरोप ही नहीं लगाया था। इससे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा। साथ ही, इस देश की राजनीति की साख को भी थोड़ा और बट्टा लगा। पर, यदि इस एक प्रकरण को नजरअंदाज कर दिया जाए तो वी.पी. सिंह के बारे में यह कहा जा सकता है कि वे इस गरीब देश के लिए सही नेता थे।राजा नहीं, फकीर थे वे।वे पिछड़ों के हमदर्द थे। उनमें व्यक्तिगत ईमानदारी व त्याग इतना अधिक था कि उनके नाम पर कसमें खाई जा सकती हैं। यह इस देश का दुर्भाग्य रहा कि वे कम ही दिनों तक प्रधान मंत्री रहेे। इस देश की मुख्य समस्या हर स्तर पर सरकारी भ्रष्टाचार ही है। बाकी अधिकतर समस्याएं तो भ्रष्टाचार के कारण ही पैदा होती रहती हैं। वी.पी.सिंह भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर थे। भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर व्यक्ति यदि आज भी प्रधान मंत्री की कुर्सी पर बैठ जाए तो देश का आधा सरकारी भ्रष्टाचार वैसे ही खत्म हो जाएगा।मन मोहन सिंह खुद तो ईमानदार हैं,पर भ्रष्टाचार के खिलाफ तनिक भी कठोर नहीं हैं। पहले बोफर्स घोटाले पर उनकी भूमिका की चर्चा कर ली जाए। अस्सी के दशक में राजीव गांधी मंत्रिमंडल से हटने के बाद वी.पी.सिंह जन मोर्चा बना कर देश भर में राजीव सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चला रहे थे। उसी सिलसिले में वे पटना आए थे।वे बेली रोड के हड़ताली मोड के पास एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे।जनसत्ता के संवाददाता के रूप में इन पंक्तियों का लेखक भी उस सभा में मौजूद था।वी.पी.सिंह ने पहली बार उसी सभा में विदेशी बैंक के उस खाते का नंबर बताया जिसमें बोफर्स दलाली के पैसे जमा किए गए थे।खाता लोटस के नाम से था और उसका नंबर कई अंकों का था।वी.पी.सिंह ने खाते का नंबर सभा में बताते हुए श्रोताओं से पूछा भी, ‘आप जानते हैं न कि लोटस का अर्थ क्या होता है ?’ भीड़ से एक आवाज आई ‘राजीव।’ वी.पी.सिंह ने इस अनुवाद का खंडन नहीं किया।उनके चेहरे पर यह भाव था कि श्रोता ने सही अनुवाद बता दिया।यह बात सही है कि वी.पी.सिंह ने खुद अपने मुंह से राजीव गांधी का नाम नहीं लिया।पर पटना की उस सभा में वे जनता को जो सूचना देना चाहते थे,वह क्या था ? इससे पहले जब राजीव गांधी सरकार से विद्रोह करके पहली बार पटना आए थे तो वे एक प्रेस कांफ्रेंस में शामिल हुए।उसमें इन पंक्तियों के लेखक ने ही यह सवाल किया था कि क्या आप प्रधान मंत्री से इस्तीफे की मांग करते हैं ? उन्होंने जवाब दिया, ‘कोई सिरियस सवाल कीजिए।’ यानी वी.पी.सिंह अपने पूरे अभियान में राजीव गांधी का नाम लेने से बचते रहे।पर वे अपनी बातों से भीड़ को यह विश्वास दिलाते रहे कि बोफर्स घोटाले मंे राजीव गांधी भी शामिल हैं।इसी विश्वास के कारण जनता ने सन् 1989 के लोक सभा चुनाव मेंं राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को सत्ता से हटा दिया।यदि आरोप राजीव गांधी के अलावा किसी और पर होता तो शायद कांग्रेस की चुनाव में उतनी बुरी हालत नहीं होती। पर, बोफर्स घोटाले के खिलाफ अभियान चला कर सत्ता हासिल करने वाले वी.पी.सिंह को बाद में यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी कि उन्होंने राजीव गांधी पर इस संबंध में आरोप नहीं लगाया था ? जबकि, बोफर्स मुकदमे के चार्ज शीट के कालम -दो में राजीव गांधी का नाम आ ही गया ।याद रहे कि अभियुक्त की मृत्यु हो जाने पर उसका नाम कालम - 2 में लिख दिया जाता है। पर किसी एक फिसलन को आधार बना कर किसी नेता के पूरे व्यक्तित्व का आकलन नहीं किया जा सकता। वी.पी.सिंह के राजनीतिक जीवन में जो दो महत्वपूर्ण मुकाम आए,वे देश के लिए भी काफी निर्णायक रहे।उन्होंने सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता को गोलबंद किया और जनता को यह विश्वास दिलाया कि सत्ता में आने के बाद वे भ्रष्टाचार पर काबू पाने की कोशिश करेंगे। वे इस पर खरा उतरे।प्रधान मंत्री के रूप में भी उन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा। सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ चुनाव लड़ने और जीतने का इस देश में वह आखिरी मौका था।उसके बाद तो चुनाव धर्म और जाति के नाम पर लड़े गए।या फिर विकास या अविकास पर।सामाजिक न्याय को राष्ट्रीय राजनीति का एक मुख्य मुद्दा बनाने का श्रेय भी वी.पी.सिंह को ही जाता है।उन्होंने सन् 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके देश की राजनीति का एजेंडा ही बदल दिया।यदि मंडल नहीं होता तो मंदिर आंदोलन भी नहीं होता।यह बात भी सही है।हालांकि मंडल आरक्षण लागू नहीं होता तो इस देश में नक्सलियों का विकास और भी तेजी से होता। इस आरोप में दम नहीं है कि जनता दल के भीतर अपने सहयोगी चैधरी देवी लाल के विद्रोह को दबाने के लिए ही वी.पी.सिंह ने मंडल कार्ड खेला।यह एक ऐसा कार्ड था जिसके खेलने में गद्दी पर खतरे ही खतरे थे। देवी लाल का खतरा तो टल भी सकता था,पर मंडल आरक्षण से उत्पन्न खतरे में तो गद्दी जानी तय थी।इतनी राजनीतिक समझ तो चतुर सुजान वी.पी.सिंह में रही ही होगी। उन्होंने बाद में कहा भी कि मैंने गोल कर दिया भले इस कारण मेरी टांग टूट गई।पर एक गद्दी से उतर कर वी.पी.सिंह कमजोर वर्ग के दिलों की गद्दी पर जरूर स्थायी रूप से बैठ गए। किसी राजनीतिक जीवन की इससे बड़ी सार्थकता और क्या हो सकती है ? बी.पी.मंडल के नेतृत्व में 1977 में गठित मंडल आयोग की रपट केंद्र सरकार को 1980 में ही मिल चुकी थी।पर उस रपट पर तीन -तीन बार संसद में चर्चा हुई थी। तत्कालीन कांग्रेसी गृह मंत्री आर.बेंकट रमण ने संसद में बहस का जवाब देते हुए साफ -साफ कह दिया था कि सरकार इसे लागू नहीं करेगी।यानी तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी इसे लागू नहीं कर सके।पर जनता दल ने तो अपने चुनाव घोषणा पत्र में भी इसे शामिल कर लिया है। वी.पी.सिंह के निधन के बाद प्रभाष जोशी ने ‘जनसत्ता’ में ठीक ही लिखा है कि ‘विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने होने की शत्र्त पूरी की।मंडल लागू करवाने के कारण जो समझते हैं कि उनने अपने होने से धोखा किया, वे क्षात्र धर्म को नहीं जानते।’ दरअसल वी.पी.सिंह को भारतीय समाज की संरचना और राजनीति में उसके महत्व की अच्छी जानकारी थी। वे जानते थे कि पिछड़ों को सत्ता और नौकरियों में जगह देना कितना जरूरी है। न तो वी.पी. पर जातिवाद का आरोप था और न ही गद्दी के लिए अनैतिक समझौते का दाग था। वे अस्सी के दशक में भी उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके थे जबकि ऐसा करने की उनकी कोई मजबूरी नहीं थी।इस पृष्ठभूमि वाले नेता को जनहित में कोई निर्णय लेने से पहले उसके परिणामों की परवाह नहीं हुआ करती। वी.पी.सिंह के जीवन पर एक अच्छी पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने लिखी है।पुस्तक का नाम है ‘विश्वनाथ प्रताप सिंह ः मंजिल से ज्यादा सफर।’यह नाम ही बहुत कुछ कह देता है।यह पुस्तक उनसे बातचीत पर आधारित है।इस बातचीत की खूबी यह है कि वी.पी.सिंह यह मान कर चल रहे हैं कि उन्हें अब आगे कोई पद नहीं लेना है।ऐसे में वे बेबाक बातें करते हैं।उस पुस्तक से वी.पी.सिंह के ही शब्दों में कुछ प्रकरण यहां प्रस्तुत है।‘सवाल ः कांग्रेस में क्या जाति आधारित गुटबाजी का चलन था ?जवाब ः पूरी तरह जातिवादी गुट नहीं बने हुए थे। एक हद तक ही उन्हें जातिवादी गुट कहा जा सकता है।कुछ नेता हर जाति में अपना प्रभाव रखते थे।हेमवतीनंदन बहुगुणा उन्हीें नेताओं में थे।कमलापति त्रिपाठी के इर्दगिर्द ब्राह्मण अधिक होते थे।लेकिन पं.कमलापति त्रिपाठी को जातिवादी नहीं कहा जा सकता।जाति की तरफ उनका झुकाव था लेकिन हेमवती नंदन बहुगुणा में वह भी नहीं था।सवाल ः जाति से परे जाकर देखें तो कांग्रेस में जो टकराव उस समय थे,उनकी जड़ें कहां कहां थीं ?जवाबःएक टकराव आर्थिक माना जा सकता है। उत्तर प्रदेश में आजादी की लड़ाई में ब्राह्मणों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। उनके पास जमीन जायदाद कम थी। वह राजपूतों के पास थी।ज्यादातर जमींदार वही थे।रियासतें भी उन्हीें के पास थी।उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण रियासतें सिर्फ दो ही रही हैं।जमींदारों की दिलचस्पी आजादी की लड़ाई में कम थी।उनको अपनी जमींदारी चले जाने का खतरा दिखता था।कांग्रेस में यह तबका बाद में आया।लेकिन साधारण राजपूत तो शुरू से ही कांग्रेस में थे।ऐसे ही आजादी की लड़ाई में दलितों की प्रमुख भूमिका थी।कांग्रेस में जो सामाजिक ध्रुवीकरण बना था उसमें ब्राह्मण और दलित एक साथ थे।दलित और किसान की हिमायत में ब्राह्मण खड़े होते थे।इस कारण कांग्रेस के नेतृत्व समूह में ब्राह्मणांे की प्रमुखता थी।उस समय जाति का बोलबाला वैसा नहीं था,वह बाद में आया। सवाल ः उत्तर प्रदेश कांग्रेस के जनाधार खिसकने के खास कारण आप क्या देखते हैं ?जवाब ः कांग्रेस का स्वाभाविक नेतृत्व ब्राह्मणों के हाथ में था।दूसरे वर्ग दलित और मुस्लिम भी थे।जब स्वाभाविक नेतृत्व स्थापित हो जाता है तो वह चलता रहता है।उनका नए समूहों से कई बार टकराव भी होता है।नेतृत्व यह समझ नहीं पाता कि नए समूहों को किस तरह जगह दें और उनको शामिल करें।यही कठिनाई कांग्रेस की भी थी।जो जनाधार कांग्रेस का था उसे वापस लाने में कामयाब नहीं हो सके।सवाल ः पहले फेयर फैक्स,फिर पनडुब्बी और उसके बाद बोफर्स तोप सौदे में दलाली का सवाल उठा।उसकी जांच की मांग कैसे उठी ?जवाब ः अखबारों में दस्तावेज आदि छपने लगे।उस समय जांच की मांग उठी।उसी समय छपा कि अजिताभ बच्चन का स्विट्जर लैंड में बंगला है।वे एक टूरिस्ट के रूप में गए थे।फिर बंगला कैसे खरीद लिया ?उस समय फेरा सख्ती से लागू होता था।सवाल ः क्या इसे आपने कहीं उठाया ?जवाब ः मैं उस समय कांग्रेस में था।संसदीय पार्टी की बैठकों में जाता था।वहां इसे उठाया।मैंने कहा कि प्रधान मंत्री जी आपने कहा है कि सच्चाई सामने लाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे।कृपया इस सच्चाई का पता करिए।इसकी जांच होनी चाहिए।अगर यह सही नहीं है तो उस अखबार के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।उन्होंने कहा कि जांच करवाएंगे।सवालःराजीव गांधी से सीधी भेंट उस समय आपकी कहां हुई ?जवाब ः उन्होंने दो बार बुलाया।उन्होंने मुझसे पूछा कि यह क्या हो रहा है ?उनके सवाल में यह छिपा हुआ था कि मैं विपक्ष से हाथ मिला रहा हूं।मैंने कहा कि यह बातचीत राजीव गांधी और विश्व नाथ प्रताप में हो रही है।इस भ्रम में मत रहिए कि हमारी बातचीत प्रधान मंत्री और मंत्री के बीच हो रही है।सीधी बात है कि अगर आप यह महसूस करते हैं कि मैं आपके साथ राजनीतिक खेल, खेल रहा हूं तो इस बातचीत का कोई फायदा नहीं है।ऐसे ही अगर मेरे मन में यह है कि आप मेरे साथ राजनीति कर रहे हैं तो इस बातचीत से हम कहीं नहीं पहुंचेंगे।हममंे यह विश्वास और भरोसा होना चाहिए कि राजनीति आड़े नहीं आएगी।अगली बात यह है कि के.के.तिवारी और कल्प नाथ राय मुझे सी.आई.ए. एजेंट कहते हैं। मैं जानता हूं कि ये लोग लाउड स्पीकर हैं। माइक इस कमरे में लगा है जहां हम हैं। यहां से जो बोला जाता है वही लाउड स्पीकर पर बाहर सुनाई पड़ता है।उनकी हिम्मत कहां है कि वे मुझे सी.आई.ए.एजेंट कहें।सवाल ः राजीव गांधी ने क्या सफाई दी ?जवाब ः उन्होंने कहा कि पार्टी आपसे बहुत नाराज है।वे लोग भी नाराज हैं।इसलिए बोल रहे हैं।मैं इनसे कहूंगाा कि कम बोलें।मैंने उनसे कहा कि वे दस गाली दे रहे थे,अब दो गाली देंगे।कोई भ्रम न रहे इसलिए साफ -साफ कहा कि जो लोग गाली दे रहे हैं वे मेरी देश भक्ति पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं।जब देशप्रेम का सवाल आता है और जब भी आता है तो लोग जान की बाजी लगा देते हैं। अपना सिर कटा देते हैं और मैं भी अपनी देश भक्ति के लिए अंतिम दम तक ऐंड़ी जमा कर लड़ूंगा। सवाल ः इस पर उन्होंने क्या कहा ?जवाब ः राजीव गांधी ने कहा कि मैं इन लोगों को समझाउंगा। मैंने उनसे कहा कि देखिए आपकी मां के साथ काम करते हुए कांग्रेस नामक मशीन को हमने चलाया है। इसका एक- एक नट- बोल्ट हम जानते हैं। मेरे जैसे सेकेंड रैंकर लोगों ने हेमवती नंदन बहुगुणा को भगा दिया क्योंकि वे यह चाहती थीं। वे नहीं बोलीं। हमलोगों ने ही यह काम किया।
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