Custom Search

Friday, 16 December 2011

आंदोलन के प्रति इंदिरा से अधिक लचीला है मनमोहन सरकार

सन् 1974-75 में इंदिरा गांधी की सरकार को जय प्रकाश आंदोलन से मुकाबला करना पड़ा था। आज अन्ना हजारे के नेतृत्व में जारी आंदोलन का मुकाबला मनमोहन सरकार कर रही है। दोनों आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ
रहे। पर, दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण फर्क सामने आया है। इंदिरा गांधी का जेपी के प्रति रुख अत्यंत कड़ा था। जबकि जेपी की मुख्य मांग यह थी कि बिहार विधान सभा को भंग कर दिया जाए। हालांकि उनकी अन्य कई मांगें भी थीं। पर इंदिरा जी बिहार विधानसभा को भंग करने को कतई तैयार नहीं थीं। जबकि उन्हीं दिनों वह संगठन कांग्रेस के नेता मोरारजी देसाई के अनशन के कारण गुजरात की विधानसभा का नया चुनाव कराने पर तैयार हो गई थीं। बाद में वहां बाबू भाई पटेल के नेतृत्व में संगठन कांग्रेस की सरकार भी बन गई थी।

पर जेपी की मांग पर इंदिराजी ने कहा कि चुनी हुई विधानसभा को किसी के कहने पर भंग नहीं किया जा सकता। इसी पर बात बिगड़ गई और और उसका नतीजा इंदिरा गांधी के लिए बुरा हुआ। उन्हें सन 1977 में भारी चुनावी हार का सामना करना पड़ा।


इसके विपरीत आज ना- ना कहते हुए भी मनमोहन सरकार अन्ना हजारे की मांगों के प्रति लचीलापन दिखा रही है। मनमोहन सरकार के लोग और कांग्रेस पार्टी तथा यू.पी.ए. के नेतागण बार- बार यह कहते रहे हैं कि वे अन्ना यानी संसद के बाहर के किसी व्यक्ति के दबाव में आकर कुछ नहीं कर रहे हैं। पर रोज -रोज अपना पक्ष बदलती केंद्र सरकार अन्ना आंदोलन से घबराई हुई जरूर लग रही है। यह घबराहट अन्ना टीम को मिल रहे जन समर्थन के कारण ही है।


लोकपाल विधेयक सन 1968 से लंबित है। इस बार यह विधेयक लाया भी जा रहा है तो अन्ना के दबाव के कारण ही। हाल में केंद्रीय कैबिनेट ने जिन चार विधेयकों के प्रारूप को अपनी स्वीकृति दी, वे भ्रष्टाचार से निपटने वाले विधेयक ही हैं। यह और बात हैं कि वे कितने कारगर हैं और अन्ना टीम को वे पसंद हैं या नहीं। पर अन्ना आंदोलन से पहले तो मनमोहन सरकार ऐसे कानूनों के प्रति तनिक भी उत्साही नहीं थी। निष्पक्ष राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार भी आंदोलन के दबाव में ही यह सब हो रहा है।

सन 1974-75 का जेपी आंदोलन आज के अन्ना के आंदोलन की अपेक्षा व्यापक और अधिक नैतिक धाक वाला आंदोलन था। जेपी को भी आंदोलन के बल पर सत्ता नहीं आना था। उस आंदोलन की नैतिक धाक इसलिए भी थी। तब के गैर कांगेसी दल जेपी के प्रति नतमस्तक भी थे। आजादी की लड़ाई के महान योद्धा होने का लाभ जेपी को मिला था।

जेपी की मांगें भी निर्दोष थीं। पर इंदिरा गांधी ने तब यह सोचा कि वह अपनी पुरानी लोकप्रियता व सत्ता की ताकत के बल पर जेपी आंदोलन को दबा देंगीं। याद रहे कि गरीबी हटाओ के नारे के कारण लोकप्रिय बनीं इंदिरा गांधी सन 1971 के लोकसभा चुनाव में बड़े बहुमत से सत्ता में आई थीं।


उन्हें इस बात का पता नहीं चल सका कि जेपी के आंदोलन का असर कितना व्यापक हो चुका है और उनकी लोकप्रियता कम हो रही है। इंदिरा जी का इतना शासकीय आतंक था कि खुफिया एजेंसियां भी उन तक सही खबरें पहुंचाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थीं। यहां तक कि 1977 के लोकसभा चुनाव की घोषणा के पहले और बाद में भी खुफिया एजेंसी ने इंदिरा जी को यही सूचना दी थी कि वह चुनाव जीत जाएंगीं।

कहा जाता है कि उन्हें इस बात की सही खबर होती कि आगे क्या होने वाला है तो वह न तो आपातकाल लगातीं और न ही जेपी की मांग को ठुकरातीं। बिहार विधानसभा भंग करने की जेपी की मांग वह उसी तरह मान लेतीं जिस तरह उन्होंने मोरारजी की मांग मान ली थी। तब संभवतः जेपी के आंदोलन का असर बिहार तक ही सिमट कर रह जाता। पर तब इंदिरा गांधी के हठीले रुख का उन्हें ही अधिक खामियाजा भुगतना पड़ा था। हालांकि उन लोगों को भी भुगतना पड़ा जिन लोगों ने आपातकाल की अभूतपूर्व विपदा जेल के बाहर व भीतर झेली।

आज यह बात सही है कि मनमोहन सरकार कमजोर है। साझे की सरकार है। सही दिशा देने वाला कोई केंद्रीय नेतृत्व उपलब्ध नहीं है। पर उसे लगता है कि प्रमुख गैर कांग्रेसी दलों के अन्ना टीम से मिल जाने के बाद केंद्र सरकार खतरे में आ गई है यदि अगले चुनाव को ध्यान में रखा जाए।

सिटीजन चार्टर विधेयक जैसे कानून की कैबिनेट द्वारा मंजूरी उसी आंदोलन के दबाव में उठाया गया कदम लगता है। इसे मनमोहन सरकार का लचीलापन ही कहा जा सकता है। यह और बात है कि केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित ऐसे भ्रष्टाचार विरोधी विधेयकों के प्रारूप से टीम अन्ना या फिर प्रतिपक्ष संतुष्ट होगा या नहीं। प्रतिपक्ष की संतुष्टि इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यू.पी.ए. के पास राज्यसभा में अपना बहुमत नहीं है।

संसदीय समिति द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के मसविदे पर टीम अन्ना की विपरीत टिप्पणी आ चुकी है। पर केंद्र सरकार उस प्रस्ताव में भरसक संशोधन करने का मन बना रही है तो यह उसका लचीलापन ही है। यह और बात है कि सरकार के लोकपाल विेधेयक में संशेाधन के बाद भी टीम अन्ना व प्रतिपक्ष उससे संतुष्ट होगा भी या नहीं ? यह बाद में पता चलेगा।

पर यहां तो सन 1974 की अपेक्षा आज की केंद्र सरकार व कांग्रेस के लचीलेपन की बात की जा रही है। यह लचीलापन भले मजबूरी में है, पर स्वागतयोग्य है। लोकतंत्र में तंत्र लोक का ध्यान रखते हुए ही कानून बनाए और फैसले करे तो उसे 1977 की तरह जनता के गुस्से का सामना नहीं करना पड़ेगा।

दूसरी ओर अन्ना टीम द्वारा प्रस्तावित जन लोकपाल विधेयक को हू ब हू मानने की जिद होती है तो उससे शायद कोई सर्वसम्मत विधेयक पास नहीं हो पाएगा।

यह एक अच्छी राय है कि अभी अन्ना टीम एक लचीली सरकार से जितना अधिक कठोर लोकपाल कानून पास करवा पाती है, वह करवा ले। और बाद में जरूरत पड़ने पर उसमें जरूरी संशोधन के लिए लड़े। क्योंकि प्रतिपक्ष भी अन्ना टीम के जन लोकपाल विधेयक के प्रारूप के सभी प्रावधानों से सहमत नहीं है। वैसे भी मौजूदा लोकसभा की बनावट भी कुछ ऐसी है कि उससे हू ब हू जन लोकपाल विधेयक पास करवाना शायद संभव नहीं होगा। पर जो भी यदि एक बेहतर लोकपाल विधेयक पास होगा, तो उसका श्रेय टीम अन्ना को ही तो मिलेगा।

Thursday, 22 September 2011

बिहार लोकायुक्त बिल

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने टीम अन्ना से कहा है कि वह बिहार लोकायुक्त विधेयक का मसविदा तैयार करे। अन्ना टीम की ओर से यह काम संतोष हेगड़े करेंगे। संतोष हेगड़े कर्नाटक के लोकायुक्त और सुप्रीम कोर्ट के जज रह चुके हैं।
यही बात नीतीश कुमार को अन्य अनेक नेताओं से अलग करती है। याद रहे कि कर्नाटक के लोकायुक्त के रूप में हेगड़े ने भाजपाई मुख्यमंत्री येदुरप्पा की कुर्सी ले ली। पर जिसे कोई घोटाला नहीं करना है, उसे कड़े से कड़ा लोकायुक्त या फिर लोकपाल से क्यों डरना ? सूत्रों के अनुसार मुख्य मंत्री नीतीश कुमार यह भी चाहते हैं कि बिहार का लोकायुक्त विधेयक उस जन लोकपाल विधेयक से भी अधिक कड़ा और कारगर हो जिसको पारित कराने के लिए टीम अन्ना इन दिनों आंदोलित है।
दूसरी ओर लालू प्रसाद और राम विलास पासवान जैसे कुछ नेतागण टीम अन्ना पर रोज -रोज बरस रहे हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार इस तरह लालू-पासवान द्वय खुद ही अपने राजनीतिक पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। पर लगता है कि किसी कारणवश बेचारे ये नेताद्वय ऐसा ही करने को लाचार हैं !
याद रहे कि सामान्य राजनीतिक ज्ञान वाला कोई व्यक्ति भी आसानी से यह देख सकता है कि आज देश में 1967, 1977 और 1989 से भी अधिक केंद्र की सत्ता और देश भर में फैले भ्रष्टाचार के विरोध में हवा है।
जदयू के एक नेता ने इन पंक्तियों के लेखक से हाल में कहा कि हमें तो आशंका थी कि कहीं राम विलास पासवान अन्ना की टीम में शामिल न हो जाएं। उससे हमें बिहार में थोड़ी कठिनाई होती। पर भगवान ने बिहारहित में पासवान की बुद्धि को अन्ना के विरोध में ही जाने दिया।


जनमत संग्रह शुरू
अन्ना आंदोलन की पृष्ठभूमि में जनमत संग्रह शुरू हो चुके हैं। उनके नतीजों पर नेताओं और विश्लेषणकर्त्ताओं की टिप्पणियां भी सामने आने लगी हैं।
एक एजेंसी ने दिल्ली और दूसरी एजेंसी ने हाल में देश के 28 नगरों में जनमत संग्रह किया। एक एजेंसी के अनुसार टीम अन्ना को दिल्ली में भारी जन समर्थन मिल रहा है। दूसरी एजेंसी के अनुसार भाजपा को 28 नगरों में बढ़त मिल रही है। कांग्रेस पीछे चली गई है। 32 प्रतिशत लोग भाजपा को और 20 प्रतिशत कांग्रेस को पसंद कर रहे हैं। यानी अन्ना के आंदोलन का लाभ राजग को मिल रहा है।
ऐसे सर्वेक्षणों पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं अब तक आती रही है, वैसी ही प्रतिक्रियाएं इस बार भी आने लगी हैं। जनमत संग्रह के नतीजे के अनुसार जो दल हारता होता है, उसके नेता हर बार यह कह देते हैं कि यह सर्वे फर्जी है। या फिर चुनाव आने तक स्थिति बदल जाएगी। जिसके पक्ष में जीत नजर आती है, वह कहता है कि हमारी स्थिति अभी और भी सुधरेगी।


कैसे-कैसे टिप्पणीकार !
इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और उनके नतीजों को लेकर टिप्पणियां करने वालों का पुराना रिकार्ड देखा जाना चाहिए। यदि उन में से किसी ने गत तीन चुनावों की लगातार गलत भविष्यवाणियां ही की हांे तो उनको एक बार फिर यह काम नहीं दिया जाना चाहिए।
ताजा जनमत संग्रह पर जिन नेताओं और विश्लेषणकर्त्ताओं के विचार इस बार आये हैं, उनके पिछले चुनावों के समय क्या विचार थे, यह बात जनता को एक बार फिर मालूम हो जाना चाहिए। यदि पिछली बार भी वे गलत ही साबित हुए थे तो जनता को उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। यदि बात उल्टी हो तो उन्हें जरूर गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
यदि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाले उनकी टिप्पणियों की पुरानी क्लिपिंग एक बार फिर दिखा सकें तो आम लोगों को उन टिप्पणीकारों व दलों के बारे में अपनी राय बनाने में काफी सुविधा होे जाएगी।


अगला राजनीतिक दृश्य
यदि इस बीच कोई अनहोनी नहीं हो गई तो लगता है कि लोकसभा का चुनाव 2014 में तय समय पर ही होगा। ताजा इतिहास बताता हैं कि कांग्रेस में येन-केण प्रकारेण गद्दी पर बने रहने की अद्भुत क्षमता है।
यह भी आशंका है कि इस बीच टीम अन्ना को पूरी तरह संतुष्ट करने लायक कोई लोकपाल विधेयक पास करने की स्थिति में कांग्रेस नहीं ही होगी। यानी अगले चुनाव तक अन्ना का आंदोलन चलता रहेगा। स्वामी राम देव भी आंदोलन में एक बार फिर मजबूती से कूदने ही वाले हैं। बाबा राम देव के साथ एक बड़ी संगठित जमात भी है। यानी देश गरमाता रहेगा। इसका लाभ एन.डी.ए. को अगले चुनाव में मिल सकता है।
पर दिक्कत यह है कि एन.डी.ए. में भी ऐसे-ऐसे नेताओं की कोई कमी नहीं है जो थोड़े-बहुत व मध्यम दर्जे के घोटाले के भीतर ही भीतर पक्षधर रहे हैं भले सार्वजनिक रूप से वे ऐसा नहीं कहें। वैसे लोगों की आदत ही ऐसी बन चुकी है। हालांकि राजग की कुल मिलकार कांग्रेस की अपेक्षा भ्रष्टाचार के मामले में अब भी बेहतर स्थिति है।
इसलिए यदि अन्ना को अपने त्याग-तपस्या-संघर्ष का लाभ एन.डी.ए.को ही अंततः पहुंचाना है तो अन्ना को राजग के सामने अभी से ही एक शर्त रखनी चाहिए। वह यह कि आप अपने बीच के भ्रष्ट और अपराधी तत्वों को टिकट कतई नहीं दोगे और परिवारवाद से दूर रहोगे, तभी हमारा समर्थन चुनाव में पाओगे। अगले साल होने वाले यू.पी. के चुनाव में राजग की इस मामले में परीक्षा ले ली जा सकती है। साथ ही अन्ना टीम राजग से यह भी कहे कि आप अपनी पिछली गलतियों के लिए देश से माफी भी मांगिए। यदि यू.पी. के विधान सभा चुनाव में फिर भी राजग कुछ अपराधी और भ्रष्ट उम्मीदवारों को टिकट देता है तो अन्ना टीम को वहां अपने समानांतर उम्मीदवार खड़ा कराने चाहिए अन्यथा जनता की उम्मीदें अन्ना टीम से भी टूटेगी। समानांतर उम्मीदवार के बाद तो राजग अन्ना के यश का लाभ नहीं उठा पाएगा। वैसे भी यदि कांग्रेस सरकार ने अन्ना टीम को सताना जारी रखा तो अन्ना के नेतृत्व में भी नेताओं की नई संघर्षशील व ईमानदार जमात देश भर में उभर जाएगी। जिस तरह जेपी आंदोलन मंे नया नेतृत्व उभरा था। उनमें कई लोगों को जेपी ने भी 1977 में जनता पार्टी का उम्मीदवार बनवाया था। हालांकि उनमें से अधिकतर जेपी की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरे।


काम नहीं आएंगे गंदे खेल
1996 में चारा घोटाले की जब जांच शुरू हुई थी तो बिहार की विधायिका ने सी.बी.आई. के अफसर यू.एन. विश्वास को विशेषाधिकार हनन का नाटिस दे दिया था। विश्वास को माफी मांगने पर मजबूर कर दिया गया था। इतना ही नहीं, विधान परिषद में सी. ए.जी. और पटना हाईकोर्ट पर विशेष चर्चा करवा कर उनको क्या -क्या नहीं कहा गया। यानी इन संस्थाओं की अभूतपूर्व आलोचनाएं की गईं।
जांच कर्ताओं, कुछ नेताओं और पत्रकारों को तथा कुछ अन्य लोगों को भी घोटालेबाजों की ओर से धमकियां दी गई। और न क्या -क्या नहीं किया गया ? पर क्या इन तरीकों के जरिए आरोपितगण जेल जाने और मुकदमे का सामना करने से बच पाये ? अन्ना टीम को प्रताड़ित करने से पहले केंद्र सरकार को चाहिए था कि वह बिहार की उन घटनाओं से सबक ले लेती।


और अंत में
बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डा. श्रीकृष्ण सिंह कहा करते थे कि एक ग्रामीण चौकीदार का व्यवहार लोगों के साथ कैसा होता है, उसी को देख कर सरकार की छवि का पता चल जाता है।

Thursday, 15 September 2011

दागी अफसरों को सजा दिलाने में केंद्र की दिलचस्पी नहीं

बिहार सरकार ने भ्रष्टाचार के मुकदमे का सामना कर रहे आई.ए.एस. अफसर एस.एस. वर्मा के आलिशान मकान को तो जब्त कर लिया, पर उस अफसर के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति केंद्र सरकार नहीं दे रही है। नतीजतन अभियोजन पक्ष शिव शंकर वर्मा के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र नहीं दाखिल कर पा रहा है। वर्मा के अलावा भी बिहार के दो अन्य आई.ए.एस. अफसरों के खिलाफ भी मुकदमा चलाने की अनुमति केंद्र से बिहार को नहीं मिल पा रही है जबकि इसके लिए बिहार सरकार ने कई बार केंद्र को पत्र लिखे हैं। एक अन्य खबर के अनुसार केंद्रीय सेवाओं की प्रथम श्रेणी के अफसरों से संबंधित ऐसे करीब तीन सौ मामले प्रधानमंत्री सचिवालय में लंबे समय से लंबित है। ऐसा अन्ना आंदोलन के दौर में भी हो रहा है।

1981 बैच के आई.ए.एस. अफसर शिव शंकर वर्मा बिहार सरकार में लघु सिंचाई सचिव थे। उन पर अवैध संपत्ति बनाने का आरोप है। बिहार सरकार की विशेष निगरानी इकाई ने 6 जुलाई, 2007 को वर्मा के आवास पर छापा मार कर करीब एक करोड़ पचास लाख रुपये की अवैध संपत्ति के सबूत इकट्ठे किये थे। बिहार विशेष अदालत कानून, 2010 के तहत वर्मा के खिलाफ विशेष अदालत में मुकदमा चल रहा है। विशेष अदालत ने 17 मार्च 2011 को वर्मा की संपत्ति जब्त करने का आदेश दिया। वर्मा ने अदालत से गुजारिश की थी कि पटना स्थित उस मकान को उन्हें ही किराए पर दे दिया जाए जिसे अदालत ने नामंजूर कर दिया। जब्त मकान की बाजार कीमत करीब पांच करोड़ रुपये बताई जा रही है।
एक अफसर इतने आलीशन मकान को भी किराए पर लेने को तैयार है। यह भी आश्चर्य की बात है। इससे उसकी अमीरी का पता चलता है। याद रहे कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि ऐसे जब्त मकानों में बच्चों के सरकारी स्कूल खाले जाएंगे।

पर ऐसे अफसरों को भी सजा दिलाने में केंद्र सरकार की अरूचि आश्चर्यजनक है। इतना ही नहीं, बिहार सरकार ने जब 2009 में बिहार विशेष अदालत अधिनियम, 2009 विधायिका से पास करवाकर केंद्र को भेजा तो उस पर भी राष्ट्रपति की मुहर दिलवाने में केंद्र सरकार ने एक साल लगा दिये। याद रहे कि उस कानून में मुकदमे की सुनवाई के दौरान भी आरोपित की अवैध संपत्ति को जब्त करने का आदश देने का कोर्ट को अधिकार मिल गया है। यह देश में अपने ढंग का नया व कारगर कानून है। हाल में केंद्र सरकार ने यह जरूर कहा है कि इस मामले में वह भी बिहार जैसा कानून बनवाना चाहती है। पर वर्मा पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं देने के काम से लगता है कि केंद्र सरकार का वायदा खोखला है।

इस बीच बिहार सरकार ने प्रथम श्रेणी के कई अन्य अफसरों के खिलाफ भी ऐसे ही मुकदमे विशेष अदालतों में दायर कर रखे हैं। ऐसे छह स्पेशल कोर्ट में बिहार में काम कर रहे हैं। उनकी अवैध संपत्ति जब्त करने की कोर्ट से अभियोजन पक्ष ने गुजारिश भी की है। इस पर कोर्ट का फैसला आने ही वाला है। पर फिर सवाल उठेगा कि क्या केंद्र सरकार उनके खिलाफ आरोप पत्र दायर करने की अनुमति देगी ?

बिहार के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण यह रहा है कि यहां के सरकारी पैसों में से अधिकंाश बिचौलिये खा जाते हैं। भ्रष्टाचार के आरोप में यहां दो -दो पूर्व मुख्यमंत्री और आधा दर्जन आई.ए.एस. अफसर जेल की हवा खा चुके हैं। पिछले बीस साल में कई मंत्रियों व विधायकों को भी जेल जाना पड़ा। पर यह बात महसूस की गई कि जेल गये आरोपित अपनी अकूत संपत्ति त्त के जरिए मुकदमे की गर्मी भी कई बार सह जाते हैं। वे महंगे वकील रखकर तथ्यों को तोड़ मरोड़ करके और अदालत के सामने गलत तथ्य पेश करके केस में अपने पक्ष में कई बार जजमंेट दिलवा देते है।

इसलिए हाल में नीतीश सरकार ने यह महसूस किया कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही उनकी अवैध संपत्ति जब्त कर ली जाए तो आरोपित गण कई मामलों में अपनी उस अपार संपत्ति का बेजा फायदा मुकदमा जीतने के लिए नहीं उठा पाएंगे। इसलिए बिहार विशेष अदालत कानून बना। केंद्र सरकार ऐसे मामलों में अभियोजन की समय पर अनुमति देकर ही गरीबों के धन को लूटने वालों को सजा दिलवा सकती है। क्या अन्ना आंदोलन के सघन होते जाने के बावजूद केंद्र सरकार एस.एस. वर्मा जैसे अफसरों का परोक्ष रूप से बचाव करती रहेगी? बिहार में कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं।

Saturday, 10 September 2011

उपाधियों के खिलाफ थी संविधान सभा




भारतीय संविधान सभा ने 30 अप्रैल 1947 को यह प्रस्ताव स्वीकार किया था कि ‘यूनियन द्वारा कोई उपाधि नहीं दी जाएगी। यूनियन का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा। राज्य के अधीन किसी लाभप्रद या विश्वसनीय पद पर काम करने वाला कोई व्यक्ति बिना सरकार के सहमत हुए किसी विदेशी राज्य से किसी प्रकार का कोई उपहार, वेतन, पद या उपाधि स्वीकार नहीं करेगा। ’यह प्रस्ताव सरदार बल्लभ भाई पटेल ने रखा था।


पर, आज जो हमारा संविधान उपलब्ध है, उसमें उपाधियों से संबंंिधत अनुच्छेद -18 में लिखा हुआ है कि ‘सेना या विद्या संबंधित सम्मान के सिवाय और कोई उपाधि राज्य प्रदान नहीं करेगा। भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा।’



यानी समय के साथ हमने कुछ संशोधनों के साथ उपाधियों का तो खात्मा कर दिया, पर अलंकरणों की परंपरा जरूर शुरू कर दीं। उपाधियां और अलंकरण एक जैसे ही लगते हैं।



वे अलंकरण हैं भारत रत्न और पद्म पुरस्कार। बगल के देश पाकिस्तान में निशान-ए-पाकिस्तान वहां का सबसे बड़ा नागरिक अलंकरण है। वह हमारे देश के मोरारजी देसाई और दिलीप कुमार को भी मिला। हमने भारत रत्न मशहूर स्वतंत्रता सेनानी व पाकिस्तान के नागरिक खान अब्दुल गफार खान को भी दिया।



अंग्रेज शासक नाइटहुड, राय बहादुर और खान बहादुर जैसी उपाधियां देते थे। अब पद्म विभूषण और पद्म भूषण जैसे अलंकरण हैं। अंग्रेज आम तौर पर अपने समर्थकों को उपाधियां देते थे। भारत की सरकारें भी आम तौर पर अपनी ही विचारधारा के लोगों को अलंकृत करती हैं। अपवादों की बात और है।



संविधान सभा में श्रीप्रकाश ने कहा था कि यदि जनता किसी नेता को सम्मानित करना चाहती है तो वह कर सकती है। लेकिन हम इस घातक दुराचार उत्पन्न करने वाली प्रथा को मिटाना चाहते हैं जो व्यक्तियों को विवश करती है कि किसी सम्मान विशेष की प्राप्ति के लिए अधिकारियों से अनुग्रह भिक्षा मांगता फिरे।







आजादी के करीब 64 साल बाद इन दिनों पद्म पुरस्कारों की क्या स्थिति है? अपवादों को छोड़कर ये पुरस्कार आये दिन विवादों में रहते हैं।







कानूनन मनाही के बावजूद कई पुरस्कृत महानुभाव इन पुरस्कारों को अपने लेटर हेड, विजिटिंग कार्ड और नेम प्लेट में लिख लेते हैं। इन पुरस्कारों के लिए नामों के चयन में कई बार प्रतिभा, योग्यता, क्षमता और देश सेवा से इतर कारण होते हैं। कई बार लेन-देन की भी बातें सुनी जाती हैं। मोरारजी देसाई की सरकार ने 1977 में इन पुरस्कारों व अलंकरणों को बंद कर दिया था। पर बाद में इंदिरा जी के शासनकाल में दुबारा शुरू कर दिया गया।







संविधान सभा में सेठ गोविंद दास ने कहा था कि फ्रांस की क्रांति और रूस की क्रांति के बाद वहां पर जितनी उपाधियां थीं, वे तमाम वापस ले ली र्गइं। मैं सरदार जी से पूछना चाहता हूं कि क्या वे गुलामी के तमगों से लोगों का उद्धार नहीं करना चाहते ? मैं चाहता हूं कि जो भी उपाधि उनके पास हैं, वह भी वापस ले ली जाएं। इस समय के उपाधिधारी भी स्वतंत्र भारत में उसी प्रकार के व्यक्तियों की तरह रह सकेंगे जिस तरह अन्य व्यक्ति रहेंगे।







दरअसल सरकार के पक्ष में कोई विशेष काम कर देने के लिए या करने की उम्मीद में या फिर अपनी सल्तनत को मजबूती प्रदान करने के लिए अंग्रेज शासक कतिपय गणमान्य लोगों को राय बहादुर -खान बहादुर या फिर इस तरह की अन्य उपाधियां देते थे। भारतीय संविधान सभा के अधिकतर सदस्यों ने ऐसी उपाधियों के खिलाफ सख्त टिप्पणियां की थीं। सब तो नहीं, पर संभवतः अधिकतर ऐसे उपाधिधारकों ने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों का ही साथ दिया था।







यहां भी फणीश्वर नाथ रेणु का उदाहरण है जिन्होंने जेपी पर पुलिस लाठी प्रहार के खिलाफ 1974 में पद्मश्री का अलंकरण लौटा दिया था। उससे पहले जालियांवाला बाग नरसंहार के खिलाफ कवि गुरू रवींद्र नाथ टैगोर ने नाइटहुड की उपाधि लौटा दी थी जो उन्हें 1915 में मिली थी।







साथ ही, यह बात भी देखी गई कि अधिकतर लोगों ने नहीं लौटाई। न ही वे इतिहास के नाजुक मौकों पर स्वतंत्र चेतना के साथ कदम उठा पाए।







संविधान सभा के सदस्य इस बात से अवगत थे। इसीलिए वे आजाद भारत में ऐसे नागरिक चाहते थे जो किसी उपाधि के दबाव में आकर निर्णय नहीं करे। पर आज क्या हो रहा है? अनेक क्षेत्रों में जो गिरावटें बढ़ती जा रही हैं, उससे हमारे संविधान निर्माता परलोक में अपने सिर धुन रहे होंगे।







संविधान सभा में एम.आर. मसानी ने ठीक ही कहा था कि केवल पराधीन देशों में ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र कहे जाने वाले देशों में भी यह देखा गया है कि लेने वालों और देने वालों के लिए भी उपाधियां खतरनाक और दुराचरण का कारण बन जाती हैं। इसलिए देश भक्ति, आत्म सम्मान और सेवा भावना पर विश्वास रखते हुए बिना किसी प्रकार की उपाधियों के हम अपने काम करेंगे।







संबंधित प्रस्ताव पेश करते हुए सरदार पटेल ने कहा था कि विभिन्न कमेटियों में विचार विमर्श के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यूनियन द्वारा कोई उपाधि नहीं दी जाएगी।

Wednesday, 7 September 2011

एक वह भी जमाना था, एक यह भी जमाना है



बिहार में 18 मार्च 1974 को छात्रों और युवकों के नेतृत्व में एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ था। आंदोलन भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और गलत शिक्षा नीति के खिलाफ था। आंदोलन का नेेतृत्व बाद में जेपी ने संभाल लिया था। क्योंकि 18 मार्च को हुए ‘विधानसभा मार्च’ के दौरान हिंसा हो गई थी। जेपी तब तक आंदोलन से जुड़े नहीं थे। इस हिंसा पर जेपी ने बयान दिया था कि ‘हिंसा और आगजनी से क्रांति नहीं होती है।’ आंदोलन के अराजक होते देख कुछ समझदार युवा व छात्र जेपी से उनके कदमकुआं स्थित आवास पर मिले और उनसे नेतृत्व करने का आग्रह किया। जेपी ने आंदोलन को शांतिपूर्ण व अहिंसक बनाये रखने की शर्त रखी। छात्रों-युवकों ने शर्त मान ली। तत्पश्चात आंदोलन का एक नारा बना, ‘हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा।’

आंदोलन को दिशा देने के लिए बिहार छात्र संघर्ष संचालन समिति का गठन हुआ था। इस महत्वपूर्ण समिति के सदस्य थे-लालू प्रसाद, सुशील कुमार मोदी, राम बहादुर राय, वशिष्ठ नारायण सिंह, शिवानंद तिवारी, रघुनाथ गुप्त, मिथिलेश कुमार सिंह, राम जतन सिन्हा, नरेंद्र कुमार सिंह, भवेशचंद्र प्रसाद, नीतीश कुमार, विक्रम कुंवर, गोपाल शरण सिंह, अक्षय कुमार सिंह, विजय कुमार सिन्हा, रघुवंश नारायण सिंह, उदय कुमार सिन्हा, अरुण कुमार वर्मा, रवींद्र प्रसाद और अशोक कुमार सिंह।

आंदोलन के संचालन के लिए पटना के कदमकुआं में स्थापित कार्यालय को चलाने का भार पहले भवेश चंद्र प्रसाद को मिला और बाद में विजय कृष्ण को। समिति के सदस्यों में से राम बहादुर राय, अरुण कुमार वर्मा, उदय कुमार सिन्हा, रवींद्र प्रसाद, रघुवंश नारायण सिंह और अक्षय कुमार सिह को छोड़कर सभी छात्र व युवा नेता बाद के दिनों में समय- समय पर विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री बने। कोई सांसद बना तो कोई विधायक। कोई मंत्री बना तो कोई मुख्यमंत्री। इन दिनों भी नीतीश कुमार तो मुख्यमंत्री हैं और सुशील कुमार मोदी उप मुख्यमंत्री।

यह बात नहीं है कि ये सभी नेता जेपी आंदोलन के मंच से उतर कर सीधे सत्ता की कुर्सी पर चले गये। कुछ को तो बाद में भी संघर्ष करने पड़े। यहां यह सब इसलिए कहा जा रहा है कि आज अन्ना के आंदोलन से निकल कर आज के आंदोलनकारी कल सत्ता भी संभाल सकते हैं। आंदोलन नये नेतृत्व को उभारते हैं। जेपी आंदोलन में भी अनेक नये नेता उभरे थे। अन्ना आंदोलन में भी नये नेता उभर रहे हैं। इनमंे अरविंद केजरीवाल सबसे अधिक चमकते सितारे लग रहे हैं। जेपी आंदोलन को देखा जाए तो कुल मिलाकर उस आंदोलन से निकले नेताओं में आज सबसे चमकते सितारे नीतीश कुमार हैं। नीतीश कुमार खुद को लोहियावादी कहते हैं। नीतीश कुमार लोहियावादियों में भी सबसे चमकते सितारे साबित हो रहे हैं। यहां ऐसे ही लोहियावदियों की बात हो रही है जो सत्ता में पहुंचे। मधु लिमये जैसे लोहियावादी की नहीं। जेपी आंदोलन के दौरान छात्र संघर्ष संचालन समिति के अधिकतर सदस्य आंदोलन शुरू होने से पहले से ही किसी न किसी राजनीतिक दल व विचारधारा से बंधे हुए थे। शिवानंद तिवारी, रघुनाथ गुप्त और नरेंद्र कुमार सिंह लोहियावादी दल में थे। वशिष्ठ नारायण सिंह और मिथिलेश कुमार सिंह संगठन कांग्रेस के युवा संगठन से जुड़े थे। पर जब वे जेपी आंदोलन में थे तो उस समय वे दलीय बंधन में नहीं बंधे हुए थे। इस दृष्टि से अन्ना आंदोलन की स्थिति भिन्न है। अन्ना के साथ गैर दलीय तत्व अधिक हैं।

यहां तक कि आंदोलन के प्रारंभिक दिनों में छात्र-युवा आंदोलन के नेता राजनीतिक दलों के नेताओं को अपने सभा मंचों पर चढ़ने तक नहीं देते थे।

दरअसल जेपी आंदोलनकारियों का तर्क यह था कि 1967 से 1972 तक कुछ राज्यों में सत्ता में रह कर गैर कांग्रेसी दलों ने कांग्रेस की अपेक्षा खुद को बेहतर साबित नहीं किया। वे भी आम तौर पर व्यवस्था के अंग ही बन कर रह गये। इसीलिए इनको आंदोलन में साथ लेकर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। साथ ही इस छात्र-युवा आंदोलन को गैर दलीय बनाये रखने के फायदे होंगे। क्योंकि उसकी नैतिक धाक अधिक होगी। पर जब गफूर सरकार का बिहार में दमन शुरू हो गया तो जेपी आंदोलन में प्रतिपक्षी राजनीति के दल भी जुड़ गये। हालांकि गैर कांग्रेसी दलों के भीतर आंदोलन के पक्ष में विधायिका से इस्तीफा देने के सवाल पर भारी मतभेद था। जिस तरह आज अन्ना के जन लोकपाल विधेयक पर गैर कांग्रेसी दलों में भी मतभेद है। जेपी ने जब विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे देने को कहा तो कई विधायकों ने इस्तीफा देने से मना कर दिया था, जिनमें जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी, संगठन कांग्रेस के विधायक भी थे।



जेपी आंदोलन की संचालन समिति के कार्यालय सचिव भवेश चंद्र प्रसाद ने उन दिनों के अनुभव हाल में इन पंक्तियों के लेखक को इन शब्दों में सुनाये, ‘मेरे कार्यालय में गरीब लोग आते थे और आंदोलन फंड के लिए दो, चार या फिर पांच रुपये देते थे। और कहते थे कि हमारा नाम भले मत पहुंचाइए, पर यह पैसा जेपी तक जरूर पहुंचा दीजिएगा। ऐसा जन लगाव जेपी आंदोलन के प्रति था।’




एक अन्य कार्यालय सचिव विजय कृष्ण ने बताया कि आपातकाल के दिनों में फरारी के काल में अक्सर गरीब लोग ही हमें रात में रहने के लिए अपने घरों में शरण देते थे। अधिकतर अमीर मित्र लोग तो डरे रहते थे।


इन पंक्तियों के लेखक को आपातकाल में बड़ौदा डायनामाइट मुकदमे के सिलसिले में सी.बी.आई. बेचैनी से खोज रही थी। सी.बी.आई के अनुसार जार्ज फर्नाडिस, रेवीकांत सिन्हा और एम.एन. वाजपेयी के साथ मिलकर इन पंक्तियों के लेखक ने पटना में जुलाई 1975 में एक गुप्त बैठक की। उसमें यह षड्यत्र रचा गया कि देश भर में सरकारी संस्थानों को डायनामाइट से उड़ाना है। नतीजतन इन पंक्तियों के लेखक को फरार हो जाना पड़ा। रिश्तेदारों के यहां रहने का सवाल ही नहीं था। पटना सचिवालय में कार्यरत एक अल्पवेतन भोगी कर्मचारी के मंदिरी मुहल्ले में स्थित एक कमरे के घर में लंबे समय तक के लिए मुझे शरण मिली। सी.बी.आई. से बचने के लिए बाद में मेघालय भाग जाना पड़ा। वहां कांग्रेस की सरकार नहीं थी। आपातकाल का दमन नहीं था। वहां मेरे एक रिश्तेदार रहते थे जहां शरण मिली। इन पंक्तियों के लेखक का भी यही अनुभव यह रहा कि आम गरीब लोगों ने छिपने में अपेक्षाकृत अधिक मदद की जबकि तब भी निहितस्वार्थियों की ओर से यह कहा जा रहा था कि जेपी आंदोलन मध्यम वर्ग का आंदोलन है।

किस तरह वह किसी खास जाति या वर्ग का ही आंदोलन नहीं था, उसका एक उदाहरण उन दिनों सामने आते रहते थे। 1974 में जेपी आंदोलन के समय राज्य के कुछ इलाकों में चेचक का प्रकोप हो गया था। जयप्रकाश नारायण ने सार्वजनिक रूप से इस पर चिंता प्रकट की। फिर क्या था, पटना मेडिकल कालेज के छात्रों ने कुछ ही समय में राज्य के दस हजार लोगों को चेचक के टीके देने का काम पूरा कर दिया।



यह जेपी के प्रति सम्मान और उनके नेतृत्व में शुरू आंदोलन की गंभीरता का ही परिणाम था। अधिकतर लोगों को मालूम था कि जेपी का मुद्दा सही है और उनकी मंशा ईमानदार है। अन्ना के आंदोलन को देखकर जेपी आंदोलन की याद आना स्वाभाविक ही है।



इतना ही नहीं, जेपी के आहवान पर जब-जब पटना में सभा या आंदोलन का कोई कार्यक्रम बनता था तो राज्य भर से लोग आते थे। उनके खाने का प्रबंध किसी होटल या भंडारे से नहीं बल्कि आम लोगों के घरों से होता था। अनेक आम लोगों सहित इन पंक्तियों के लेखक के घर से भी अक्सर पूड़ी-भुजिया-आचार के पैकेट उन आंदोलनकारियों के लिए बनकर जाते थे।

जेपी बिहार आंदोलन के दौरान समय -समय पर घरों में थालियां बजाने और थोड़ी देर के लिए नियत समय पर बत्तियंा गुल कर देने का भी आहवान करते रहते थे। उस समय लगता था कि अधिकतर घरांे से आंदोलन की घंटियां बज रही हैं। उन कई घरों से भी थालियांें की आवाज आती थी, जिन्हें सक्रिय राजनीति से कोई मतलब नहीं था। उनमें से अधिकतर लोगों की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी नहीं थी। पर वे एक नेता की ओर विश्वास भरी नजरों से देख कर थे जो उनकी समस्याओं को लेकर 73 साल की आयु में भी आम जन की बेहतरी के लिए सड़कों पर निकल पड़ा था।

यह कहना गलत है कि आम लोगों की राजनीति में कोई रूचि नहीं है। दरअसल लोगबाग विश्वसनीयता खो चुके नेताओं और दलों में कोई खास रूचि नहीं रखते भले वे औपचारिकता के लिए हर बार किसी न किसी को वोट दे देते हैं। सामने बेहतर विकल्प के अभाव में कई बार और अधिकतर स्थानों में विवादास्पद उम्मीदवारों के पक्ष में ही उन्हें मुहर लगानी पड़ती है।

जेपी आंदोलन की घटनाएं बताती हैं और अन्ना आंदोलन की घटनाएं भी इस मामले में इस बात की पुनरावृति कर रही है कि यदि नेता प्रामाणिक हो तो बेहतर राजनीति की प्यासी जनता उस नेता की तरफ ख्ंिाची चली आती है।

भ्रष्टाचार और उससे उत्पन्न महंगाई की मार सबसे अधिक गरीब और निम्न मध्यवर्गीय जनता ही भुगतती हैं, इसलिए केले वाले केले और चने वाले कम कीमत पर या मुफ्त में चने आंदोलनकारियों को दे देते हैं।

जेपी आंदोलन में मशहूर साहित्यकार नागार्जुन भी सक्रिय थे। इन पंक्तियों का लेखक साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ का पटना संवाददाता था और नागार्जुन के नेतृत्व में यदा-कदा धरना, अनशन, प्रदर्शन में शामिल हुआ करता था। फटेहाल नागार्जुन को उन दिनों चंदे में जो भी छोटी राशि मिलती थी, उन सबको हम सबको चाय नाश्ता खिलाने -पिलाने में खर्च कर देते थे।

पटना की कुछ खास लिट्टी -समोसा की दुकान से बाबा लिट्टी और समोसा खरीदकर हमें खिलाते और खुद खाते थे। हमने देखा कि लिट्टी के दुकानदार बाबा को गर्मागर्म चीजें ही देते थे और पैसे में भी खास मुरव्वत करते थे। गरीब लिट्टी वाला समझता है कि बुढ़ापे तक फटेहाल रहा यह बाबा जरूर आम जनता की भलाई के लिए ही संघर्षरत है। यह और बात है कि बाबा आंदोलन के आखिरी दिनों में जेपी आंदोलन से अलग हो गये थे। हालांकि यहां बात की जा रही है कि एक फुटपाथी दुकानदार की एक आंदोलनकारी के प्रति भावना की और उसके प्रति एक खास तरह के लगाव की।

पर साधनों और मीडिया को ध्यान में रखा जाए तो अन्ना आंदोलन बेहतर स्थिति में है। जेपी के पास साधन कम थे। मीडिया का ऐसा विस्फोट तब नहीं हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का दबदबा बहुत था। अधिकतर मीडिया और व्यापारिक घराने इंदिरा जी से सहमते थे। आज वैसी स्थिति नहीं है। इसका लाभ अन्ना के आंदोलन को मिल रहा है। पर जेपी की नैतिक धाक अधिक थी।


Sunday, 4 September 2011

इमरजेंसी में फर्नांडीस से मुलाकात

25 जून 1975 को जब आपातकाल लगा तो उस समय जार्ज फर्नांडीस उड़ीसा में थे। अपनी पोशाक बदल कर जुलाई में जार्ज पटना आये और तत्कालीन समाजवादी विधान पार्षद रेवतीकांत सिंहा के आर. ब्लाक स्थित सरकारी आवास में टिके। इन पंक्तियों का लेखक भी उनसे मिला जो उन दिनों जार्ज द्वारा संपादित चर्चित साप्ताहिक पत्रिका प्रतिपक्ष का पटना संवाददाता था। जार्ज दो तीन दिन पटना रह कर इलाहाबाद चले गये।

बाद में उन्होंने मध्य प्रदेश के प्रमुख समाजवादी नेता लाड़ली मोहन निगम को इस संदेश के साथ पटना भेजा कि वे मुझे और शिवानंद तिवारी को जल्द विमान से बंगलुरू लेकर आयें। शिवानंद जी तो उपलब्ध नहीं हुए। पर मैं निगम जी के साथ मुम्बई होते हुए बंगलुरू पहुंचा।

वहां जार्ज के साथ तय योजना के अनुसार राम बहादुर सिंह, शिवानंद तिवारी, विनोदानंद सिंह, राम अवधेश सिंह और डा. विनयन को लेकर मुझे कोलकाता पहुंचना था। पटना लौटने पर मैंने उपर्युक्त नेताओं की तलाश की। पर इनमें से कुछ जेल जा चुके थे या फिर गहरे भूमिगत हो चुके थे। सिर्फ डा. विनयन उपलब्ध थे। उनके साथ मैं धनबाद गया।

याद रहे कि आपातकाल में कांग्रेस विरोधी राजनीतिक नेताओं -कार्यकर्त्ताओं पर सरकार भारी आतंक ढा रही थी। राजनीतिककर्मियों के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाना तक कठिन था। भूमिगत जीवन जेल जीवन की अपेक्षा अधिक कष्टप्रद था।

धनबाद में समाजवादी लाल साहेब सिंह से पता चला कि राम अवधेश तो कोलकाता में ही हैं तो फिर हम कोलकाता गये। वहां जार्ज से हमारी मुलाकात हुई। पर वह मुलाकात सनसनीखेज थी।

जार्ज ने दक्षिण भारत के ही एक गैरराजनीतिक व्यक्ति का पता दिया था। उस व्यक्ति का नाम तीन अक्षरों का था। जार्ज ने कहा था कि इन तीन अक्षरों को कागज के तीन टुकड़ों पर अलग अलग लिखकर तीन पॉकेट में रख लीजिए ताकि गिरतार होने की स्थिति में पुलिस को यह पता नहीं चल सके कि किससे मिलने कहां जा रहे हो। यही किया गया। पार्क स्ट्रीट के एक बंगले में मुलाकात हुई। दक्षिण भारतीय सज्जन ने कह दिया था कि बंगले के मालिक के कमरे में जब भी बैठिए, उनसे हिंदी में बात नहीं कीजिए। अन्यथा उन्हें शक हो जाएगा कि आप मेरे अतिथि हैं भी या नहीं।

उस दक्षिण भारतीय सज्जन ने हमें जार्ज से मुलाकात करा दी। हम एक बड़े चर्च के अहाते में गये। जार्ज उस समय एक पादरी की पोशाक में थे। उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। चश्मा बदला हुआ था और हाथ में एक विदेशी लेखक की मोटी अंग्रेजी किताब थी। जार्ज, विनयन और मुझसे देर तक बातचीत करते रहे। फिर हम राम अवधेश की तलाश में उल्टा डांगा मुहल्ले की ओर चल दिये। वहीं की एक झोपड़ी में हम टिके भी थे। फुटपाथ पर स्थित नल पर नहाते थे और बगल की जलेबी-चाय दुकान में खाते-पीते थे।

उल्टा डांगा का वह पूरा इलाका बिहार के लोगांे ंसे भरा हुआ था। जार्ज के साथ टैक्सी में हम लोग वहां पहुंचे थे। हम जार्ज को उस चाय की दुकान पर ही छोड़ दिया और राम अवधेश की तलाश में उस झोपड़ी की ओर बढ़े। पर पता चला कि राम अवधेश जी भूमिगत कर्पूरी ठाकुर के साथ कोलकाता में ही कहीं और हैं।

चाय की दुकान पर बैठे जार्ज ने इस बीच चाय पी थी। जब हम लौटे और जार्ज चाय का पैसा देने लगे तो दुकानदार उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया आर कहा, हुजूर हम आपसे पैसा नहीं लेंगे। इस पर जार्ज घबरा गये। उन्हें लग गया कि वे पहचान लिये गये। अब गिरतारी में देर नहीं होगी। जार्ज को परेशान देखकर मैं भी पहले तो घबराया, पर मुझे बात समझने में देर नहीं लगी। मैंने कहा कि जार्ज साहब, चलिए मैं इन्हें बाद में पैसे दे दूंगा। मैं यहीं टिका हुआ हूं। फिर अत्यंत तेजी से हम टैक्सी की ओर बढ़े जो दूर हमारा इंतजार कर रही थी। फिर हमें बीच कहीं छोड़ते हुए अगली मुलाकात का वादा करके जार्ज कहीं और चले गये।

आपातकाल में जिस तरह जान हथेली पर लेकर जार्ज फर्नांडीस ने अपने उसूलों के लिए बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी, यदि मंत्री बनने के बाद भी वे उसी तरह अपने उसूलों पर पूरी तरह खरा उतरे होते तो समाजवादी आंदोलन आगे बढ़ जाता। अक्सर उन कार्यकर्त्ताओं के मन में यह बात आती रहती है जिन लोगों ने भी कभी अपनी जान हथेली पर रखकर उनके साथ काम किया था और जिन्होंने बाद में भी सरकार से कभी कुछ नहीं लिया।

याद रहे कि आपातकाल में जार्ज और उनके साथियों पर बड़ौदा डायनामाइट केस को लेकर मुकदमा चला। सी.बी.आई. का आरोप था कि पटना में जुलाई 1975 मेें जार्ज फर्नाडीस, रेवती कांत सिंह, महेंद्र नारायण वाजपेयी और इन पंक्तियों के लेखक यानी चार लोगों ने मिलकर एक राष्ट्रद्रोही षड्यंत्र किया। षड्यंत्र यह रचा गया कि डायनाइट से देश के महत्वपूर्ण संस्थानों को उड़ा देना है और देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर देनी है। सन 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार बनने पर यह केस उठा लिया गया।


( प्रभात खबर से साभार )

Sunday, 28 August 2011

विफल नहीं होता भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन

अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ इस देश का यह चौथा बड़ा जन आंदोलन है। वैसे तो मिनी आंदोलन रोज-रोज जहां -तहां होते ही रहते हैं।

प्रथम आंदोलन के नायक समाजवादी नेता व विचारक डा. राम मनोहर लोहिया थे। दूसरे के नायक लोकनायक जय प्रकाश नारायण थे। तीसरा आंदोलन वी.पी. सिंह के नेतृत्व में लड़ा गया। चौथा आंदोलन अन्ना हजारे के नेतृत्व में इन दिनों लड़ा जा रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किया गया कोई आंदोलन इस मामले में विफल नहीं होता कि उससे अंततः उस आंदोलन के कारण भ्रष्टाचार समर्थक सत्ता देर-सवेर हट जाती है। पर यह बात भी है कि अगली सत्ता अपने ही पिछले आंदोलन के मुद्दे को लगभग भूल जाती है। पता नहीं इस मामले में इस बार क्या होगा।

इस गरीब देश के अधिकतर लोग सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं, उनको छोड़कर जो लोग भ्रष्टाचार से लाभान्वित हैं। हालांकि एक ही व्यक्ति अधिकार की अपनी सीट पर बैठकर तो रिश्वत ले रहा है, पर वही जब दूसरे दतर में अपने किसी काम के लिए जाता है, तो उसे भी घूस देनी पड़ती है।

कहने का अर्थ यह है कि भ्रष्टाचार से तो लोगबाग आजादी के बाद से ही निरंतर पीड़ित रहे हैं। पहले कम पीड़ित थे, अब अधिक हो रहे हैं। पर जब जब प्रामाणिक नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़ी होती है, तब तब आम जनता उसके पीछे उमड़ पड़ती है। चारों आंदोलनों में यही हुआ। इन आंदोलनों में एक समानता और भी है। ये सारे आंदोलन कांग्रेसी सत्ता के खिलाफ ही हुए। पर स्वार्थवश कांग्रेस ने इतिहास से अब तक नहीं सीखा।

डा. लोहिया एक प्रामाणिक नेता थे जो सिर्फ देश और जनता के बारे में ही सोचते थे। उनकी न तो निजी कार थी और न ही बैंक खाता। अविवाहित थे।

आजादी के बाद के चुनावों में अनेक प्रतिपक्षी दलों की उपस्थिति होती थी। उसका लाभ उठाकर 50 प्रतिशत से भी कम ही मत पाकर लगातार 20 साल तक कांग्रेस सत्ता में बनी रही। कांग्रेस ने जन समस्याओं की उपेक्षा की। भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार का बोलबाला बढ़ने लगा तो डा. लोहिया ने कुछ प्रतिपक्षी दलों को चुनाव के लिए एक किया। और नतीजतन 1967 में नौ राज्यों की सत्ता कांग्रेस के हाथों से निकल गई। लोकसभा में कांग्रेस का बहुमत घट गया। यदि कुछ और प्रतिपक्षी एकता हुई होती तो केंद्र की सत्ता से भी कांग्रेस का तभी सफाया हो गया होता। भ्रष्टाचार के मामले में इन नौ राज्यों की सरकारें पिछली कांग्रेसी सरकारों से बेहतर थीं। राजनीतिक महत्वाकांक्षा और बेमतलब के आंतरिक विवादों के कारण गैर कांग्रेसी सरकारें अल्पायु साबित हुईं।

बिहार में 1965-66 में तत्कालीन कांग्रेसी सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना गुस्सा था कि एक तत्कालीन सत्ताधारी नेता का नाम लेकर गांव-शहर मेें यह खुलआम नारा लगता था कि ‘गली -गली में शोर है और फलां नेता चोर है।’ गैर कांग्रेसी दलों की नाकामयाबी का लाभ उठाकर 1971-72 में दुबारा सत्ता में आकर कांग्रेस इस बार एकाधिकार, परिवारवाद और भ्रष्टाचार में लिप्त हो गई तो जेपी उठ खड़े हुए। दक्षिण को छोड़कर जेपी को पूरे देश का समर्थन मिला और इंदिरा गांधी जैसी महाबली नेता का पराजय हो गया। जिस तरह डा. लोहिया के असामयिक निधन के कारण प्रतिपक्ष खास कर समाजवादी आंदोलन दिशाहीन हो गया था, उसी तरह जेपी की किडनी खराब हो जाने के कारण जेपी जनता सरकार पर अंकुश नहीं रख सके। यानी एक अच्छे आंदोलन का सुपरिणाम सामने नहीं आ सका। हालांकि मोरारजी सरकार में भ्रष्टाचार कम था और मूल्य वृद्धि की रफतार बिलकुल काबू में थी। वी.पी. सिंह ने अपनी कुर्सी को खतरे में डाल कर राजीव गांधी से राजनीतिक लड़ाई मोल ली थी, इसलिए भी आम जनता के वे हीरो बने और भ्रष्टाचारविरोधी जनता की मदद से वे राजीव गांधी को सत्ता च्युत कर सके।

अन्ना हजारे को तो सत्ता की राजनीति से कोई मतलब ही नहीं है, इसलिए भी आज आम जनता का काफी समर्थन उन्हें मिल रहा है। उम्मीद की जा रही है कि उन्हें और भी अधिक जन समर्थन मिलेगा। सरकारी दमन और समय बीतने के साथ जन समर्थन बढ़ता है। आज के आधुनिक मीडिया ने भी अन्ना की बातों को अधिक से अधिक जनता तक पहुंचाने में मदद की है। ऐसी सुविधा इससे पहले के किसी आंदोलनकारी नेता को नहीं मिली थी।

यानी जनता तो भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में शामिल होने के लिए हमेशा ही तैयार बैठी रहती है, बस उसे प्रतीक्षा रहती है कि प्रामाणिक नेता के आगे आने की। डा. लोहिया, जे.पी., वी.पी. और अन्ना हजारे ऐसे ही प्रामाणिक नेता साबित हुए या फिर अधिकतर जनता ने उन्हें ऐसा माना।

लोहिया की सप्त क्रांति और जेपी की संपूर्ण क्रांति के तो उंचे लक्ष्य रहे हैं। पर आम जनता में तो फिलहाल सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टाचार से तत्काल मुक्ति की छटपटाहट है। वैसे भी गैर सरकारी भ्रष्टाचार सरकारी भ्रष्टाचार से ही प्रेरित-पोषित है। कई लोगों का मानना है कि इस गरीब देश की अन्य अधिकतर समस्याएं भी भ्रष्टाचार से ही उपजी हैं। इसीलिए जब अन्ना हजारे जैसी हस्ती भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए जन लोकपाल विधेयक लेकर सामने आती है तो जनता उमड़ पड़ती है। अभी न तो किसी और अंादोलन से इस आंदोलन की तुलना करने का कोई मतलब है न ही किसी अन्य आंदोलन से इसे बड़ा या छोटा दिखाने का कोई औचित्य है।

किसी आंदोलन को पर्याप्त जन समर्थन वाला आंदोलन मान लिया जाना चाहिए जिस आंदोलन के जरिए सरकार झुक जाए या फिर कोई भ्रष्टाचार समर्थक सरकार चुनाव के जरिए सत्ता से हट जाए।

जेपी आंदोलन ने अंततः केंद्र की सत्ता से इंदिरा गांधी को बाहर कर दिया था। वी.पी. सिंह के अभियान ने भी राजीव गांधी को सत्ताच्युत कर दिया। अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रति कें्रद सरकार का जो रुख है, उससे फिलहाल तो यही लगता है कि सन 2014 के लोक सभा के चुनाव के बाद केंद्र में कांग्रेसी सरकार तो नहीं ही रह पाएगी। क्योंकि जन लोकपाल विधेयक को लेकर तब तक दोनों पक्षों में हुमचा-हुमची होती रहेगी और इसके साथ जनता का जागरण भी। पहले की तरह ही एक बार फिर जगह जगह नये नेता उभरेंगे। भ्रष्टाचार और उससे उपजे काला धन पर काबू पाने की जो समस्या है, उसको लेकर इस देश के अधिकतर दलों व नेताओं को भारी कठिनाई है।सबके अपने अपने भ्रष्टाचार हैं। कोई व्यक्ति हथकड़ी गढ़ने के लिए अपने ही पैसों से लुहार को आखिर ऑर्डर क्यों और कैसे दे देगा ? अन्ना यही चाहते हैं।

जनता तो तैयार दिख रही है, तय तो अन्ना हजारे और उनकी टीम को करना है।उनकी कल्पना का जन लोकपाल कानून पास हो सकता है,पर यह काम अगली लोक सभा ही शायद कर सकेगी। मौजूदा लोक सभा के अधिकतर सदस्य जन लोकपाल के लिए कत्तई तैयार नहीं है। इस मामले में स्वाभाविक है कि अधिकतर मौजूदा कांग्रेसी सांसदों की हालत बदतर है। पर गैर कांग्रेसी दलों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है।

निहितस्वार्थी लोग तो चीजों को मिलाकर गड्मगड कर दे रहे हैं । जिस तरह कभी कहा जा रहा था कि इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया। उसी तरह आज कुछ लोग कह रहे हैं कि सांसद और संसद एक ही हैं। यदि अन्ना हजारे के आंदोलन के गर्भ से जनहितकारी नेतागण 2014 के लोक सभा चुनाव में जीत कर संसद में चले जाएं तो संसद का स्वरूप आज जैसा नहीं रहेगा। फिर जन लोकपाल जैेसे विेधयक के पास होने मंे कोई दिक्कत नहीं होगी। ऐसा संभव भी है ,यदि उम्मीदवारों के चयन में जेपी और वी.पी.के अधूरे कामों को पूरा कर दिया जाए।

दरअसल जेपी और वी.पी. और उनके निस्वार्थी सहयोगियों ने क्रमशः 1977 और 1989 में चुन -चुन कर देशप्रेमियों को टिकट दिये हेाते तो उनकी मंशा विफल नहीं होती।

याद रहे कि ऐसे ग्यारह सांसदों को देशप्रेमी नहीं कहा जा सकता जिन्हें 2008 में खुद लोक सभा ने प्रस्ताव पास कर के सदन की सदस्यता से निकाला था।उन पर प्रश्न पूछने के लिए रिश्वत लेने का आरोप साबित हो चुका था।यह एक स्टिंग आपरेशन का नतीजा था।उस दृश्य को टी.वी. पर देश ने देखा था। 1996 के झामुमो सांसद रिश्वत कांड की तरह पैसे लेकर सरकार बचाने वाले सांसदों के खिलाफ बोलकर कोई व्यक्ति कानून बनाने के मामले में संसद की सर्वोच्चता को चुनौती नहीं दे रहा होता है।वैसे भी न तो संसद सर्वोच्च है और न ही संविधान बल्कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च और सार्वभौम है जो संासदों का भी चयन करती है और उसी के प्रतिनिधि संविधान भी बनाते हैं।

अन्य आंदोलनों से इस अन्ना आंदोलन की इस मामले में समानता है कि कभी कोई जब जब कोई भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाता है तो उसी पर उल्टे तरह -तरह के लांछन लगा दिये जाते हैं। मान लिया कि वे लांछित हैं,उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने का कोई हक नहीं है। तो फिर लांछन लगाने वाले ही क्योें नहीं ऐसा कानून बना देते जिससे जनता को सर्वव्यापी भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाए ? पर उल्टे प्रधान मंत्री कहते हैं कि मेरे पास भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए जादू की कोई छड़ी नहीं है।अन्ना के साथ जन सैलाब इसलिए भी उमड़ रहा है क्योंकि जनता यह देख रही है कि भले रोकने के लिए कोई छड़ी नहीं है, पर कोई दूसरी छड़ी उनके पास जरूर है जो तब तक टू जी स्पैक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला और आदर्श घोटाले जैसे घोटाले कराने की छूट देती रहती है जब तक सुप्रीम कोर्ट कदम नहीं उठाता है।

भ्रष्टाचार विरोधी महिम में आम जनता की भारी सहभागिता को देखकर उन कुतर्कियों को शर्म करनी चाहिए जो इन दिनों अक्सर यह कहा करते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उपर से नहीं बल्कि नीचे से कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि जनता भी वोट के लिए पैसे मांगती है और अपराधियों को भी वेाट दे देती है। जनता को भ्रष्ट और अपराधी तत्वों से लाभ मिल होता तो जनता आज उल्टे अन्ना के खिलाफ आंदोलन करती। राजनीति में घुसाये गये भ्रष्ट और अपराधी तत्व तो भ्रष्ट नेताओं के लिए कवच का काम करते हैं। इसलिए अन्ना हजारे के आंदोलन के रास्ते में अवरोधक हर जगह फैले निहितस्वार्थी तत्व हैं जिनकी संख्या कम है हालांकि वे शक्तिशाली हैं। अगले चुनाव में वे तिनके की तरह उड़ जाएंगे।