गुरुवार, 24 सितंबर 2020

    स्कूली जीवन का एक संस्मरण 

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यह बात तब की है,जब मैं हाई स्कूल में था।

नौंवी और दसवीं कक्षा में मेरा स्थान दूसरा रहता था।

फस्र्ट आने वाले का नाम था मुहम्मद ईसा।

ग्यारहवीं के लिए मैं किसी अन्य स्कूल में चला गया था। 

मैं ईसा का इस मामले में आज भी शुक्रगुजार हूं कि उसकी बहुत ही अच्छी लिखावट को देख -देख कर मैंने अपनी लिखावट सुधारी थी।

  अच्छी लिखावट का मुझे बाद के जीवन में बड़ा लाभ मिला।

याद रहे कि मैंने जीवन में कभी किसी सरकारी सेवा के लिए आवेदन तक नहीं दिया।

मुझे सार्वजनिक जीवन में जाने की

शुरू से इच्छा थी।

गया भी।

पर वहां से निराश होकर पत्रकारिता में चला आया।

पत्रकारिता भी एक अर्ध -सार्वजनिक जीवन ही है।

 स्कूल में फस्र्ट-सेकेंड करने के कारण मैं ईसा के पास ही  बैठता था।

पर, बात इतनी ही नहीं है।

एक बार तिवारी जी नामक शिक्षक ने मुझे बताया कि दरअसल तुमको ही फस्र्ट करना चाहिए।

किंतु उर्दू और फारसी में ईसा को करीब नब्बे -नब्बे प्रतिशत अंक मिल जाते हैं।

  दूसरी ओर संस्कृत शिक्षक मुझे सौ में सिर्फ 35 प्रतिशत अंक ही देते थे।

हिन्दी में भी बहुत अधिक अंक आने का सवाल ही नहीं था जो 90-90 प्रतिशत की ‘क्षतिपूत्र्ति’ कर सके।

   वैसे बिहार माध्यमिक विद्यालय परीक्षा बोर्ड की परीक्षा में संस्कृत में मुझे सौ में 84 अंक मिले थे।

  मेरे साथ सहानुभूति रखने वाले शिक्षक तिवारी जी ही यह जानते थे कि ईसा को कितने अंक मिलते थे।

उन्होंने संस्कृत शिक्षक से कहा भी था कि आप कम अंक क्यों देते हैं ?

उसके जवाब में पंडित जी ने कहा कि ज्यादा दूंगा तो छात्र पढ़ने में आलसी हो जाएगा और बोर्ड परीक्षा में अच्छा नहीं कर पाएगा।

  वैसे मेरे लिए तब इसका कोई खास महत्व नहीं था कि मैं फस्र्ट क्यों नहीं करता।

उस जमाने में एक नामी स्कूल में कक्षा में सेकेंड करना भी बड़ी बात थी।उसी से मैं संतुष्ट था।

  ईसा को इतने अधिक अंक मिल जाते थे,उसमें खुद ईसा का भला क्या कसूर ?

हां,उस उर्दू शिक्षक से जरूर पूछा जाना चाहिए था कि किस आधार पर भाषा में आप इतने अधिक अंक देते हैं ?

   ईसा पढ़ -लिखकर प्राइमरी स्कूल में शिक्षक बना।

जाहिर है कि बोर्ड परीक्षा में उसे अच्छे अंक नहीं आए होंगे।

मैं नहीं जानता कि बोर्ड परीक्षा उसने कितने अंकों के साथ पास किया।

  यदि मेरी तरह उसने फस्र्ट डिवीजन से पास किया होता तो उसे बेहतर नौकरी मिल सकती थी।

1963 में फस्र्ट डिविजनर बहुत कम होते थे।

उस स्कूल में उस साल सिर्फ चार विद्याथियों को ही फस्र्ट डिविजन मिला था।

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सुरेंद्र किशोर--19 सितंबर 20


1 टिप्पणी:

Prakash ने कहा…

Bhut hi sundar vivran