सोमवार, 10 सितंबर 2018

यादें और अनुुभव


  
           -- एक ---
यह एक पूर्व जमींदार की कहानी है।
उनके पास कभी अपना हवाई जहाज भी 
 हुआ करता था।
 आजादी के बाद वह परिवार राजनीति में भी अच्छा -खासा दखल रखता था।
अब वे नहीं रहे।मत पूछिएगा कि वे किस राज्य के थे।
  मेरे परिचित थे।
करीब दो दशक पहले की बात है।एक दिन अकेले में मिल गए।
 उनकी बढ़ती उम्र देखकर  जब मैंने उनका हालचाल पूछा तो वे फट पड़े।
बोले ,सुरेंद्र जी मैं आपसे उम्र में बड़ा हूं।इसलिए बिना मांगे एक सलाह देता हूं। आपको अपने परिवार से छुपा कर कुछ पैसे रखने चाहिए।भगवान करे न आए, पर आएगी तो वे पैसे विपत्ति में आपके काम आएंगे।’
उन्होंने कहा कि मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि तो आप जानते ही हैं।पर 
मेेरे साथ जो बीता,वह किसी के साथ न बीते,ऐसी कामना मैं भगवान से करता हूं।
मेरा लीवर खराब हो गया था।उसे अमेरिका जाकर बदलवाना था।
उसके लिए मुझे करीब 60 लाख रुपए की जरूरत थी।हमारे परिवार के पास पैसे की  कमी नहीं है।
फिर भी पत्नी व बेटे ने कह दिया कि उससे कोई लाभ नहीं होगा।इतने पैसे बेकार जाएंगे।
बदलवाने पर भी आप कितने दिन बचेंगे ?
मुझे झटका लगा।ऐसा सोचा तक नहीं था।पर मेरे पास फिर भी एक  उपाय बचा था।रांची में मेरी एक ऐसी कीमती जमीन थी जिसकी खबर परिवार में  किसी को नहीं थी।
मैंने उसे बेच दिया।
लीवर ट्रांसप्लंाट करा कर लौटा हूं।
           --दो--
  दूसरी कहानी मेरे एक सहपाठी की है।
मैं जब स्कूल में पढ़ता था,उन दिनों छात्रों को  एसेसमेंट लिखना पड़ता था।
उसमें 20 प्रतिशत अंक स्कूल से ही मिलता था।मैट्रिक की बोर्ड परीक्षा में वह नंबर जुड़ता था।
 एसेसमेंट लिखने के लिए दस-दस आने की कई मोटी काॅपियां खरीदनी पड़ती थीं।वे कापियां साल भर चलती थीं।
पर, मेरे सहपाठी के अभिभावक के पास  उतने पैसे होते नहीं थे कि वह एक साथ सभी विषयों के लिए दस -दस आने की  कापियां खरीद सकें।
वह तीन आने वाली काॅपियां ही खरीदते थे।साल में तीन बार।
 मेरा सहपाठी पढ़ने में बहुत तेज था।उसका इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला हो गया।
वह पढ़-लिख कर विदेश चला गया।उसने धीरे- धीरे अपने परिवार और मित्रों से  संबंध तोड़ लिए।
बड़ी मुश्किल से उसे पढ़ा पाने  वाले अभिभावक उससे आर्थिक मदद क्या पाते ,उसके दर्शन भी दुर्लभ हो गए।
अभिभावक अभी जीवित हैं।आर्थिक परेशानियों में रहते हैं। 
उधर सुना कि उस इंजीनियर के पास अपना कारखाना है और निजी विमान भी।विदेशी पत्नी और बाल-बच्चे।
यानी, यदि आपको अपने बाल-बच्चों को विदेश में पढ़ाना हो या विदेश में नौकरी करने लायक बनाना हो तो बिना किसी उम्मीद के ऐसा करिए।आपके लिए कुछ करे तो भी ठीक,नहीं भी करे तो भी ठीक।सिर्फ यह देख-सुनकर  संंतोष कर लीजिए
कि आपकी संतान ने अपने जीवन में काफी तरक्की कर ली है।हालांकि सारे बेटे ऐसे नहीं होते।कुछ तो  अपने मां-बाप की देखभाल करते ही हैं।
इधर कई अभिभावकों को इसी बात से संतोष करते देखा है कि वह खुद सुखी तो है।संतोष कुछ लोग भीतर से कर लेते हैं तो कुछ बाहर से।
           ---तीन---
अपवादों की बात और है।पर,आम तौर पर हर पुत्र अपने पिता के जीवन काल में उनके महत्व व योगदान को नहीं समझ पाता।
  पर हां, पिता के निधन  के बाद छिपकर उनकी तस्वीर अपने हाथों में लेकर कुछ पुत्र उन्हें याद करते हंै और रोते हंै।
अपवादस्वरूप मैंने कई ‘श्रवण कुमार’ भी देखे हैं।मैंने एक ऐसा पुत्र भी देखा कि जिसने विपरीत परिस्थिति में पिता और परिवार की जिम्मेदारियां  बांटने के लिए खुद अपनी शादी तक नंहीं की। 
पर, अपवादों से तो समाज नहीं चलता।
आम तौर पर वयस्क पुत्र यह मानता है कि मैंने जीवन में जितनी सफलता पाई है,वह सब मेरी अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर है।किंतु जितनी कमी रह गयी,वह पिता की कमी के कारण।
 पर पिता के निधन के बाद अधिकतर पुत्रों  की राय बदल जाती है।क्योंकि तब तक वे खुद पिता बन चुके होते हैं।वे देखते हंै कि  खुद अपने पुत्र की देखभाल में कितना कुछ करना पड़ता है।
इसलिए यदि पुत्र पिता से  शिकायत करे तो पिता को चाहिए कि वह मुस्करा कर रह जाएं। कोई सफाई न दें।अपने योगदान न गिनाएं।क्योंकि कोई बात वह अभी नहीं सुनेगा।
 पिता यह मान कर चलें कि मेरे नहीं रहने के बाद तो मेरे प्रति इसकी  राय  बदलने ही वाली है।
हां, यह और बात है कि जब राय बदलेगी उस समय मैं नहीं रहूंगा।
 अपने छात्र जीवन में मैंने एक बार अपने पिता को जवाब दे दिया था।
मेरे पिता ने मुझसे कहा कि मुझे तो जवाब दे रहे हो,पर जब तुम्हारा पुत्र तुम्हें जवाब देगा, तब तुम्हें यह महसूस होगा कि जब कोई पुत्र जवाब देता है तो पिता के कलेजे पर कैसी चोट पहुंचती है।उन्होंने ठीक ही कहा था।पर, अन्य अनेक पुत्रों की तरह अपने छात्र जीवन में वह बात मैं भी नहीं समझ सकता था।
किसी को समझाने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए।कोई फायदा नहीं।हालांकि यहां मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सारे पुत्र अपने पिता को जवाब ही देते हैं।  
     --दैनिक जागरण समूह की ओर से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका ‘बागवान’  के प्रवेशांक में प्रकाशित मेरा लेख ।        

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