नार्को,पाॅलिग्राफिक और बे्रन मैपिंग टेस्ट पर रोक से संबंधित अपने सन 2010 के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट पुनर्विचार करे
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--सुरेंद्र किशोर--
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सेनारी (1999) और लक्ष्मणपुर बाथे (1997) नरसंहारों में
मृतकों के क्षत-विक्षत शरीरों वाले दृश्य
अब भी मेरी स्मृति पटल पर जीवित हैं।
‘जनसत्ता’ के संवाददाता के रूप में मैंने बारी -बारी से दोनों घटनास्थलों का दौरा किया था।
दोनों जगह पहंुचने के लिए काफी पैदल चलना पड़ा था।
लक्ष्मणपुर बाथे वाली मेरी रिपोर्ट तो अगले दिन ‘इंडियन एक्सपे्रस’ में भी पहले पेज पर मेरी बाईलाइन के साथ छपी थी।
इन दोनों कांडों पर पटना हाईकोर्ट के जजमेंट से एक बात की जरूरत बढ गय़ी है।
वह यह कि सबूत जुटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट अब इस बात की छूट दे दे कि जांच एजेंसियां अभियुक्तों के नार्को टेस्ट,बे्रन मैपिंग और पाॅलिग्राफिक टेस्ट जरूरत के अनुसार कर सकें।
याद रहे कि सन 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘‘आरोपी या संदिग्ध का उसकी सहमति के बिना नार्को ,ब्रेन मैपिंग या पाॅलिग्राफिक टेस्ट नहीं किया जा सकता।’’
अब समय आ गया है कि इस आदेश को बदलने के लिए सुप्रीम कोर्ट खुद पहल करे या सरकार कानून -संविधान में परिवत्र्तन के लिए उपाय करे।
सेनारी और लक्ष्मणपुर बाथे के आरोपितों के इस तरह के टेस्ट कराए गए होते और उन जांच रपटों को अदालत में मान्यता होती तो हमारी ध्वस्त होती क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में काफी सुधार हो जाता।
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जब मैं सेनारी और लक्ष्मणपुर बाथे के मृतकों के समक्ष बारी बारी से खड़ा था,तब इस बात की कल्पना भी नहीं कर रहा था कि इनके हत्यारे एक दिन सबूत के अभाव में इस तरह सजा से बच जाएंगे !
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22 मई 21
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