गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020


जगलाल चैधरी की जयंती ...5 फरवरी -पर  
----------------
   --सुरेंद्र किशोर--
मैंने साठ के दशक में अपने गांव में बिहार सरकार के पूर्व मंत्री जगलाल चैधरी को देखा था।
   शब्द के सही अर्थ में वह गांधीवादी थे।
पोशाक से लेकर बात-व्यवहार, चरित्र तक गांधीवादी !
कठोर ईमानदारी और सादा जीवन के प्रतीक थे।
वह 1937 में गठित बिहार मंत्रिमंडल के सदस्य थे।
तब कुल चार ही कैबिनेट मंत्री थे।
डा.श्रीकृष्ण सिंह प्रधान मंत्री थे।
अन्य मंत्री थे--डा.अनुग्रह नारायण सिंह,
डा.सैयद महमूद और 
जगलाल चैधरी।
 मेरे गांव के किसानों से मैंने भोजपुरी में यह कहते हुए उन्हें संुना था कि आप लोग रासायनिक खाद का इस्तेमाल मत कीजिए।
 यह बहुत नुकसानदेह है।
फोर्थ इयर तक कलकत्ता मेडिकल काॅलेज में मेडिकल शिक्षा ग्रहण कर चुके जगलाल चैधरी गांधीवादी होने के बाद  अंग्रेजी दवाओं के भी खिलाफ हो गए थे।
अधिक नलकूप लगवाने से भूजल स्तर गिरने का खतरा भी वह  तभी ही बताते रहते थे। 
यानी, वे पूर्ण गांधीवादी थे।
पर उनकी सरकारें तो गांधीवादी थी नहीं।
इसलिए चैधरी जी को बाद में मंत्री तक नहीं बनने दिया गया।
  उनकी पार्टी की केंद्र सरकार उन्हीं दिनों रासायनिक खाद व उन्नत बीज किसानों तक पहुंचा कर वाहवाही लूट रही थी।
जबकि, रासायनिक खादों के खतरे को भांप कर अमेरिका तभी जैविक खेती की ओर पलटने लगा था।
गोबर  खाद डाल कर परंपरागत बीज से उपजे गेहूं की जो मीठी रोटी मैंने बचपन में खाई थी,वैसा स्वाद अब कहां  !!
हाल में राज्य सभा सदस्य आर.के.सिन्हा ने मुझे बताया कि बाजार में मिल रहे अनाजों में भारी मात्रा में रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं के अंश हैं।
वे कैंसर पैदा करते हैं।
सिन्हा अपने गांव में खुद जैविक खेती करवाते हैं।
मेरा मानना है कि जिन्हें भी गांवों में अपना खेत हो,वे रिटायर होने के बाद गांवों की ओर लौटें।
अपनी अगली पीढि़यों को कैंसर से बचाने का यही उपाय है।
बाजार पर कत्तई भरोसा न करें।
पूरे देश के भ्रष्ट सरकारी सिस्टम ने घूस ले -लेकर तरह तरह के जहर खिलाने की खुली छूट व्यापारियों को दे रखी है।
याद रहे कि जहर का स्त्रोत सिर्फ रासायनिक खाद तक ही सीमित नहीं है।
गंगा के किनारे के गांवों के खेतों में इतना अधिक आर्सेनिक पहुंच गया है कि पेयजल अब पीने लायक नहीं है।
  काश ! लोग जगलाल चैधरी की बात मान लेते !    
इसी महीने विश्व कैंसर दिवस भी मनाया जाता है।
उस अवसर पर  चैधरी जी की भी याद आई।
मंत्री के रूप में उन्होंने बिहार में नशाबंदी लागू की थी।
पर खुद उनके  लिए यह उल्टा पड़ा।
उन्हें बाद में मंत्री तक नहीं बनने दिया गया।
कहते हैं कि कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें मंत्री नहीं बनने दिया। 
यानी, गांधी ने जिस सरकार को बनाया,उसने प्रारंभ से ही गांधी की नीतियों की उपेक्षा शुरू कर दी।
याद रहे कि गांधी जी से प्रभावित होकर जगलाल चैधरी ने  आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए अपनी मेडिकल पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी।
जब लोगों ने कहा कि एक साल बचा है,पूरा कर लीजिए।
तो उन्होंने जवाब दिया  कि अब मेरे लिए इस पढ़ाई का कोई मतलब नहंीं रहा।
मैंने तो अपना जीवन गांधी को दे दिया है। 
  आज की स्थिति के अनुसार मेरी समझ से नगरों में रह रहे जिन लोगों के पास गांवों में अच्छी -खासी जमीन है,वे रिटायर होने के बाद गांवों में जाकर जैविक खेती कराएं।
कम से कम परिजन तो अर्सोनिक से बच जांएगे।
अब तो बिजली की व्यवस्था बेहतर है।
हां,कानून -व्यवस्था बेहतर करने के लिए सरकार पर दबाव डालें। 

कोई टिप्पणी नहीं: