सोमवार, 23 दिसंबर 2019

 न बिजली की तरह कौंधे,
न सूरज की तरह स्थायी हो सके  !!
..................................................
डा.राम मनोहर लोहिया की पहल पर 1966-67 में कुछ गैर कांग्रेसी दलों की आपसी चुनावी एकता हुई थी।
1967 के चुनाव के तत्काल बाद सात राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बन गयीं।
कुछ ही समय बाद दल -बदल के कारण उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की कांग्रेसी सरकारें भी गिर गर्इं।
  बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख राज्यों में सी.पी.आई.और जनसंघ एक साथ मंत्रिमंडल में शामिल हुए थे।
ऐसा पहली और आखिरी बार हुआ।
हां, 1989-90 में वी.पी.सिंह की केंद्र सरकार को दोनों ने बाहर से एक साथ समर्थन जरूर दिया था।
जो कम्युनिस्ट समय -समय पर यह आरोप लगाते रहते हैं कि समाजवादियों ने सांप्रदायिक तत्वों को बढ़ावा दिया,वे 1967 और 1989 की  कहानी ध्यान से पढ़ लें।
यह डा.लोहिया का ही कमाल था कि उन्होंने इन दोनों परस्पर विरोधी दलों को सरकार तक में साथ बैठा दिया ।
  पर, डा.लोहिया की एक बात उन सरकारों ने भी नहीं सुनी।
 उन्होंने उन गैर कांगे्रसी राज्य सरकारों से कहा था कि 
‘‘बिजली की तरह कौंध जाओ और सूरज की तरह स्थायी हो जाओ।’’
यानी जनहित में जल्दी -जल्दी चैंकाने वाले काम करो।
 वे सरकारें वैसा नहीं कर सकीं।
 नतीजतन धीरे- धीरे उन राज्यों में भी कांग्रेसी सत्ता में वापस आ गए।
    डा.लोहिया का नाम लिए बिना नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्तर पर  बिजली की तरह कौंधे, इसलिए सूरज की तरह --फिलहाल--स्थायी हो गए।
मोदी आजाद भारत के पहले नेता हैं जिन्होंने अपने बूते लगातार दूसरी बार प्रधान मंत्री की कुर्सी पाई,सीटें अधिक लेते हुए।
पर,उनके दल की राज्य सरकारें ऐसा नहीं कर सकीं।
नतीजतन एक -एक करके राज्य हारते जा रहे हैं।
संघ,भाजपा और नरेंद्र मोदी के त्रिस्तरीय ‘अनुशासन’ में रहने के कारण  मुख्य मंत्रियों को  मोदी शैली अपनाने के लिए कोई बाध्य नहीं कर सका।
  कुछ दशक पहले तक बिहार में देखा गया था कि यदि किसी  एस.पी.या दारोगा ने ईमानदारी से अपराधियों को सबक सिखा दिया तो जनता उसकी बदली होने के बाद रोने लगती थी।
यदि वोट से एस.पी.बनना होता तो वैसा एस.पी.कभी नहीं बदला जाता ।
दूसरी ओर तो मुख्य मंत्री के पास तो बहुत पावर होते हैं।
भाजपा यानी यूं कहें कि किसी अन्य दल का शायद ही कोई मुख्य मंत्री अपनी सरकार में भ्रष्टाचार से निर्णायक लड़ाई करता हुआ नजर आता है।
जबकि देश भर में थानों और अंचल कार्यालयों तक में खुली घूसखोरी का बोलबाला है।
भ्रष्टाचार से लड़ते नेता जनता को बहुत भाते हैं।
 ढीले -ढाले मुख्य मंत्री न तो अपना भला कर पाते और न पार्टी का और न ही राज्य का। 
सरकार बचाने की चिंता में रहने वालों की सरकार जल्दी ही चली जाती है।
अब नतीजा सामने है 
....................
किसी संविधान संशोधन के लिए कम से कम आधे राज्यों की विधायिकाओं की सहमति की जरूरत होती है।
 राजग के पास आधे राज्य अब बचे रह पाएंगे ? 
 लगता है कि मुख्य मंत्रियों की विफलता के कारण नरेंद्र मोदी की ‘रफ्तार’ अब कम हो जाएगी।
--सुरेंद्र किशोर--23 दिसंबर 2019

कोई टिप्पणी नहीं: