शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

चेतावनियों पर ध्यान दिया होता तो सजा से बच जाते नेता जी



हाल के दशकों में देश के अनेक नेताओं को अदालतों से सजाएं हुई हैं।कुछ को भ्रष्टाचार के मामले में तो कुछ को अन्य तरह के अपराध को लेकर।
उन में से कुछ नेताओं ने तो सत्ता में रहते हुए एक पर एक  घोटालों -महा घोटालों की झरी ही लगा दी थी।
  हालांकि ऐसे नेताओं के घोटालों को लेकर बहुत पहले से ही मीडिया में बातें आती रही थीं ।
पर उन में से अधिकतर नेताओं ने एक घोटाले की खबर को नजरअंदाज करके दूसरे घोटाले शुरू कर दिए थे ।
 अब जब उन्हें अदालतों और जेलों  का सामना करना पड़ रहा है तो क्या उन्हें इस बात का पछतावा हो रहा है कि काश ! हम अपने बारे में छपी पहली ही खबर पर चेत गए होते ?
पता नहीं !
इन में से कुछ नेताओं ने तो उल्टे न  सिर्फ संबंधित पत्रकारों बल्कि  मीडिया संगठनों को भी प्रताडि़त किया।
उम्मीद है कि ऐसे पिछले उदाहरणों को देखते हुए वैसे नये नेता गण सबक लेंगे जिनका घोटाले के लिए मन ललचाता रहता है।सबक लेंगे तो न सिर्फ राज्य और देश का बल्कि उनका खुद का भी भला होगा।उनके वंशज भी गर्व से कह सकेंगे कि हमारे पूर्वज सत्ता में रहते हुए भी किसी घोटाले या विवाद में नहीं पड़े थे। 
गौर करने लायक सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी--- 
  सुप्रीम कोर्ट ने हाल में कहा है कि सरकार और ब्यूरोक्रेसी की अकर्मण्यता के कारण ही न्यायिक सक्रियता है।
यदि सरकारी व्यवस्था कानून का शासन लागू करने में विफल रहे और जनता को उसके अधिकार न मिलें तो अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ता है।और रास्ता ही क्या है ?
सुप्रीम कोर्ट ने बिलकुल सही कहा है।
पर ऐसे मामले देखते समय सुप्रीम कोर्ट सिर्फ राहत का आदेश न दे बल्कि यह भी बताए कि ऐसी अकर्मण्यता के लिए राजनीतिक कार्य पालिका या फिर प्रशासनिक कार्यपालिका स्तर के कौन-कौन से लोग जिम्मेदार हैं।अदालत ऐसी व्यवस्था भी करे ताकि ऐसे निक्कमे लोगों को उसकी कुछ कीमत भी चुकानी पड़े।
   कोई भी जीते, भला लोकतंत्र का ही ---- 
गुजरात विधान सभा चुनाव में चाहे जीत जिसकी भी हो, भला लोकतंत्र का ही होगा।
यह कैसे ?
दरअसल यह देश इन दिनों एक समर्थ प्रतिपक्ष की प्रतीक्षा कर रहा है।
यदि गुजरात में कांग्रेस विजयी होगी तो वह जीत कांग्रेस के लिए राजनीतिक  संजीवनी साबित हो सकती है।भले वह हिमाचल प्रदेश में हार जाए तौभी ।
  वैसे भी गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने खुद को पप्पू की छवि से निकालने का प्रयास किया है।एक हद तक वे सफल भी रहे हैं।हालांकि अभी उन्हें कुछ और प्रयास करने हांेगे।
  दूसरी ओर  भाजपा की केंद्र सरकार को अपने काम की गति और गुणवत्ता बढ़ानी पड़ेगी।
गुजरात की हार के बाद शायद केंद्र सरकार  महिला आरक्षण विधेयक पर काम कर सकती है।वह पिछड़ों के 27 प्रतिशत आरक्षण को तीन भाग में बांट सकती है।
बेनामी संपत्ति वालों पर कुछ और तेज कार्रवाई कर सकती है।ये सब भी देश के लिए अच्छा ही होगा।संभव है कि  2019 के लोक सभा चुनाव जीतने के लिए केंद्र की भाजपा सरकार के पास कुछ अन्य लोक लुभावन  कदम उठाने की योजनाएं हांे।
 हां, यदि भाजपा गुजरात में जीत गयी तो वह अधिक आत्म विश्वास के साथ अपने अधूरे वायदे पूरे करने के काम में इत्मीनान से निडरतापूर्वक लग जाएगी।
‘लतीफ राज’ की वापसी का नारा कितना कारगर ---
 गुजरात विधान सभा चुनाव में भाजपा ने  यह कह कर मतदाताओं को चेताया था कि यदि कांग्रेस को जिताओगे तो एक बार फिर ‘लतीफ राज’ कायम हो जाएगा। 
रिजल्ट बताएगा कि भाजपा का यह नारा इस बार कितना कारगर हुआ।
 यह लतीफ कौन था ?
लतीफ गुजरात में वही काम करता था जो काम दाऊद इब्राहिम महाराष्ट्र में करता था।
लतीफ 1997 में गुजरात पुलिस के साथ हुई मुंठभेड़ में मारा गया।
उससे ठीक पहले वह दिल्ली आतंकी बम विस्फोट के सिलसिले में गिरफ्तार होकर गुजरात पुलिस की हिरासत में था।
उसके सफाए के बाद लतीफ का  ड्राइवर सोहराबुददीन उसका उत्तराधिकारी बना।
पर, वह भी सन 2005 में पुलिस के साथ मुंठभेड़ में मारा गया।
1997 में गुजरात में कांग्रेस समर्थित दिलीप
पारीख की सरकार थी।शंकर सिंह बाघेला के दल राजपा के दिलीप पारीख नेता थे।
जिन पुलिस अफसरों ने लतीफ को मारा था ,उन्हें तब की सरकार ने सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया था।
जबकि आरोप यह था कि लतीफ भी नकली मुंठभेड़ में ही मारा गया था।
पर सोहराबुददीन हत्या कांड में आई.पी..एस.
अफसर भी आरोपी बनाये गये और लंबे समय तक जेल में रहे।इस दोहरे मापदंड का राजनीतिक लाभ भाजपा को बाद के चुनावों में मिलता रहा।
गुजरात के मौजूदा मुख्य मंत्री विजय रूपाणी ने इस सवाल को एक बार फिर इस चुनाव में उठाया था।
आज के शरद को याद आते हैं पुराने शरद ?----
शरद यादव आपातकाल में जेल में थे।तब वे जबल पुर से लोक सभा के सदस्य थे।वे एक उप चुनाव में 1974 में चुने गए थे।वे ‘जनता उम्मीदवार’ थे।छात्रों के नेता थे।
मशहूर हस्ती सेठ गंविंद दास के निधन के कारण वह सीट खाली 
हुई थी।
जिस लोक सभा के वे सदस्य थे,उसकी आयु 1976 में समाप्त हो रही थी।
पर आपातकाल में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने उस लोक सभा की अवधि  एक साल के लिए बढ़ा दी।
पर शरद यादव ने जेल से ही लोक सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।शरद ने कहा कि जनता ने मुझे सिर्फ 1976 तक के लिए ही चुना था।इसलिए मैं जनादेश का अपमान नहीं कर सकता।
उसी जेल में मधु लिमये भी थे।उन्होंने भी तब लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।
  वही शरद यादव इन दिनों अपनी राज्य सभा सीट  के  लिए जद्दोजेहद कर रहे हैं।वैसे राज्य सभा के सभापति ने उनकी सदस्यता समाप्त भी कर दी है।
शरद जी फिर भी ऐसी लड़ाई लड़ रहे हैं जिसमें सफलता की कोई उम्मीद नहीं है।
दरअसल बिहार विधान सभा के जदयू सदस्यों ने चुन कर शरद यादव को राज्य सभा में भेजा था।
 शरद यादव ने इस बीच जदयू छोड़ दिया।कोई विधायक उनके साथ नहीं गया।यानी उनके मतदाता @यानी विधायक@भी चाहते हैं कि शरद जी राज्य सभा की सीट छोड़ दें।दल बदल विरोधी  नियम भी यही कहता है। 
शरद जी ने जबल पुर के मतदाताओं का तो ध्यान रखा,पर बिहार के अपने मतदाताओं यानी जदयू विधायक का नहीं रखा।
आखिर क्यों ?
कितना बदल गए हैं शरद जी 1976 और 2017 के बीच ?
कभी आज के शरद को 1976 के शरद याद आते हैं ? शरद जी का व्यक्तित्व राज्य सभा की एक सीट से बड़ा है।
कभी संयोग बनेगा तो सांसद क्या, वह मंत्री भी बनेंगे।पर ऐसी लड़ाई क्यों  जिससे  सम्मान नहीं बढ़ता हो।
    और अंत में
शहरी इलाकों से आबादी का बोझ घटाने के लिए एक यह उपाय कारगर हो सकता है।
 सरकारी सेवकों को आवास भत्ता मिलता है।ग्रामीण क्षेत्रों में रहनेवाले सेवकों की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में आवास करने वालों को दोगुना भत्ता मिलता है।यदि इसे उलट दिया जाए तो क्या होगा ?
शहरी भत्ता घटाने के बदले ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले सरकारी सेवकों का आवास भत्ता धीरे -धीरे बढ़ाते जाना चाहिए।
यदि यह कदम शहरी क्षेत्रों पर से आबादी का बोझ घटाने में सहायक होता है तो इसे आजमाने में क्या हर्ज है ?
@ 15 दिसंबर 2017 को प्रभात खबर- बिहार -में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक काॅलम कानोंकान से @
  



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