सोमवार, 26 मार्च 2018

 हर साल ब्रिटिश संसद के 20 कार्य दिवसों के एजेंडा  का निर्धारण प्रतिपक्ष करता है।
क्या भारत में ऐसी व्यवस्था हो जाएगी तो प्रतिपक्ष संसद में हंगामा बंद कर देगा ? 
पता नहीं ! क्योंकि कुछ लोग तो अपनी आदत से लाचार हैं।
पर, जब पीठासीन अधिकारी अपने संसदीय कत्र्तव्यों का पालन करने को तैयार नहीं हंै,या उन्हें करने नहीं दिया जाता , यानी हंगामा करने वाले संांसदों को सदन से मार्शल आउट करने को वह तैयार नहीं हंै तब तो कोई दूसरा ही उपाय सोचना  होगा
ताकि लोकतंत्र की अनंत काल तक  हंसी नहीं होती रहे।संसद और विधान सभाओं में लगातार हो रही बंदर- लीला से नयी पीढ़ी पर अत्यंत बुरा असर पड़ रहा है।लोकतंत्र का नाम खराब हो रहा है।
  ‘उत्कृष्ट सांसद’ भर्तृहरि महताब ने हाल में  ‘प्रभात खबर’ से बातचीत में  कहा कि ‘दूसरों को न सुनने की आदत से संसद में गतिरोध होता है।अगर सत्ताधारी बेंच प्रतिपक्ष की बात सुन ले तो माहौल में काफी बदलाव आ सकता है।’
महताब ने ठीक कहा है।पर उन्होंने अधूरी बात कही है।
राज्य सभा में तो प्रतिपक्ष ही सत्ता दल की बात नहीं सुनता।
दरअसल वैसे भी इस देश में अधैर्यवान लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।संसद से सड़क तक।उसका सबसे बड़ा नमूना टी.वी.चैनलों की चर्चाओं में देखा जा सकता है।अधिकतर चैनलों पर आए अधिकतर गेस्ट सिर्फ अपनी  कहते हैं ।चिल्लाते हैं।कुछ एंकर भी न सिर्फ उपदेशक नजर आते हैं बल्कि खुद ही बहुत सारा समय ले लेते हैं।ऐसे लोग  यह कत्तई महसूस नहीं करते कि उनकी बात श्रोता-दर्शक सुन भी पा रहे हैं या नहीं।पसंद करते हैं या नहीं।
कल एबीपी पर देखा कि एंकर डिबेट में अनुशासन लाने की सराहनीय कोशिश कर रहे थे।पता नहीं यह प्रयास सफल हो पाएगा भी या नहीं।
  पर हां,टी.वी.चैनलों की चर्चाओं से देश को एक बड़ा लाभ जरूर हुआ है।लोगबाग अब यह जान रहे हैं कि कौन देशहित में खड़ा है,कौन माफियाओं-भ्रष्टाचारियों-जातिवादी-सांप्रदायिक ताकतों के  के साथ खड़ा है।कौन इस देश को टुकड़े -टुकड़े करना चाहता है।कौन बचाना चाहता है। किसके लिए देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा का कोई मतलब नहीं है।
किसके लिए यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
पहले इनमें से कुछ बातें गुपचुप होती थीं।अब खुलेआम हो रही है।बंगलादेशी घुसपैठियों पर हो रही चर्चा में  हाल में एक चैनल पर एक गेस्ट ने कह दिया कि भारत
आप्रवासियों से ही बना है। बाहर से किसी को यहां आकर बस जाने का पूरा हक है। 

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